2. गोल
मेजर ध्यानचंद के संस्मरण ‘गोल’ के सभी अभ्यास, खेल ‘डाँडी या गोथा’ और पठन-सामग्री ‘एक दौड़ ऐसी भी’ — सरल भाषा में प्रश्न-उत्तर। NCERT मल्हार, कक्षा 6.
शेयर करेंAdvertisement
इस पृष्ठ पर संस्मरण ‘गोल’ के सभी प्रश्नों के उत्तर, खेल ‘डाँडी या गोथा’ पर गतिविधियाँ और पठन-सामग्री ‘एक दौड़ ऐसी भी’ दी गई है। खुले प्रश्नों के उत्तर नमूने के रूप में दिए गए हैं।
पाठ का सार : यह पाठ मेजर ध्यानचंद के संस्मरण का अंश है। सन् 1933 में एक मैच में विरोधी टीम के खिलाड़ी ने गुस्से में उनके सिर पर हॉकी स्टिक मार दी। ध्यानचंद पट्टी बाँधकर फिर मैदान में आए। उन्होंने बदला लेने के लिए झटपट छह गोल कर दिए। फिर उस खिलाड़ी से कहा कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। वह खिलाड़ी बहुत शर्मिंदा हुआ। ध्यानचंद के अनुसार लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के मंत्र हैं। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में वे भारतीय टीम के कप्तान थे। भारत ने स्वर्ण पदक जीता। लोग उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहने लगे।
पाठ से — मेरी समझ से
(1) मेजर ध्यानचंद की इस बात से उनके बारे में क्या पता चलता है? — वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए। ★
(2) लोगों ने मेजर ध्यानचंद को ‘हॉकी का जादूगर’ कहना क्यों शुरू कर दिया? — उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण ★
- ध्यानचंद ने मार का बदला मारकर नहीं, गोल करके लिया। फिर उन्होंने खिलाड़ी को गुस्सा न करने की सलाह दी। इससे पता चलता है कि वे खेल भावना को समझते थे।
- बर्लिन ओलंपिक में लोग उनके हॉकी खेलने के ढंग से प्रभावित हुए थे। इसलिए उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा गया।
मिलकर करें मिलान
| शब्द | अर्थ या संदर्भ |
|---|---|
| 1. लांस नायक | भारतीय सेना का एक पद (रैंक) है। |
| 2. बर्लिन ओलंपिक | वर्ष 1936 में जर्मनी के बर्लिन शहर में आयोजित ओलंपिक खेल प्रतियोगिता, जिसमें 49 देशों ने भाग लिया था। |
| 3. पंजाब रेजिमेंट | स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज़ों की भारतीय सेना का एक दल। |
| 4. सैंपर्स एंड माइनर्स टीम | अंग्रेज़ों के समय का एक हॉकी दल। |
| 5. सूबेदार | स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अधिकारियों का दूसरा सबसे बड़ा पद था। |
| 6. छावनी | सैनिकों के रहने का क्षेत्र। |
पंक्तियों पर चर्चा
जो व्यक्ति किसी के साथ बुरा करता है, उसका मन शांत नहीं रहता। उसे हर समय डर लगता है कि सामने वाला भी उसके साथ बुरा करेगा। जैसे हॉकी मारने वाला खिलाड़ी हर समय ध्यानचंद को देखता रहा कि वे कब बदला लेंगे।
ध्यानचंद स्वयं गोल करने के बजाय गेंद साथी खिलाड़ी को दे देते थे। वे चाहते थे कि गोल का श्रेय साथी को मिले। यही सच्ची खेल भावना है। इसी कारण दुनिया के खेल प्रेमी उन्हें बहुत पसंद करने लगे।
सोच-विचार के लिए
ध्यानचंद की सफलता का रहस्य था — लगन, साधना और खेल भावना। वे लगातार अभ्यास करते थे। वे हार-जीत को पूरे देश की हार-जीत मानते थे।
- वे गेंद को गोल के पास ले जाकर साथी खिलाड़ी को दे देते थे, ताकि गोल का श्रेय उसे मिले।
- वे मानते थे कि हार या जीत उनकी नहीं, पूरे देश की है।
- उन्होंने मारने वाले खिलाड़ी को भी प्यार से समझाया।
संस्मरण की रचना
- लेखक अपनी यादें ‘मैं’ शैली में स्वयं बता रहा है।
- इसमें सच्ची घटनाओं का वर्णन है।
- घटनाओं के साथ वर्ष भी दिए गए हैं, जैसे — 1905, 1933, 1936।
- भाषा सरल है, मानो लेखक पाठक से बातें कर रहा हो।
- बीच-बीच में संवाद हैं, जैसे — “तुम चिंता मत करो...”।
- पाठक से सीधे प्रश्न किया गया है — “तो देखा आपने मेरा बदला लेने का ढंग?”
