1. स्वदेश
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की देश-प्रेम की कविता — सार, मेरी समझ से, मिलान, सोच-विचार, भाषा की बात और पाठ से आगे के सभी प्रश्नों के सरल उत्तर।
शेयर करेंAdvertisement
पाठ का परिचय : ‘स्वदेश’ कविता गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ ने लिखी है। यह एक आह्वान गीत है। कवि कहते हैं कि जिस हृदय में अपने देश के लिए प्यार नहीं है, वह हृदय नहीं, पत्थर है।
कविता का सार
कवि कहते हैं कि जिस मनुष्य के मन में देश-प्रेम नहीं है, उसका हृदय पत्थर के समान है। जो जीवन दूसरों में जोश नहीं जगा सकता, वह बेकार है। जो संसार के साथ नहीं चलता और जो साहस छोड़ देता है, वह कभी सफल नहीं होता।
हम इसी देश की मिट्टी में पले-बढ़े हैं। यहीं हमें दाना-पानी मिला। यहीं हमारे माता-पिता और भाई-बंधु हैं। इस देश ने हमें अनमोल रत्न दिए हैं। सारी दुनिया इस पर मोहित है। ऐसे देश के प्रति जिसका मन नहीं पिघलता, वह धरती पर बोझ है।
मृत्यु तो एक दिन निश्चित है। इसलिए मृत्यु से डरना नहीं चाहिए। हमारे पास सब साधन हैं। बस मन में देश के लिए प्यार होना चाहिए।
मेरी समझ से
उत्तर : संवेदनहीनता सेकठोरता से
उत्तर : देश के प्रति प्रेम
उत्तर : देश के समस्त नागरिकों के लिए
उत्तर : जिसमें देश-प्रेम का भाव नहीं है
(ख) अपने उत्तर मित्रों के उत्तरों से मिलाइए और कारण पर चर्चा कीजिए। (यह कक्षा-गतिविधि है।)
मिलकर करें मिलान
| स्तंभ 1 (पंक्तियाँ) | स्तंभ 2 (भाव / संदर्भ) |
|---|---|
| 1. जिसने साहस को छोड़ दिया, वह पहुँच सकेगा पार नहीं। | जिसने किसी कार्य को करने का साहस छोड़ दिया हो, वह किसी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। |
| 2. जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं। | जो स्वयं के साथ दूसरों को भी प्रेरित और उत्साहित नहीं कर सकते, उनका जीवन निष्फल और अर्थहीन है। |
| 3. जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी। | जिस देश की ज्ञान-संपदा से समूचा विश्व प्रभावित है। |
| 4. सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं। | जैसे युद्ध में तोप और तलवार की आवश्यकता होती है, वैसे ही प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। |
पंक्तियों पर चर्चा
मृत्यु निश्चित है। एक दिन सबको जाना है। समय (काल) एक दीपक की तरह हमेशा जलता रहता है। जैसे पतंगे दीपक पर जल जाते हैं, वैसे ही हर प्राणी को एक दिन मरना है। इसलिए मृत्यु से डरे बिना देश के लिए जीना चाहिए।
हमारे पास देश की रक्षा के सारे साधन हैं — तोप भी है और तलवार भी। सब कुछ हमारे अपने हाथ में है। फिर भी यदि मन में देश के लिए प्यार न हो, तो वह हृदय पत्थर के समान है।
जिस हृदय में कोमल भावनाएँ नहीं हैं, जिसमें प्रेम की धारा नहीं बहती, वह हृदय कठोर पत्थर के समान है। सच्चा हृदय वही है जिसमें अपने देश के लिए प्रेम हो।
सोच-विचार के लिए
देश के सभी नागरिकों को राजा-रानी कहा गया है। देश की धरती, नदियाँ, संपत्ति सब हमारी है। हम इस देश में सम्मान और स्वतंत्रता से रहते हैं। इसलिए हम ही इस देश के राजा-रानी हैं।
