11. तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
शैलेंद्र और फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ — सार, प्रश्न-उत्तर, आशय और भाषा अध्ययन. NCERT हिंदी स्पर्श (भाग 2).
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पाठ का परिचय : ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ प्रहलाद अग्रवाल का संस्मरणात्मक लेख है। गीतकार शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ पर फ़िल्म बनाई। लेख में फ़िल्म की विशेषताओं, शैलेंद्र के कवि-हृदय और एक सार्थक फ़िल्म बनाने की कठिनाइयों का वर्णन है।
पाठ का सार
1966 में प्रदर्शित ‘तीसरी कसम’ गीतकार शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म थी। इसमें राजकपूर ने अपने जीवन का सबसे अच्छा अभिनय किया। फ़िल्म को राष्ट्रपति स्वर्णपदक और कई अन्य पुरस्कार मिले। लेखक के अनुसार यह फ़िल्म नहीं, ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’ थी।
राजकपूर ने मित्र होने के नाते शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से सावधान किया था, पर शैलेंद्र एक आदर्शवादी भावुक कवि थे। उन्हें धन और यश से अधिक आत्म-संतुष्टि चाहिए थी। फ़िल्म को वितरक मुश्किल से मिले, क्योंकि उसकी संवेदना ‘दो से चार बनाने’ वालों की समझ से परे थी।
शैलेंद्र के गीत सरल और भावपूर्ण थे। वे मानते थे कि दर्शकों की रुचि के नाम पर उथलापन नहीं थोपना चाहिए। फ़िल्म ने रेणु की कहानी के साथ पूरा न्याय किया। राजकपूर हीरामन बन गए और वहीदा रहमान हीराबाई। फ़िल्म में दुख को भी सहज और जीवन-सापेक्ष रूप में दिखाया गया।
मौखिक — एक-दो पंक्तियों में उत्तर
इसे राष्ट्रपति स्वर्णपदक, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार और कई अन्य पुरस्कार मिले। मास्को फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी यह पुरस्कृत हुई।
शैलेंद्र ने केवल एक ही फ़िल्म बनाई — ‘तीसरी कसम’।
मेरा नाम जोकर, सत्यम् शिवम् सुंदरम्, संगम, बॉबी, श्री 420 और आवारा।
नायक राजकपूर ने ‘हीरामन’ (गाड़ीवान) का और नायिका वहीदा रहमान ने ‘हीराबाई’ (नौटंकी कलाकार) का अभिनय किया।
इस फ़िल्म का निर्माण गीतकार शैलेंद्र ने किया था।
राजकपूर ने कल्पना भी नहीं की थी कि इस फ़िल्म का एक ही भाग बनाने में छह वर्ष लग जाएँगे।
कहानी सुनकर राजकपूर ने गंभीरता से कहा — ‘मेरा पारिश्रमिक एडवांस देना होगा।’ इस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया।
फ़िल्म समीक्षक और कला-मर्मज्ञ राजकपूर को ‘आँखों से बात करने वाला कलाकार’ मानते थे।
लिखित (क) — 25-30 शब्दों में उत्तर
यह फ़िल्म कविता की तरह भावपूर्ण, कोमल और संवेदनशील थी। इसमें साहित्यिक कहानी को पूरी सार्थकता के साथ परदे (सैल्यूलाइड) पर उतारा गया। इसकी कलात्मकता और करुणा के कारण इसे सैल्यूलाइड पर लिखी कविता कहा गया।
फ़िल्म में बड़े सितारे और लोकप्रिय गीत थे, फिर भी यह व्यावसायिक मसाला फ़िल्म नहीं थी। इसकी करुणा और संवेदना केवल लाभ-हानि का हिसाब लगाने वाले वितरकों की समझ से परे थी। इसलिए खरीददार नहीं मिल रहे थे।
शैलेंद्र के अनुसार कलाकार को दर्शकों की रुचि के नाम पर उन पर उथलापन नहीं थोपना चाहिए। उसका कर्तव्य है कि वह उपभोक्ता (दर्शक) की रुचियों का परिष्कार करे, यानी उन्हें बेहतर बनाए।
फ़िल्म निर्माता दर्शकों की भावनाओं का शोषण करके अधिक पैसा कमाना चाहते हैं। इसलिए वे दुख को बढ़ा-चढ़ाकर और भयानक रूप में दिखाते हैं, ताकि दर्शक भावुक होकर फ़िल्म देखें।