- अंत में जीवन की सीख दी गई है।
(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए। (कक्षा गतिविधि)
Advertisement
शब्दों के जोड़े, विभिन्न प्रकार के
बात पर बल देना
- “खेल में तो यह सब चलता ही है।” — ‘तो’ और ‘ही’ से पता चलता है कि यह बात बिल्कुल सामान्य है।
- “उन दिनों भी यह सब चलता था।” — ‘भी’ से पता चलता है कि पहले के समय में भी ऐसा होता था।
- “अब हर समय मुझे ही देखता रहता...” — ‘ही’ से पता चलता है कि वह केवल ध्यानचंद को देखता था।
- “मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है।” — ‘तो’ और ‘ही’ से बदला पूरा होने पर ज़ोर दिया गया है।
- “शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।” — ‘ही’ से पता चलता है कि केवल दो गोल होते, अधिक नहीं।
- “उसके साथ भी बुराई की जाएगी।” — ‘भी’ से पता चलता है कि उसके साथ वैसा ही होगा।
- “मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती...” — ‘तो’ से अपनी बात पर बल दिया गया है।
ये शब्द न होते तो वाक्य का अर्थ सामान्य हो जाता। बात पर ज़ोर नहीं पड़ता।
पाठ से आगे — आपकी बात
हाँ, मैं भी ध्यानचंद की तरह बदला लेता/लेती। मैं मारपीट नहीं करता/करती। मैं अपने अच्छे खेल से अधिक गोल करके मैच जीतता/जीतती। इससे उस खिलाड़ी को अपनी गलती का एहसास हो जाता।
मुझे क्रिकेट और खो-खो सबसे अच्छे लगते हैं। क्रिकेट में मुझे विराट कोहली अच्छे लगते हैं। वे बहुत मेहनती हैं और अपनी फिटनेस का पूरा ध्यान रखते हैं। वे हार नहीं मानते और अंत तक लड़ते हैं।
यह नमूना है। आप अपने प्रिय खेल और खिलाड़ी के बारे में लिखिए।
समाचार-पत्र से
(क) पिछले सप्ताह के समाचार-पत्रों में से अपनी पसंद का एक खेल-समाचार चुनकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए। (स्वयं करने की गतिविधि)
नमस्कार! मैं आपके लिए विद्यालय के मैदान से कबड्डी का आँखों देखा हाल सुना रहा/रही हूँ। आज लाल दल और नीला दल आमने-सामने हैं। लाल दल के रोहन ‘कबड्डी-कबड्डी’ बोलते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
उन्होंने फुर्ती से दो खिलाड़ियों को छू लिया! नीले दल ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, पर रोहन बचकर अपने पाले में लौट आए। दर्शक तालियाँ बजा रहे हैं। लाल दल को दो अंक मिले!