‘संसार-संग’ चलने का अर्थ है — समय और समाज के साथ मिलकर आगे बढ़ना। जो व्यक्ति सबके साथ नहीं चलता, वह पीछे और अकेला रह जाता है। लोग उसे नहीं अपनाते। इसलिए संसार उसका नहीं हो पाता।
जिस देश ने हमें सब कुछ दिया, उसके प्रति भी जिसका मन प्रेम से नहीं पिघलता, वह व्यक्ति धरती पर बोझ के समान है। उसका जीवन किसी काम का नहीं।
अपने देश की धरती, लोगों, भाषा और संस्कृति से प्रेम करना देश-प्रेम है। देश के नियमों का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और देश की उन्नति के लिए ईमानदारी से काम करना भी देश-प्रेम है। आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए त्याग करना सच्चा देश-प्रेम है।
- कविता की भाषा सरल खड़ी बोली है।
- ‘वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं’ — यह पंक्ति बार-बार आती है (टेक)।
- पंक्तियों के अंत में तुक मिलती है, जैसे — प्यार-सार-पार, पानी-रानी-लासानी।
- ‘क्या है वह भू का भार नहीं’ जैसी प्रश्न शैली का प्रयोग है।
- ‘काल-दीप’, ‘रस-धार’ जैसे सुंदर शब्द-चित्र हैं।
- कविता में लय है, इसलिए इसे गाया जा सकता है।
Advertisement
अनुमान और कल्पना से
यहाँ प्राकृतिक संपदा के खजाने की बात है — उपजाऊ मिट्टी, नदियाँ, वन, खनिज आदि। साथ ही ज्ञान, विज्ञान, कला और संस्कृति के खजाने की भी बात है।
‘उगे-बढ़े’ देश के नागरिकों के लिए कहा गया है। जैसे पौधा मिट्टी में उगता और बढ़ता है, वैसे ही हम इस देश की मिट्टी में जन्मे और पले-बढ़े हैं।
पत्थर कठोर होता है। उसमें कोई भावना नहीं होती। जिस हृदय में देश के लिए प्रेम नहीं, वह भी पत्थर जैसा कठोर और भावहीन है। इसलिए ‘पत्थर’ शब्द का प्रयोग किया गया है।
पत्थर — जब मैं नदी में था, तो नदी की धारा मुझे बदलती थी। मैं घिस-घिसकर चिकना और गोल हो गया।
मैं — फिर तुम यहाँ कैसे आए?
पत्थर — एक दिन लोग मुझे निकालकर ले आए। अब मैं एक पुल की नींव में लगा हूँ। लोग मुझ पर से रोज आते-जाते हैं।
मैं — तुम्हें बुरा नहीं लगता?
पत्थर — नहीं, मुझे खुशी है कि मैं देश के काम आ रहा हूँ। बस मुझे कठोर हृदय वाला मत कहना!
- जल, नदियाँ और वन — ये सीमित हैं और जीवन के लिए आवश्यक हैं।
- वन्य जीव — कई जीव लुप्त होने की कगार पर हैं।
- उपजाऊ मिट्टी — इसी से हमें अन्न मिलता है।
- ऐतिहासिक धरोहर और स्मारक — ये हमारे इतिहास की पहचान हैं।
- भाषाएँ, लोककलाएँ और सार्वजनिक संपत्ति — ये आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बचानी हैं।
कविता की रचना
तुक मिलाने से कविता में लय और संगीत आ गया है। कविता पढ़ने और गाने में मधुर लगती है। इसे याद करना भी आसान हो जाता है।
- एक ही पंक्ति (टेक) को बार-बार दोहराया गया है।
- ‘क्या तोप नहीं तलवार नहीं’ जैसे प्रश्न पूछे गए हैं।
- ‘दाना-पानी’, ‘राजा-रानी’, ‘माता-पिता’ जैसे जोड़े वाले शब्द हैं।
- ‘है’ शब्द को पंक्ति के आरंभ में रखकर लय बनाई गई है।
- ‘काल-दीप’, ‘रस-धार’ जैसे शब्दों से चित्र बनाए गए हैं।
आपकी कविता
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो माटी का कर्ज चुका न सका,
उस जीवन का आधार नहीं।
जो देश के काम न आ पाए,
वह सच्चा पहरेदार नहीं।