राजकपूर अपनी भावनाएँ आँखों और अभिनय से व्यक्त करते थे। शैलेंद्र ने उनकी फ़िल्मों के लिए ऐसे गीत लिखे जिनमें राजकपूर की उन्हीं भावनाओं को सुंदर शब्द मिले। इस प्रकार शैलेंद्र के गीत राजकपूर के अभिनय के पूरक बन गए।
शोमैन वह कलाकार होता है जो अपनी प्रतिभा और प्रदर्शन से दर्शकों को आकर्षित कर ले और जिसकी फ़िल्में भव्य और लोकप्रिय हों। राजकपूर अभिनेता, निर्माता और निर्देशक के रूप में ऐसे ही प्रसिद्ध थे।
जयकिशन का विचार था कि आम दर्शक ‘चार दिशाएँ’ तो समझते हैं, पर ‘दस दिशाएँ’ नहीं समझ पाएँगे। इसलिए उन्होंने ‘दसों दिशाओं’ के स्थान पर ‘चारों दिशाओं’ करने का सुझाव दिया।
लिखित (ख) — 50-60 शब्दों में उत्तर
शैलेंद्र एक आदर्शवादी और भावुक कवि थे। उन्हें धन और यश की उतनी इच्छा नहीं थी, जितनी आत्म-संतुष्टि की। वे रेणु की मार्मिक कहानी को पूरी ईमानदारी से परदे पर उतारना चाहते थे। इसलिए खतरों की जानकारी होते हुए भी उन्होंने यह फ़िल्म बनाई।
राजकपूर उस समय एशिया के सबसे बड़े शोमैन थे, फिर भी फ़िल्म में उनका स्टार रूप कहीं दिखाई नहीं देता। वे पूरी तरह एक सीधे-सादे, भोले देहाती गाड़ीवान हीरामन बन गए। हीरामन पर राजकपूर हावी नहीं हुए, बल्कि वे स्वयं हीरामन में समा गए।
फ़िल्म में रेणु की कहानी के भाव, पात्र और वातावरण ज्यों-के-त्यों उतारे गए। कहानी की आत्मा को व्यावसायिक लाभ के लिए बदला नहीं गया। पात्रों के अभिनय, संवाद और गीत मूल रचना के अनुरूप थे। इसलिए लेखक ने कहा कि फ़िल्म ने साहित्य-रचना के साथ पूरा न्याय किया।
- उनके गीत सरल, सहज और भावपूर्ण हैं; दुरूह (कठिन) नहीं।
- उनमें गहरी करुणा के साथ संघर्ष करने का संदेश भी है।
- वे आम आदमी के मन को छूते हैं।
- उनमें झूठा दिखावा नहीं, जीवन का सच्चा अनुभव है।
- वे लोकधुनों और जनभाषा से जुड़े हैं; जैसे — ‘मेरा जूता है जापानी’।
शैलेंद्र व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, आत्म-संतुष्टि के लिए फ़िल्म बना रहे थे। उन्होंने कहानी की मूल संवेदना से कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने दर्शकों पर उथलापन नहीं थोपा। वे फ़िल्म-जगत के चालाक तौर-तरीकों से अनजान थे, इसलिए उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।
शैलेंद्र स्वयं सरल, भोले और भावुक व्यक्ति थे। वे धन और यश के लालच से दूर थे। फ़िल्म का नायक हीरामन भी ऐसा ही सीधा-सादा, निश्छल और भावुक व्यक्ति है। शैलेंद्र के जीवन की करुणा, सादगी और संघर्ष फ़िल्म में दिखाई देते हैं।
मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ। इस फ़िल्म में करुणा, कोमल भावनाएँ और सूक्ष्म संवेदनाएँ हैं, जिन्हें केवल एक कवि ही समझ सकता है। एक व्यवसायी निर्माता इसमें मसाला डालकर कहानी को बिगाड़ देता। शैलेंद्र ने कवि की संवेदनशीलता से इसे परदे पर कविता की तरह उतारा।
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लिखित (ग) — आशय स्पष्ट कीजिए
शैलेंद्र को धन और प्रसिद्धि की लालसा नहीं थी। वे मन की संतुष्टि के लिए अच्छा और सच्चा काम करना चाहते थे।
शैलेंद्र मानते थे कि दर्शकों की पसंद का बहाना बनाकर उन्हें घटिया या सतही चीजें नहीं दिखानी चाहिए। कलाकार को दर्शकों की रुचि को सुधारने और ऊँचा उठाने का प्रयास करना चाहिए।
दुख मनुष्य को हराता नहीं है। वह उसे संघर्ष करने और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। शैलेंद्र के गीतों में यही भाव है।