यह कक्षा में समूह में करने की गतिविधि है। ऊपर का नमूना देखकर आप भी किसी खेल की कमेंटरी तैयार कीजिए।
डायरी का प्रारंभ
15 जुलाई, सोमवार — आज विद्यालय में हमने ‘गोल’ पाठ पढ़ा। मुझे मेजर ध्यानचंद के बदला लेने का ढंग बहुत अच्छा लगा। शाम को मैंने मैदान में मित्रों के साथ फुटबॉल खेली। आज मैंने तय किया कि मैं भी खेल में कभी गुस्सा नहीं करूँगा/करूँगी।
यह नमूना है। आप अपने दिन की बातें अपने शब्दों में लिखिए।
आज की पहेली
दाईं ओर खड़ी नारंगी कुर्ती और नीली स्कर्ट वाली लड़की द्वारा गोल किया जाएगा। उसकी हरी गेंद वाला रास्ता ही सीधे गोलपोस्ट तक पहुँचता है। बाकी दोनों खिलाड़ियों के रास्ते आपस में उलझकर बीच में ही रुक जाते हैं।
झरोखे से — डाँडी या गोथा
डाँडी या गोथा भील-भिलाला बच्चों का खेल है। ‘डाँडी’ और ‘गोथा’ दोनों का अर्थ है — खेलने की हाथ-लकड़ी। यह खेल हॉकी जैसा है। इसमें गोलपोस्ट नहीं होते। गेंद बाँस के गुट्टे की बनी होती है, जिसे ‘दुईत’ कहते हैं। जो दल गेंद को अधिक बार विरोधी के पाले में धकेलता है, वही जीतता है। गेंद को शरीर से छूना और हवाई शॉट मारना मना है। यह खेल होली से कुछ दिन पहले खेला जाता है।
साझी समझ
(क) नियम समझकर अपने मित्रों के साथ ‘डाँडी’ या ‘गोथा’ खेल खेलिए। (मैदान पर करने की गतिविधि)
खेल — खो-खो
- दो दल होते हैं। हर दल में 12 खिलाड़ी होते हैं, पर मैदान में 9 खिलाड़ी खेलते हैं।
- पीछा करने वाले दल के 8 खिलाड़ी बीच की पंक्ति में बारी-बारी से उलटी दिशा में मुँह करके बैठते हैं।
- नौवाँ खिलाड़ी खड़ा होकर विरोधी दल के खिलाड़ियों का पीछा करता है।
- वह बैठे साथी की पीठ छूकर ‘खो’ बोलता है। तब वह साथी उठकर पीछा करता है।
- पीछा करने वाला बीच की पंक्ति को पार नहीं कर सकता।
- जिस खिलाड़ी को छू लिया जाता है, वह खेल से बाहर हो जाता है।
- तय समय में जो दल अधिक खिलाड़ियों को बाहर करता है, वही जीतता है।
खोजबीन के लिए : मेजर ध्यानचंद से जुड़ी फ़िल्में, प्रेरक गाथाएँ और साक्षात्कार पुस्तक के क्यू.आर. कोड से देखिए और समझिए।
पढ़ने के लिए : एक दौड़ ऐसी भी
कहानी का सार : ओलंपिक में 100 मीटर की एक दौड़ में नौ विकलांग प्रतिभागी दौड़ रहे थे। दौड़ते समय एक छोटा लड़का ठोकर खाकर गिर पड़ा और रोने लगा। उसकी पुकार सुनकर बाकी सब प्रतिभागी लौट आए। उन्होंने उसे उठाया, आँसू पोंछे और धूल साफ़ की। फिर सबने हाथ पकड़कर एक साथ दौड़ पूरी की। निर्णायकों ने सबको स्वर्ण पदक दिए। दर्शक बहुत देर तक तालियाँ बजाते रहे।
सभी नौ प्रतिभागियों को कोई-न-कोई शारीरिक विकलांगता थी।
सब प्रतिभागी दौड़ छोड़कर उसके पास लौट आए। उन्होंने उसे खड़ा किया, आँसू पोंछे और धूल साफ़ की। फिर सबने हाथ पकड़कर साथ-साथ दौड़ पूरी की।
सब एक साथ अंतिम रेखा तक पहुँचे थे। इसलिए निर्णायकों ने सभी को स्वर्ण पदक दे दिए।
जीत से बड़ी मित्रता और सहयोग की भावना है। हमें मुसीबत में पड़े साथी की सहायता करनी चाहिए।