कक्षा 10 हिंदी · स्पर्श भाग 2 · कबीर · पद्य खंड

1. साखी

कबीर की आठ साखियाँ — भावार्थ, प्रश्न-उत्तर, भाव स्पष्टीकरण और प्रचलित शब्द-रूप. NCERT हिंदी स्पर्श (भाग 2).

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पाठ का परिचय : ‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ का तद्भव रूप है। साक्षी का अर्थ है — प्रत्यक्ष ज्ञान। साखी वस्तुतः दोहा छंद है (13 और 11 की यति पर 24 मात्राएँ)। कबीर की भाषा में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द मिलते हैं, इसलिए उसे ‘पचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ कहा जाता है।

साखियाँ और उनका भावार्थ

1साखी 1

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ॥

भावार्थ : मन का अहंकार छोड़कर ऐसी मीठी वाणी बोलनी चाहिए जिससे अपना तन भी शीतल हो और सुनने वालों को भी सुख मिले।

2साखी 2

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं॥

भावार्थ : कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है, पर वह उसे वन में ढूँढ़ता फिरता है। इसी प्रकार ईश्वर कण-कण में बसा है, पर अज्ञान के कारण संसार उसे देख नहीं पाता।

3साखी 3

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥

भावार्थ : जब तक मन में अहंकार था, तब तक ईश्वर नहीं मिले। अहंकार मिटते ही ईश्वर मिल गए। मन में ज्ञान का दीपक जलते ही अज्ञान का सारा अँधेरा मिट गया।

4साखी 4

सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥

भावार्थ : संसार के लोग खाने-सोने में ही सुखी हैं। कबीर दुखी हैं, क्योंकि वे ईश्वर के लिए जागते हैं और उनके विरह में रोते हैं।

5साखी 5

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥

भावार्थ : विरह रूपी साँप शरीर में बस जाए तो कोई मंत्र काम नहीं करता। ईश्वर के वियोग में व्यक्ति जीवित नहीं रहता, और यदि जीवित रहे तो पागल-सा हो जाता है।

6साखी 6

निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ॥

भावार्थ : निंदा करने वाले को अपने आँगन में कुटिया बनाकर पास रखना चाहिए। वह बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है।

7साखी 7

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥

भावार्थ : मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़कर भी कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बना। जो प्रेम (प्रिय ईश्वर) का एक अक्षर पढ़ लेता है, वही सच्चा पंडित होता है।

8साखी 8

हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि॥

भावार्थ : कबीर ने ज्ञान की जलती लकड़ी से अपना मोह-माया का घर जला दिया है। अब वे उसका घर भी जलाएँगे जो उनके साथ ज्ञान के मार्ग पर चलना चाहता है।

प्रश्न-अभ्यास (क) — निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?

मीठी वाणी में अहंकार नहीं होता। ऐसी वाणी सुनकर दूसरों का मन प्रसन्न होता है। बोलने वाले के मन से भी क्रोध और कटुता दूर होती है। इससे उसका मन और तन शीतल रहता है।

2दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

यहाँ दीपक ज्ञान का और अँधियारा अज्ञान व अहंकार का प्रतीक है। मन में ज्ञान का दीपक जलते ही अहंकार मिट जाता है। तब ईश्वर के दर्शन होते हैं और अज्ञान का अँधेरा दूर हो जाता है।

3ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?

हमारा मन अज्ञान और अहंकार से भरा रहता है। हम ईश्वर को मंदिर, मस्जिद और तीर्थों में बाहर ढूँढ़ते हैं। जैसे हिरन अपनी नाभि की कस्तूरी को वन में ढूँढ़ता है, वैसे ही हम अपने भीतर बसे ईश्वर को नहीं देख पाते।

4संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।

जो लोग केवल खाने-पीने और सोने में लगे हैं, वे स्वयं को सुखी मानते हैं। कबीर जैसे ज्ञानी, जो ईश्वर के लिए व्याकुल हैं, दुखी हैं।

‘सोना’ अज्ञान और सांसारिक भोग में डूबे रहने का प्रतीक है। ‘जागना’ ज्ञान और ईश्वर-भक्ति के प्रति सजग रहने का प्रतीक है। कवि यह बताना चाहते हैं कि सांसारिक सुख सच्चा सुख नहीं है।

5अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?

कबीर कहते हैं कि निंदक को अपने पास रखना चाहिए। वह हमारी कमियाँ बताता रहता है। उन कमियों को दूर करने से बिना साबुन-पानी के ही हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है।

6‘ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ’ — इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?

कवि कहना चाहते हैं कि केवल पुस्तकें पढ़ने से कोई ज्ञानी नहीं बनता। जो प्रेम या ईश्वर का एक अक्षर भी सच्चे मन से पढ़ लेता है, वही सच्चा ज्ञानी है। अनुभव और प्रेम का ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान से बड़ा है।

7कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
  • भाषा सरल, सहज और जनसामान्य की है।
  • इसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द मिले हैं, इसलिए इसे ‘पचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ कहते हैं।
  • दोहा छंद का प्रयोग है।
  • उपमा, रूपक जैसे अलंकारों और प्रतीकों (दीपक, सोना, जागना) का सुंदर प्रयोग है।
  • कम शब्दों में गहरी बात कही गई है।

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प्रश्न-अभ्यास (ख) — भाव स्पष्ट कीजिए

1बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।

जब ईश्वर के विरह रूपी साँप का विष शरीर में फैल जाता है, तो कोई मंत्र या उपाय काम नहीं करता। विरह की यह पीड़ा केवल ईश्वर के मिलने पर ही दूर होती है।

2कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।

कस्तूरी हिरन की अपनी नाभि में होती है, पर वह उसकी सुगंध से भ्रमित होकर उसे वन में ढूँढ़ता है। इसी प्रकार ईश्वर हमारे भीतर है, पर हम उसे बाहर ढूँढ़ते रहते हैं।

3जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।

जब तक मन में ‘मैं’ यानी अहंकार था, तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ। अहंकार मिटते ही ईश्वर मिल गए। अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते।

4पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।

संसार के लोग पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते मर गए, पर कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बन सका। सच्चा ज्ञान प्रेम और अनुभव से मिलता है, केवल पुस्तकें पढ़ने से नहीं।

भाषा अध्ययन

1पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप लिखिए। (उदाहरण — जिवै : जीना)
पाठ का शब्दप्रचलित रूप
औरनऔरों को
माँहिमें
देख्यादेखा
भुवंगमभुजंग, साँप
नेड़ानिकट
आँगणिआँगन
साबणसाबुन
मुवामरा
पीवप्रिय
जालौंजलाऊँ
तासउसका

योग्यता विस्तार और परियोजना कार्य

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
बाँणीबोली, वाणी
आपाअहं, अहंकार
कुंडलिनाभि
घटि घटिघट-घट में, कण-कण में
भुवंगमभुजंग, साँप
बौरापागल
नेड़ानिकट
आँगणिआँगन
साबणसाबुन
अषिरअक्षर
पीवप्रिय
मुराड़ाजलती हुई लकड़ी
तासउसका