७. खुला आकाश (पूरक पठन)
लेखक — कुँवर नारायण | संपूर्ण स्वाध्याय, अभिव्यक्ति, भाषा बिंदु (संधि) और अपठित गद्यांश — महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (लोकभारती)।
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स्वाध्याय (प्रश्न-उत्तर)
प्रवाह तालिका पूर्ण कीजिए : गली की विशेषताएँ
१. गली से यह नहीं दिखता —
आसमान, हरियाली, और चिड़ियाँ (पेड़ों पर बैठीं या आसमान में उड़ती हुई)।
२. लेखक ऐसी जिंदगी बिताना नहीं चाहता —
चीजों को लुका-छिपाकर और बातों व व्यवहार को रचा-बसाकर जीना (अर्थात् बनावटी जिंदगी जीना)।
१. मनुष्य जीवन की स्थितियाँ
२. कुछ मनुष्यों में दिखाई देने वाले पशु
१. घर से बाहर झाँकने पर यह दिखाई देता है —
सिर्फ दूसरे मकान और एक गंदी व तंग गली।
२. लेखक इनकी सेवा में लगे हैं —
कंप्यूटर और मोटर (कार)।
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मनुष्य का स्वभाव है कि जिस काम में उसकी रुचि या शौक होता है, उसे पूरा करने के लिए वह समय और साधन किसी न किसी तरह जुटा ही लेता है। जब हमारे अंदर किसी लक्ष्य को प्राप्त करने की सच्ची लगन होती है, तो बड़ी-से-बड़ी रुकावटें भी हमें रोक नहीं पातीं। इसके विपरीत, जो काम हम नहीं करना चाहते या जिसे करने में हमें आलस आता है, उसके लिए हम अनेक बहाने ढूँढ़ लेते हैं; जैसे— समय नहीं मिला, तबीयत ठीक नहीं थी आदि।
उदाहरण : यदि किसी विद्यार्थी को क्रिकेट खेलने का शौक है, तो वह परीक्षा के दिनों में भी अपनी पढ़ाई का समय इस प्रकार व्यवस्थित कर लेगा कि उसे खेलने का समय मिल जाए। वह इसके लिए कोई बहाना नहीं बनाएगा। अतः यह सत्य है कि सच्ची चाह होने पर राह अपने आप निकल आती है।
भाषा बिंदु (व्याकरण - संधि)
| अनु. | संधि विच्छेद | संधि शब्द | संधि भेद |
|---|---|---|---|
| १. | दुः + लभ | दुर्लभ | विसर्ग संधि |
| २. | महा + आत्मा | महात्मा | स्वर संधि |
| ३. | अन् + आसक्त | अनासक्त | व्यंजन संधि |
| ४. | अंतः + चेतना | अंतश्चेतना | विसर्ग संधि |
| ५. | सम् + तोष | संतोष | व्यंजन संधि |
| ६. | सदा + एव | सदैव | स्वर संधि |
| अनु. | शब्द | संधि विच्छेद | संधि भेद |
|---|---|---|---|
| १. | सज्जन | सत् + जन | व्यंजन संधि |
| २. | नमस्ते | नमः + ते | विसर्ग संधि |
| ३. | स्वागत | सु + आगत | स्वर संधि |
| ४. | दिग्दर्शक | दिक् + दर्शक | व्यंजन संधि |
| ५. | यद्यपि | यदि + अपि | स्वर संधि |
| ६. | दुस्साहस | दुः + साहस | विसर्ग संधि |
| शब्द | विच्छेद | संधि भेद |
|---|---|---|
| दिग्गज | दिक् + गज | व्यंजन संधि |
| सप्ताह | सप्त + अह | स्वर संधि |
| निश्चल | निः + चल | विसर्ग संधि |
| भानूदय | भानु + उदय | स्वर संधि |
| निस्संदेह | निः + संदेह | विसर्ग संधि |
| सूर्यास्त | सूर्य + अस्त | स्वर संधि |
अपठित गद्यांश (स्वामी विवेकानंद की आत्मकथा)
१. कमरे का किराया — तीन पाउंड प्रति सप्ताह
२. लेखक इनके प्रति कृतज्ञ हैं — अतीत में जिन लोगों ने उनकी मदद की है और भविष्य में जो लोग मदद करेंगे।
- १. परिच्छेद में उल्लिखित देश : इंग्लैंड (लंदन)
- २. हर किसी को करना होगा : अपना कर्तव्य
- ३. लेखक की तकलीफें : लेखक की तकलीफें उनका अपना कर्मफल हैं, जिसे उन्हें ही भुगतना होगा।
- ४. हर किसी को करनी होगी : आत्मरक्षा
(अ) निम्नलिखित अर्थ से मेल खाने वाला शब्द उपर्युक्त परिच्छेद से ढूँढ़कर लिखिए :
१. स्वयं की रक्षा करना — आत्मरक्षा
२. दूसरों के उपकारों को मानने वाला — कृतज्ञ
(ब) लिंग पहचानकर लिखिए :
१. जेब — स्त्रीलिंग
२. दावा — पुल्लिंग
३. साहित्य — पुल्लिंग
४. सेवा — स्त्रीलिंग
विचार : 'कृतज्ञता' का अर्थ है किसी के द्वारा किए गए उपकार या मदद को याद रखना और उसके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करना। कृतज्ञता मनुष्य का एक श्रेष्ठ आभूषण है। जब हम मुश्किल समय में किसी से सहायता प्राप्त करते हैं, तो उस सहायता के प्रति आभारी होना हमारा परम कर्तव्य बन जाता है।
जो व्यक्ति कृतज्ञ होता है, उसमें विनम्रता, संतोष और सकारात्मकता जैसे गुण अपने आप आ जाते हैं। इससे आपसी रिश्ते मजबूत होते हैं और समाज में प्रेम व सहयोग की भावना बढ़ती है। स्वामी विवेकानंद जी ने भी अपने गद्यांश में यही संदेश दिया है कि हमें उन सभी के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जिन्होंने हमारी सहायता की है। कृतघ्नता (उपकार न मानना) सबसे बड़ा पाप माना गया है, इसलिए कृतज्ञता को जीवन का अनिवार्य अंग बनाना चाहिए।