कक्षा 10 हिंदी · स्पर्श भाग 2 · सुमित्रानंदन पंत · पद्य खंड

4. पर्वत प्रदेश में पावस

सुमित्रानंदन पंत की कविता — सार, प्रश्न-उत्तर, भाव स्पष्टीकरण और मानवीकरण. NCERT हिंदी स्पर्श (भाग 2).

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पाठ का परिचय : ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की कविता है। इसमें वर्षा ऋतु में पहाड़ी प्रदेश की प्रकृति के पल-पल बदलते रूप का सजीव चित्रण है। कवि ने पर्वत, तालाब, झरनों, पेड़ों और बादलों का मानवीकरण किया है।

कविता का सार

★कविता संक्षेप में

वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश की प्रकृति पल-पल अपना वेश बदल रही है। करधनी के आकार का विशाल पर्वत अपने फूल रूपी हजारों नेत्रों से नीचे फैले तालाब के दर्पण में अपना रूप निहार रहा है।

पर्वतों से गिरते झरने झाग भरे हैं और पर्वत का गौरव गाते हुए लगते हैं। पर्वत के हृदय से उठे ऊँचे पेड़ शांत आकाश की ओर एकटक और चिंतित होकर देख रहे हैं।

अचानक बादल छा जाते हैं और पर्वत पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर उड़ता-सा लगता है। केवल झरनों का शोर शेष रह जाता है। लगता है आकाश धरती पर टूट पड़ा हो। डर के मारे शाल के पेड़ धरती में धँसे-से लगते हैं और तालाब से धुआँ उठता है। बादलों के यान में घूमता इंद्र मानो जादू का खेल दिखा रहा है।

प्रश्न-अभ्यास (क) — निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1पावस ऋतु में प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
  • प्रकृति पल-पल अपना वेश बदलती है।
  • कभी धूप निकलती है, तो कभी बादल छा जाते हैं।
  • पर्वत पर खिले फूल आँखों जैसे लगते हैं और तालाब दर्पण जैसा चमकता है।
  • झरने झाग भरकर झर-झर बहते हैं।
  • बादल छाने पर पर्वत दिखाई नहीं देते, केवल झरनों की आवाज सुनाई देती है।
  • घनघोर वर्षा से लगता है मानो आकाश धरती पर टूट पड़ा हो।
2‘मेखलाकार’ शब्द का क्या अर्थ है? कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ क्यों किया है?

‘मेखलाकार’ का अर्थ है — करधनी (मेखला) के आकार का। पहाड़ की ढलान गोलाई में दूर तक फैली हुई है, जैसे कमर में करधनी होती है। पर्वत की इसी विशालता और आकृति को दिखाने के लिए कवि ने इस शब्द का प्रयोग किया है।

3‘सहस्र दृग-सुमन’ से क्या तात्पर्य है? कवि ने इस पद का प्रयोग किसके लिए किया होगा?

‘सहस्र दृग-सुमन’ का अर्थ है — फूल रूपी हजारों आँखें। कवि ने इसका प्रयोग पर्वत पर खिले हजारों फूलों के लिए किया है। ये फूल पर्वत की आँखें बनकर नीचे तालाब में उसका प्रतिबिंब निहारते हुए लगते हैं।

4कवि ने तालाब की समानता किसके साथ दिखाई है और क्यों?

कवि ने तालाब की समानता दर्पण (आईने) के साथ दिखाई है। तालाब का जल स्वच्छ और निर्मल है। उसमें पर्वत का प्रतिबिंब दर्पण की तरह साफ दिखाई देता है।

5पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर क्यों देख रहे थे और वे किस बात को प्रतिबिंबित करते हैं?

पेड़ ऊँचा उठने की इच्छा (उच्चाकांक्षा) लेकर शांत आकाश की ओर एकटक देख रहे थे। वे मनुष्य की ऊँची आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करते हैं। वे स्थिर, अटल और कुछ चिंतित दिखाई देते हैं, जैसे कोई गहरी सोच में डूबा हो।

6शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में क्यों धँस गए?

