३. कबीर
हजारी प्रसाद द्विवेदी — संजाल, सही विकल्प, उपसर्ग-प्रत्यय, लेखनीय तथा मौलिक सृजन सहित स्वाध्याय के सभी प्रश्नों के उत्तर।
शेअर करेंAdvertisement
पाठ का परिचय : यह पाठ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित एक आलोचनात्मक निबंध है। इसमें लेखक ने संत कबीरदास जी के मस्त-मौला स्वभाव, उनके अक्खड़पन, उनकी दृढ़ साधना और उनके आत्मविश्वास का बड़े ही सुंदर और सटीक शब्दों में चित्रण किया है।
पाठ के आँगन में
(१) संजाल : मस्त-मौला के लक्षण
(२) परिच्छेद पढ़कर प्राप्त होने वाली प्रेरणा लिखिए :
प्रस्तुत परिच्छेद (मस्त-मौला स्वभाव के बारे में) पढ़कर हमें यह प्रेरणा मिलती है कि जीवन में इंसान को बेपरवाह और आत्मविश्वासी होना चाहिए। पुरानी बातों (अतीत) का बोझ लेकर नहीं ढोना चाहिए और न ही भविष्य की चिंताओं में डूबना चाहिए। इंसान को अपने लक्ष्य और सत्य के प्रति दृढ़ रहना चाहिए तथा बिना किसी संकोच या मोह-माया के सत्य का मार्ग चुनना चाहिए।
(३) संजाल : कबीर की विशेषताएँ
(क) कबीर के मतानुसार प्रेम किसी,
- १. खेत में नहीं उपजता। (✓)
- २. गमले में नहीं उपजता।
- ३. बाग में नहीं उपजता।
उत्तर : कबीर के मतानुसार प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता।
(ख) कबीर जिज्ञासु थे,
- १. मिथ्या के।
- २. सत्य के। (✓)
- ३. कथ्य के।
उत्तर : कबीर जिज्ञासु थे, सत्य के।
Advertisement
भाषा बिंदु
| वाक्य / रेखांकित शब्द | उपसर्ग | मूल शब्द | प्रत्यय |
|---|---|---|---|
| भारत की अलौकिकता सारे विश्व में फैली है। | अ | लौकिक | ता |
| फक्कड़ना लापरवाही और निर्मम अक्खड़ता उनके... | ला | परवाह | ई |
| ...लापरवाही और निर्मम अक्खड़ता उनके... | निर् | मम | — |
| ...और निर्मम अक्खड़ता उनके आत्मविश्वास का... | — | अक्खड़ | ता |
| ...अक्खड़ता उनके आत्मविश्वास का परिणाम थी । | आत्म | विश्वास | — |
| लोग उनकी असफलता पर क्या-क्या टिप्पणी करेंगे । | अ | सफल | ता |
| राजेश अभिमानी लड़का है। | अभि | मान | ई |
| मोह-ममता उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती थी । | वि | चल | इत |
| केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है, तुलसीदास । | प्रति | द्वंद्व | ई |
| पूर्णिमा के दिन चाँद परिपूर्णता लिए हुए था। | परि | पूर्ण | ता |
ध्यान दें : उपसर्ग वह शब्दांश होता है जो किसी शब्द के आरंभ में जुड़ता है (जैसे 'सफल' से पहले 'अ' = असफलता) और प्रत्यय वह शब्दांश है जो अंत में जुड़ता है (जैसे 'सफल' के अंत में 'ता' = सफलता)। कुछ शब्दों में केवल उपसर्ग होता है और कुछ में केवल प्रत्यय।
अभिव्यक्ति (मौलिक सृजन / लेखनीय)
भारत भूमि आदिकाल से ही संतों और महात्माओं की भूमि रही है। समाज जब भी अज्ञानता, अंधविश्वास और कुरीतियों के अंधकार में भटकता है, तब संत अपने अमृतमय वचनों से उसे सही मार्ग दिखाते हैं। संतों के वचनों में सत्य, प्रेम, करुणा और समानता का संदेश होता है, जो सीधा मनुष्य के हृदय को स्पर्श करता है।
जैसे संत कबीर, संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर ने अपने उपदेशों और दोहों के माध्यम से समाज में फैली जाति-पाति, छुआछूत और धार्मिक आडंबरों पर कड़ी चोट की। उनके सरल और सीधे वचनों ने आम लोगों को ईश्वर भक्ति का सच्चा मार्ग दिखाया और समाज में भाईचारे को बढ़ावा दिया। इसलिए यह कहना बिल्कुल सत्य है कि संतों के विचार और वचन समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं।
संत कबीरदास जी हिंदी साहित्य के भक्ति काल के एक महान कवि और उच्च कोटि के संत थे। ईश्वर के प्रति उनकी अनन्य भक्ति थी, लेकिन इसके साथ ही वे एक निडर और क्रांतिकारी समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने समय में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में व्याप्त कुरीतियों, पाखंडों और अंधविश्वासों का कड़ा विरोध किया।
कबीर जी ने मूर्तिपूजा, रोजा, नमाज और दिखावे की भक्ति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि ईश्वर मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि हर इंसान के हृदय में बसता है। उन्होंने समाज की ऊँच-नीच और जाति-भेद की भावना को नकारते हुए समानता का संदेश दिया। वे किसी भी गलत बात का बिना किसी डर के, मुँह पर ही खंडन कर देते थे। उनकी इसी स्पष्टवादिता और अक्खड़पन ने समाज को एक नई दिशा दी। अतः यह सिद्ध होता है कि वे केवल एक संत ही नहीं, बल्कि एक सच्चे समाज सुधारक भी थे।