१. कह कविराय
गिरिधर — कुंडलियों का भावार्थ, संजाल, भाषा बिंदु, विचार स्पष्टीकरण, और पाठ के आँगन में (स्वाध्याय) के सभी प्रश्नों के उत्तर।
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कवि और कुंडलियों का परिचय : प्रस्तुत कुंडलियों की रचना 'गिरिधर' जी ने की है। कुंडलियाँ दोहा और रोला के मेल से बनती हैं। इन कुंडलियों के माध्यम से कवि ने हमें नीति, व्यवहार, निस्वार्थ मित्रता, सोच-समझकर कार्य करने और परोपकार जैसे सामाजिक गुणों को अपनाने की प्रेरणा दी है ।
पाठ के आँगन में (स्वाध्याय)
(क) कौआ और कोकिल में समानता तथा अंतर :
| पक्षी | समानता | अंतर | कवि की दृष्टि से |
|---|---|---|---|
| कौआ | दोनों का रंग एक (काला) होता है। | कौए की आवाज कर्कश (अप्रिय) होती है। | कौआ अपावन (अशुद्ध) माना जाता है। |
| कोकिल (कोयल) | दोनों का रंग एक (काला) होता है। | कोयल की आवाज मधुर (मीठी) होती है। | कोयल सबको सुहावनी (अच्छी) लगती है। |
(ख) कवि की दृष्टि से मित्र की परिभाषा :
कवि गिरिधर जी के अनुसार, सच्चा मित्र वह है जो बिना किसी स्वार्थ के (बेगरजी) प्रेम करता है। वह केवल धन-दौलत देखकर साथ नहीं रहता। जो मित्र केवल पैसा होने पर साथ घूमे और पैसा खत्म होने पर मुँह फेर ले, वह सच्चा मित्र नहीं बल्कि 'मतलब का यार' होता है ।
(ग) आकृति : बिना सोचे काम करने के परिणाम
शब्दों का वर्गीकरण :
| शब्द का प्रकार | पाठ में आए शब्द |
|---|---|
| तत्सम शब्द | शब्द, कोकिला, ऋण, परम, दुर्जन |
| तद्भव शब्द | कागा (काक), पाछै (पीछे), बानी (वाणी), हाथ (हस्त), शीस (शीर्ष) |
| देशज शब्द | गाँठ, डोलै, धावै, उलीचिए |
पाँच शब्दों का वाक्य में प्रयोग :
- ऋण (तत्सम) : हमें कभी किसी का ऋण नहीं रखना चाहिए।
- कोकिला (तत्सम) : वसंत ऋतु में कोकिला बहुत मीठा गाती है।
- हाथ (तद्भव) : हमें दूसरों के दुख में हाथ बँटाना चाहिए।
- दुर्जन (तत्सम) : दुर्जन व्यक्ति की संगति से हमेशा बचना चाहिए।
- गाँठ (देशज) : उसने अपनी सारी बचत गाँठ में बाँध कर रख ली।
- (च) ऋण लेते समय : ऋण लेते समय मनुष्य बहुत मीठे-मीठे वचन बोलता है (झूठा मीठे वचन कहि) और उधार लेते समय उसे परम सुख मिलता है।
- (छ) ऋण लौटाते समय : ऋण लौटाने की मनुष्य की नीयत नहीं होती। वह पैसे माँगने पर मारने दौड़ता है (माँगते मारन धावै), ऊँच-नीच की बातें करता है और बहुत दिन बीत जाने पर उधार के कागज को ही झूठा बता देता है।
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संजाल और अन्य प्रश्न
- (क) अपना शीस इसके लिए आगे करना चाहिए तो इसकी प्राप्ति होगी : परोपकार (परस्वारथ) के कार्य के लिए।
- (ख) बड़ों के द्वारा दी गई सीख : राम का स्मरण करो, परोपकार करो, अपना आचरण अच्छा (सुचाल) रखो और अपना सम्मान बनाए रखो।
मुहावरा : हाथ मलना (पछताना)
वाक्य प्रयोग : जो समय पर पढ़ाई नहीं करते, वे परीक्षा परिणाम आने पर केवल हाथ मलते रह जाते हैं ।
अभिव्यक्ति / स्वमत स्पष्ट कीजिए
सुख और खुशियाँ ऐसी अनमोल चीज़ें हैं जिन्हें जितना बाँटा जाए, वे उतनी ही बढ़ती हैं। समाज में ऐसे कई लोग हैं जो अभावों या दुखों के कारण उदास रहते हैं। यदि हम अपनी खुशियों में उन्हें भी शामिल करें और उनके चेहरों पर मुसकान लाएँ, तो हमारी अपनी खुशी दोगुनी हो जाती है। स्वार्थी होकर अकेले खुशियाँ मनाने से वह आत्मसंतुष्टि कभी नहीं मिलती, जो दूसरों के साथ बाँटकर मिलती है। इसलिए हमें सदैव अपनी खुशियाँ सबके साथ बाँटनी चाहिए।
संसार में हमेशा गुणी व्यक्ति का ही सम्मान होता है। रूप-रंग और बाहरी दिखावा कुछ समय के लिए किसी को आकर्षित कर सकता है, परंतु व्यक्ति की असली पहचान उसके गुणों और कर्मों से ही होती है। जिस प्रकार रंग एक समान होने पर भी कोयल अपने मधुर स्वर के कारण पसंद की जाती है और कौए को कोई पसंद नहीं करता, ठीक उसी प्रकार, जिस व्यक्ति में अच्छे संस्कार और गुण होते हैं, उसे हज़ारों लोग (सहस नर) अपनाते हैं और उसका सम्मान करते हैं।
कवि के इस कथन का अर्थ है कि जो बीत गया, उसे भूलकर भविष्य की ओर देखना चाहिए। मनुष्य के जीवन में कई बार असफलताएँ और दुखद घटनाएँ होती हैं। बीती हुई अप्रिय बातों को पकड़कर रोने से केवल हमारा वर्तमान और भविष्य खराब होता है। एक समझदार व्यक्ति वही है जो पुरानी गलतियों से सीख ले, लेकिन उन्हें मन में बोझ की तरह न पालकर आगे के अच्छे कार्यों पर अपना ध्यान केंद्रित करे। यही प्रगति का सही मार्ग है।
कल्पना पल्लवन
| काल | कवि का नाम | प्रसिद्ध रचनाएँ |
|---|---|---|
| भक्तिकालीन कवि | तुलसीदास | रामचरितमानस, विनय पत्रिका |
| सूरदास | सूरसागर, सूरसारावली | |
| कबीरदास | बीजक (साखी, सबद, रमैनी) | |
| मीराबाई | राग गोविंद, गीत गोविंद की टीका | |
| रीतिकालीन कवि | बिहारी | बिहारी सतसई |
| कवि भूषण | शिवराज भूषण, शिवा बावनी | |
| केशवदास | रामचंद्रिका, रसिकप्रिया | |
| घनानंद | सुजान सागर, विरह लीला |