1. साखी
कबीर की आठ साखियाँ — भावार्थ, प्रश्न-उत्तर, भाव स्पष्टीकरण और प्रचलित शब्द-रूप. NCERT हिंदी स्पर्श (भाग 2).
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पाठ का परिचय : ‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ का तद्भव रूप है। साक्षी का अर्थ है — प्रत्यक्ष ज्ञान। साखी वस्तुतः दोहा छंद है (13 और 11 की यति पर 24 मात्राएँ)। कबीर की भाषा में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द मिलते हैं, इसलिए उसे ‘पचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ कहा जाता है।
साखियाँ और उनका भावार्थ
ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥
भावार्थ : मन का अहंकार छोड़कर ऐसी मीठी वाणी बोलनी चाहिए जिससे अपना तन भी शीतल हो और सुनने वालों को भी सुख मिले।
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं॥
भावार्थ : कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है, पर वह उसे वन में ढूँढ़ता फिरता है। इसी प्रकार ईश्वर कण-कण में बसा है, पर अज्ञान के कारण संसार उसे देख नहीं पाता।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥
भावार्थ : जब तक मन में अहंकार था, तब तक ईश्वर नहीं मिले। अहंकार मिटते ही ईश्वर मिल गए। मन में ज्ञान का दीपक जलते ही अज्ञान का सारा अँधेरा मिट गया।
सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥
भावार्थ : संसार के लोग खाने-सोने में ही सुखी हैं। कबीर दुखी हैं, क्योंकि वे ईश्वर के लिए जागते हैं और उनके विरह में रोते हैं।
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥
भावार्थ : विरह रूपी साँप शरीर में बस जाए तो कोई मंत्र काम नहीं करता। ईश्वर के वियोग में व्यक्ति जीवित नहीं रहता, और यदि जीवित रहे तो पागल-सा हो जाता है।
निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ॥
भावार्थ : निंदा करने वाले को अपने आँगन में कुटिया बनाकर पास रखना चाहिए। वह बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
भावार्थ : मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़कर भी कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बना। जो प्रेम (प्रिय ईश्वर) का एक अक्षर पढ़ लेता है, वही सच्चा पंडित होता है।
हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि॥
भावार्थ : कबीर ने ज्ञान की जलती लकड़ी से अपना मोह-माया का घर जला दिया है। अब वे उसका घर भी जलाएँगे जो उनके साथ ज्ञान के मार्ग पर चलना चाहता है।
प्रश्न-अभ्यास (क) — निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
मीठी वाणी में अहंकार नहीं होता। ऐसी वाणी सुनकर दूसरों का मन प्रसन्न होता है। बोलने वाले के मन से भी क्रोध और कटुता दूर होती है। इससे उसका मन और तन शीतल रहता है।
यहाँ दीपक ज्ञान का और अँधियारा अज्ञान व अहंकार का प्रतीक है। मन में ज्ञान का दीपक जलते ही अहंकार मिट जाता है। तब ईश्वर के दर्शन होते हैं और अज्ञान का अँधेरा दूर हो जाता है।
हमारा मन अज्ञान और अहंकार से भरा रहता है। हम ईश्वर को मंदिर, मस्जिद और तीर्थों में बाहर ढूँढ़ते हैं। जैसे हिरन अपनी नाभि की कस्तूरी को वन में ढूँढ़ता है, वैसे ही हम अपने भीतर बसे ईश्वर को नहीं देख पाते।
जो लोग केवल खाने-पीने और सोने में लगे हैं, वे स्वयं को सुखी मानते हैं। कबीर जैसे ज्ञानी, जो ईश्वर के लिए व्याकुल हैं, दुखी हैं।
‘सोना’ अज्ञान और सांसारिक भोग में डूबे रहने का प्रतीक है। ‘जागना’ ज्ञान और ईश्वर-भक्ति के प्रति सजग रहने का प्रतीक है। कवि यह बताना चाहते हैं कि सांसारिक सुख सच्चा सुख नहीं है।
कबीर कहते हैं कि निंदक को अपने पास रखना चाहिए। वह हमारी कमियाँ बताता रहता है। उन कमियों को दूर करने से बिना साबुन-पानी के ही हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है।
कवि कहना चाहते हैं कि केवल पुस्तकें पढ़ने से कोई ज्ञानी नहीं बनता। जो प्रेम या ईश्वर का एक अक्षर भी सच्चे मन से पढ़ लेता है, वही सच्चा ज्ञानी है। अनुभव और प्रेम का ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान से बड़ा है।
- भाषा सरल, सहज और जनसामान्य की है।
- इसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द मिले हैं, इसलिए इसे ‘पचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ कहते हैं।
- दोहा छंद का प्रयोग है।
- उपमा, रूपक जैसे अलंकारों और प्रतीकों (दीपक, सोना, जागना) का सुंदर प्रयोग है।
- कम शब्दों में गहरी बात कही गई है।
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प्रश्न-अभ्यास (ख) — भाव स्पष्ट कीजिए
जब ईश्वर के विरह रूपी साँप का विष शरीर में फैल जाता है, तो कोई मंत्र या उपाय काम नहीं करता। विरह की यह पीड़ा केवल ईश्वर के मिलने पर ही दूर होती है।
कस्तूरी हिरन की अपनी नाभि में होती है, पर वह उसकी सुगंध से भ्रमित होकर उसे वन में ढूँढ़ता है। इसी प्रकार ईश्वर हमारे भीतर है, पर हम उसे बाहर ढूँढ़ते रहते हैं।
जब तक मन में ‘मैं’ यानी अहंकार था, तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ। अहंकार मिटते ही ईश्वर मिल गए। अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते।
संसार के लोग पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते मर गए, पर कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बन सका। सच्चा ज्ञान प्रेम और अनुभव से मिलता है, केवल पुस्तकें पढ़ने से नहीं।
भाषा अध्ययन
| पाठ का शब्द | प्रचलित रूप |
|---|---|
| औरन | औरों को |
| माँहि | में |
| देख्या | देखा |
| भुवंगम | भुजंग, साँप |
| नेड़ा | निकट |
| आँगणि | आँगन |
| साबण | साबुन |
| मुवा | मरा |
| पीव | प्रिय |
| जालौं | जलाऊँ |
| तास | उसका |
योग्यता विस्तार और परियोजना कार्य
1. ‘मीठी वाणी’ और ‘निंदा सहन करने’ के विषय पर कक्षा में परिचर्चा करें।
2. कस्तूरी : कस्तूरी नर कस्तूरी मृग की नाभि के पास की एक थैली में बनने वाला सुगंधित पदार्थ है। यह मृग हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में पाया जाता है। इसका उपयोग इत्र और औषधियों में होता है।
3. मीठी वाणी और ईश्वर-प्रेम संबंधी दोहों का संकलन करके चार्ट बनाएँ। साखियाँ याद करके अंत्याक्षरी खेलें।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बाँणी | बोली, वाणी |
| आपा | अहं, अहंकार |
| कुंडलि | नाभि |
| घटि घटि | घट-घट में, कण-कण में |
| भुवंगम | भुजंग, साँप |
| बौरा | पागल |
| नेड़ा | निकट |
| आँगणि | आँगन |
| साबण | साबुन |
| अषिर | अक्षर |
| पीव | प्रिय |
| मुराड़ा | जलती हुई लकड़ी |
| तास | उसका |