अचानक घने बादल छा गए और तेज वर्षा होने लगी। लगा कि आकाश धरती पर टूट पड़ा है। चारों ओर धुंध छा गई। इस भयंकर दृश्य से डरकर शाल के पेड़ मानो धरती में धँस गए। वास्तव में धुंध के कारण वे दिखाई नहीं दे रहे थे।

7झरने किसके गौरव का गान कर रहे हैं? बहते हुए झरने की तुलना किससे की गई है?

झरने पर्वत के गौरव का गान कर रहे हैं। बहते हुए झाग भरे झरनों की तुलना मोतियों की लड़ियों से की गई है।

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प्रश्न-अभ्यास (ख) — भाव स्पष्ट कीजिए

1‘है टूट पड़ा भू पर अंबर।’

वर्षा इतनी तेज और घनघोर है कि बादल धरती से मिलते हुए लगते हैं। चारों ओर धुंध छा जाती है। ऐसा लगता है मानो आकाश ही धरती पर टूट पड़ा हो।

2‘यों जलद-यान में विचर-विचर ... इंद्रजाल।’

बादल पल-पल अपना रूप बदल रहे हैं। ऐसा लगता है कि वर्षा के देवता इंद्र बादल रूपी विमान में घूम-घूमकर जादू का खेल दिखा रहे हैं। प्रकृति के बदलते दृश्य इंद्र के जादू जैसे लगते हैं।

3‘गिरिवर के उर से उठ-उठ कर ...’ वाली पंक्तियाँ

पर्वत की छाती से उगे ऊँचे पेड़ ऊपर उठने की इच्छा लेकर शांत आकाश की ओर एकटक देख रहे हैं। वे स्थिर, अटल और कुछ चिंतित लगते हैं। ये पेड़ मनुष्य की ऊँची महत्वाकांक्षाओं के प्रतीक हैं।

कविता का सौंदर्य

1इस कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किस प्रकार किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
  • पर्वत को फूल रूपी आँखों से तालाब के दर्पण में अपना रूप देखते हुए दिखाया गया है।
  • झरनों को पर्वत का गौरव गाते हुए दिखाया गया है।
  • पेड़ों को ऊँची आकांक्षा लेकर चिंतित भाव से आकाश को निहारते दिखाया गया है।
  • शाल के पेड़ों को डरकर धरती में धँसते दिखाया गया है।
  • इंद्र को बादल-यान में घूमकर जादू दिखाते बताया गया है।
2आपकी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य इनमें से किस पर निर्भर करता है — (क) शब्दों की आवृत्ति (ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा (ग) संगीतात्मकता?

उत्तर : (ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा पर

कविता के शब्द पढ़ते ही आँखों के सामने पर्वत, तालाब, झरनों और बादलों का चित्र बन जाता है। फिर भी ‘पल-पल’, ‘उठ-उठ’, ‘विचर-विचर’ जैसी आवृत्ति और लय भी सौंदर्य बढ़ाती हैं।

3चित्रात्मक शैली में पावस ऋतु का सजीव चित्र अंकित करने वाले स्थल
  • करधनी के आकार का पर्वत तालाब के दर्पण में अपना रूप निहार रहा है।
  • मोतियों की लड़ियों जैसे झाग भरे झरने झर रहे हैं।
  • पर्वत पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर उड़ता-सा लगता है।
  • शाल के पेड़ धरती में धँसे-से लगते हैं और तालाब से धुआँ उठता है।

योग्यता विस्तार और परियोजना कार्य

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
पावसवर्षा ऋतु
मेखलाकारकरधनी के आकार की पहाड़ की ढाल
सहस्रहजार
दृग-सुमनपुष्प रूपी आँखें
अवलोकदेखना
महाकारविशाल आकार
दर्पणआईना
उरहृदय
उच्चाकांक्षाऊँचा उठने की कामना
तरुवरपेड़
नीरव नभशांत आकाश
अनिमेषएकटक
भूधरपहाड़
पारद के परपारे जैसे चमकीले पंख
रव-शेषकेवल आवाज का रह जाना
सभयभय के साथ
जलद-यानबादल रूपी विमान
इंद्रजालजादूगरी