कक्षा 10 हिंदी · स्पर्श भाग 2 · मैथिलीशरण गुप्त · पद्य खंड

3. मनुष्यता

मैथिलीशरण गुप्त की कविता — सार, प्रश्न-उत्तर, भाव स्पष्टीकरण और शब्दार्थ. NCERT हिंदी स्पर्श (भाग 2).

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पाठ का परिचय : ‘मनुष्यता’ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता है। इसमें कवि बताते हैं कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जीता और मरता है। कवि परोपकार, उदारता, सहानुभूति, विनम्रता और एकता का संदेश देते हैं।

कविता का सार

★कविता संक्षेप में

कवि कहते हैं कि मनुष्य मरणशील है, इसलिए मृत्यु से डरना नहीं चाहिए। मृत्यु ऐसी हो कि लोग उसे सदा याद करें। जो केवल अपने लिए जीता है, वह पशु के समान है। सच्चा मनुष्य वही है जो मनुष्य के लिए मरे।

उदार व्यक्ति की कीर्ति धरती सदा गाती है। रंतिदेव, दधीचि, उशीनर (शिबि) और कर्ण जैसे महान लोगों ने दूसरों के लिए अपना सब कुछ दे दिया। सहानुभूति सबसे बड़ी पूँजी है। धन के घमंड में अंधा नहीं होना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सबके साथ हैं।

सभी मनुष्य एक ही परमपिता की संतान हैं, इसलिए आपस में भाई हैं। हमें एक-दूसरे का सहारा बनकर, विपत्तियों को हटाते हुए, हँसते-खेलते एक साथ आगे बढ़ना चाहिए। स्वयं ऊपर उठें और दूसरों को भी उठाएँ — यही सच्ची मनुष्यता है।

प्रश्न-अभ्यास (क) — निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?

जो व्यक्ति दूसरों की भलाई के लिए जीता और मरता है, उसकी मृत्यु को कवि ने सुमृत्यु कहा है। ऐसे व्यक्ति को मरने के बाद भी लोग याद करते हैं।

2उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?

उदार व्यक्ति दूसरों के दुख को अपना समझता है। वह परोपकार के लिए अपना सब कुछ दे देता है। उसमें भेदभाव नहीं होता। ऐसे व्यक्ति की कीर्ति धरती सदा गाती है और सारी सृष्टि उसकी पूजा करती है।

3कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?

रंतिदेव ने भूखे को अपना भोजन दे दिया। दधीचि ने अपनी हड्डियाँ दान कर दीं। उशीनर ने कबूतर की रक्षा के लिए अपना मांस दिया और कर्ण ने अपना कवच-कुंडल दान कर दिया। इन उदाहरणों से कवि संदेश देते हैं कि परोपकार के लिए हमें अपना सब कुछ त्यागने को तैयार रहना चाहिए। शरीर नश्वर है, पर त्याग अमर है।

4कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?

कवि ने ‘रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में...’ से शुरू होने वाली पंक्तियों में यह भाव व्यक्त किया है। इनमें कवि कहते हैं कि थोड़े-से धन के घमंड में अंधे मत बनो और स्वयं को सनाथ समझकर मन में गर्व मत करो।

5‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

इसका अर्थ है कि संसार के सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई हैं। सब एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान हैं। कर्मों के कारण बाहरी भेद हो सकते हैं, पर भीतर की आत्मा एक है। इसलिए हमें एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए।

6कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?

एकता में ही शक्ति है। मिलकर चलने से विपत्तियाँ और बाधाएँ आसानी से दूर होती हैं। आपसी मेल बढ़ता है और भेदभाव मिटता है। सबका कल्याण भी एकता से ही संभव है। इसलिए कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा दी है।

7व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।
  • दूसरों की भलाई के लिए जीना चाहिए।
  • धन और शक्ति का घमंड नहीं करना चाहिए।
  • सबके प्रति सहानुभूति और दया रखनी चाहिए।
  • सबको अपना भाई समझना चाहिए।
  • विपत्तियों का हँसते हुए सामना करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
  • स्वयं उन्नति करें और दूसरों को भी साथ लेकर चलें।
8‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?

कवि संदेश देते हैं कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जीता है। परोपकार, त्याग, उदारता, सहानुभूति और एकता ही मनुष्यता के गुण हैं। हमें घमंड छोड़कर सबको साथ लेकर चलना चाहिए।

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प्रश्न-अभ्यास (ख) — भाव स्पष्ट कीजिए

1‘सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही...’ वाली पंक्तियाँ

कवि कहते हैं कि मनुष्य में सहानुभूति होनी चाहिए। यही सबसे बड़ी पूँजी है। सहानुभूति से सारी धरती वश में हो जाती है। महात्मा बुद्ध ने करुणा के कारण पुरानी मान्यताओं का विरोध किया, फिर भी सारा संसार उनके आगे विनम्रता से झुक गया।

2‘रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में...’ वाली पंक्तियाँ

कवि कहते हैं कि थोड़े-से धन के घमंड में अंधे नहीं होना चाहिए। अपने को सनाथ समझकर गर्व करना ठीक नहीं। इस संसार में कोई अनाथ नहीं है, क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी ईश्वर सबके साथ हैं। दीनों पर दया करने वाले ईश्वर के हाथ बहुत बड़े हैं।

3‘चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए...’ वाली पंक्तियाँ

कवि कहते हैं कि हमें अपने इच्छित लक्ष्य की ओर हँसते-खेलते बढ़ना चाहिए। रास्ते में आने वाली विपत्तियों और बाधाओं को हटाते चलना चाहिए। आपसी मेल-जोल कम न हो और भेदभाव न बढ़े। हम तर्क-वितर्क छोड़कर एक ही मार्ग पर सावधान यात्री की तरह चलें।

योग्यता विस्तार और परियोजना कार्य

★पौराणिक पात्रों के विषय में जानकारी
  • रंतिदेव : परम दानी राजा। लंबे उपवास के बाद मिला भोजन भी उन्होंने भूखे अतिथि को दे दिया।
  • दधीचि : महान ऋषि। वृत्रासुर के वध के लिए उन्होंने अपनी हड्डियाँ दान कीं, जिनसे इंद्र का वज्र बना।
  • उशीनर (राजा शिबि) : शरण में आए कबूतर को बचाने के लिए उन्होंने बाज को अपने शरीर का मांस दे दिया।
  • कर्ण : कुंती पुत्र और महान दानी। उन्होंने अपने प्राण-रक्षक कवच-कुंडल भी इंद्र को दान कर दिए।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
मर्त्यमरणशील
उदारदानशील, सहृदय
कृतार्थआभारी, धन्य
कीर्तियश
क्षुधार्तभूख से व्याकुल
करस्थहाथ में लिया हुआ
परार्थदूसरों के लिए
अस्थिजालहड्डियों का समूह
क्षितीशराजा
महाविभूतिबड़ी भारी पूँजी
वशीकृतावश में की हुई
मदांधगर्व से अंधा
वित्तधन-संपत्ति
परस्परावलंबएक-दूसरे का सहारा
अमर्त्य-अंकदेवता की गोद
अपंककलंक-रहित
स्वयंभूपरमात्मा
अंतरैक्यआत्मा की एकता
अभीष्टइच्छित
अतर्कतर्क से परे
सतर्क पंथसावधान यात्री