जो लोग केवल पैसे को दुगुना करने (लाभ कमाने) के बारे में सोचते हैं, वे इस फ़िल्म की करुणा और गहरी भावनाओं को नहीं समझ सकते।
शैलेंद्र के गीत भावनाओं से भरे थे, पर कठिन नहीं थे। उन्हें आम आदमी भी आसानी से समझ सकता था।
भाषा अध्ययन
| वाक्य | ‘से’ का प्रयोग |
|---|---|
| (क) मित्र की हैसियत से ... खतरों से आगाह किया | ‘के रूप में’ (रीति) और विषय-बोध |
| (ख) रातें दसों दिशाओं से कहेंगी | स्थान से (दिशा का बोध) |
| (ग) तौर-तरीकों से नावाकिफ़ थे | विषय या संबंध का बोध |
| (घ) दो से चार ... समझ से परे | परिवर्तन (दो से चार) और सीमा (समझ से परे) |
| (ङ) याराना दोस्ती से परिचित | संबंध का बोध |
प्रश्न 2 : वाक्य-संरचना पर ध्यान दें — (क) में ‘नहीं’ से तुलना की गई है, (ख) में ‘जिसे’ से मिश्र वाक्य बना है, (ग) में छोटे उपवाक्यों से तीव्रता आई है, (घ) में ‘जो’ से विशेषण उपवाक्य बना है।
| मुहावरा | वाक्य |
|---|---|
| चेहरा मुरझाना | परीक्षा में कम अंक देखकर रवि का चेहरा मुरझा गया। |
| चक्कर खा जाना | गणित के कठिन प्रश्न देखकर मैं चक्कर खा गया। |
| दो से चार बनाना | व्यापारी हर सौदे में दो से चार बनाने की सोचता है। |
| आँखों से बोलना | माँ ने आँखों से बोलकर मुझे चुप रहने को कहा। |
| शब्द | हिंदी पर्याय |
|---|---|
| शिद्दत | तीव्रता, गहराई |
| याराना | मित्रता |
| बमुश्किल | कठिनाई से |
| खालिस | शुद्ध |
| नावाकिफ़ | अनजान |
| यकीन | विश्वास |
| हावी | प्रभावी, छाया हुआ |
| रेशा | तंतु |
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| चित्रांकन | चित्र + अंकन |
| सर्वोत्कृष्ट | सर्व + उत्कृष्ट |
| चर्मोत्कर्ष | चरम + उत्कर्ष |
| रूपांतरण | रूप + अंतरण |
| घनानंद | घन + आनंद |
| समस्त पद | विग्रह | समास |
|---|---|---|
| कला-मर्मज्ञ | कला का मर्मज्ञ | तत्पुरुष (संबंध) |
| लोकप्रिय | लोक में प्रिय | तत्पुरुष (अधिकरण) |
| राष्ट्रपति | राष्ट्र का पति | तत्पुरुष (संबंध) |
योग्यता विस्तार और परियोजना कार्य
| फ़िल्म | साहित्यिक रचना | भाषा | रचनाकार |
|---|---|---|---|
| देवदास | देवदास | बांग्ला | शरत्चंद्र |
| तीसरी कसम | मारे गए गुलफ़ाम | हिंदी | फणीश्वरनाथ रेणु |
| शतरंज के खिलाड़ी | शतरंज के खिलाड़ी | हिंदी | प्रेमचंद |
| पाथेर पांचाली | पाथेर पांचाली | बांग्ला | बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय |
| गाइड | द गाइड | अंग्रेजी | आर.के. नारायण |
‘तीसरी कसम’ फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित है — मूल कहानी पढ़ें। पुरानी और नई फ़िल्मों की समानता-अंतर पर चर्चा करें और अपने क्षेत्र के दो-तीन लोकगीत एकत्र करें।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अंतराल | के बाद |
| अभिनीत | अभिनय किया गया |
| सर्वोत्कृष्ट | सबसे अच्छा |
| सैल्यूलाइड | कैमरे की रील |
| सार्थकता | सफलता के साथ |
| कलात्मकता | कला से परिपूर्ण |
| संवेदनशीलता | भावुकता |
| शिद्दत | तीव्रता |
| अनन्य | परम, अत्यधिक |
| तन्मयता | तल्लीनता |
| पारिश्रमिक | मेहनताना |
| याराना मस्ती | दोस्ताना अंदाज |
| आगाह | सचेत |
| आत्म-संतुष्टि | अपनी तृप्ति |
| वितरक | फ़िल्म को बाज़ार में लाने वाले |
| नामज़द | विख्यात |
| परिष्कार | सुधार |
| अभिजात्य | कुलीनता |
| उथलापन | सतहीपन |
| भाव-प्रवण | भावों से भरा |
| दुरूह | कठिन |