(यह नमूना है। आप अपनी पंक्तियाँ स्वयं बनाइए।)
भाषा की बात
- जो चल न सका संसार-संग → जो चल न सका संसार के संग
- बहती जिसमें रस-धार नहीं → बहती जिसमें रस की धार नहीं
- पाया जिसमें दाना-पानी → पाया जिसमें दाना और पानी
- हैं माता-पिता बंधु जिसमें → हैं माता और पिता बंधु जिसमें
- हम हैं जिसके राजा-रानी → हम हैं जिसके राजा और रानी
- जिससे न जाति-उद्धार हुआ → जिससे न जाति का उद्धार हुआ
(दाना-पानी, माता-पिता, राजा-रानी में ‘और’ का भाव है।)
- हैं माता-पिता बंधु जिसमें → जिसमें माता-पिता बंधु हैं।
- उस पर है नहीं पसीजा जो → जो उस पर नहीं पसीजा है।
- है जान एक दिन जाने को → जान एक दिन जाने को है।
- है काल-दीप जलता हरदम → काल-दीप हरदम जलता है।
‘है’ पहले लगाकर — “हैं ज्ञानी भी जिस पर मरते, है दुनिया जिस पर दीवानी॥”
इससे पंक्ति में लय और गेयता बढ़ जाती है।
| शब्द | समानार्थी शब्द |
|---|---|
| भू | धरा, पृथ्वी |
| दीप | दीपक, प्रदीप |
| हृदय | दिल, जी |
| तलवार | असि, कृपाण |
| दुनिया | जग, संसार |
| पत्थर | पाहन, पाषाण |
कविता का शीर्षक
मैं ‘स्वदेश का प्यार’ शीर्षक चुनूँगा। पूरी कविता इसी भाव पर टिकी है। कवि बार-बार कहते हैं कि जिस हृदय में स्वदेश का प्यार नहीं, वह पत्थर है।
पाठ से आगे
रेलगाड़ी के डिब्बे में कचरा फैलाते लोगों वाले चित्र को छोड़कर सभी चित्र स्वदेश प्रेम की श्रेणी में आते हैं — पौधों को पानी देती लड़की, देश के लिए कुश्ती खेलते खिलाड़ी, मिलकर सार्वजनिक स्थान ठीक करते लोग, सैनिक का सम्मान करती बच्ची, पार्क की सफाई करते बच्चे और खेत जोतता किसान।
पेड़-पौधे लगाना, सफाई करना, खेलों में देश का नाम रोशन करना, सैनिकों का सम्मान करना और खेती करके अन्न उगाना — ये सब देश की सेवा है। रेल में कचरा फैलाना सार्वजनिक संपत्ति को गंदा करना है। यह देश-प्रेम नहीं है।
| स्वदेश प्रेमी | अस्त्र-शस्त्र |
|---|---|
| विद्यार्थी | पुस्तक, कलम और ज्ञान |
| अध्यापक | ज्ञान और शिक्षा |
| कृषक | हल, बीज और परिश्रम |
| चिकित्सक | दवाइयाँ, उपकरण और सेवा-भाव |
| वैज्ञानिक | प्रयोग, खोज और अनुसंधान |
| श्रमिक | औजार और कड़ी मेहनत |
| पत्रकार | कलम, कैमरा और सच्ची खबर |
तिरंगा प्रसन्न होगा जब — मैंने कचरा कूड़ेदान में डाला, नल बंद किया, बड़ों का आदर किया, मन लगाकर पढ़ाई की।
तिरंगा उदास होगा जब — मैंने बिजली व्यर्थ जलाई, किसी से झगड़ा किया, सड़क पर कागज फेंका।
अपनी भाषा अपने गीत : अपनी भाषा के देश-प्रेम के गीतों का संकलन करके कक्षा में संगीतमय प्रस्तुति दीजिए। (कक्षा-गतिविधि)
झरोखे से — साझी समझ
‘स्वदेश’ कविता कहती है कि देश-प्रेम के बिना हृदय पत्थर है। यह कविता लोगों में देश के लिए जोश जगाती है।
‘खादी गीत’ में स्वदेशी कपड़े खादी के प्रति प्रेम है। खादी के हर धागे में अपनापन, माँ का मान और भाई का प्यार है। खादी पहनना अन्यायी अंग्रेजी शासन का विरोध था। इस तरह दोनों कविताएँ देश-प्रेम और स्वदेशी की भावना जगाती हैं।
खोजबीन के लिए : ‘सारे जहाँ से अच्छा’, ‘दीवानों की हस्ती’ और ‘झाँसी की रानी’ जैसी रचनाएँ पुस्तकालय या इंटरनेट से पढ़िए और सुनिए।