5. कबीर के दोहे
संत कबीर के आठ दोहे — सरल भावार्थ, मेरी समझ से, मिलान, दोहे की रचना, अनुमान और कल्पना, आज के समय में और ‘कदम मिलाकर चलना होगा’ का भाव।
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पाठ का परिचय : इस पाठ में संत कबीर के आठ दोहे हैं। इनमें सत्य, गुरु का महत्व, मधुर वाणी, संतुलन, उदारता, अच्छी संगति और विवेक जैसी जीवन की सीख दी गई है।
दोहों का भावार्थ
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥
सत्य के बराबर कोई तपस्या नहीं है और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं है। जिसके हृदय में सत्य है, उसके हृदय में स्वयं ईश्वर (गुरु) बसते हैं।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥
केवल बड़ा होने से कोई लाभ नहीं। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर वह राहगीर को छाया नहीं देता और उसके फल भी बहुत दूर लगते हैं। बड़प्पन तभी है जब हम दूसरों के काम आएँ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
गुरु और ईश्वर दोनों सामने खड़े हैं, पहले किसके पैर छुऊँ? मैं गुरु पर न्योछावर हूँ, क्योंकि उन्होंने ही ईश्वर का ज्ञान कराया है। इसलिए गुरु का स्थान सबसे ऊँचा है।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
न बहुत अधिक बोलना अच्छा है, न बहुत अधिक चुप रहना। न बहुत अधिक वर्षा अच्छी है, न बहुत अधिक धूप। जीवन में हर चीज में संतुलन होना चाहिए।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥
मन का अहंकार छोड़कर ऐसी मीठी वाणी बोलनी चाहिए जो सुनने वालों को शांति दे और बोलने वाले को भी शांति मिले।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
अपनी निंदा (आलोचना) करने वाले को आँगन में कुटिया बनाकर पास रखना चाहिए। वह हमारी कमियाँ बताकर बिना पानी और साबुन के हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
सज्जन व्यक्ति सूप जैसा होना चाहिए। सूप अनाज के अच्छे दाने रख लेता है और भूसा-कचरा उड़ा देता है। उसी तरह सज्जन अच्छी बातें ग्रहण करे और बेकार बातें छोड़ दे।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
कबीर कहते हैं कि मन पक्षी की तरह है, जहाँ चाहता है उड़ जाता है। मनुष्य जैसी संगति करता है, वैसा ही फल पाता है। इसलिए अच्छी संगति करनी चाहिए।
मेरी समझ से
उत्तर : गुरु का महत्व
उत्तर : हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है
उत्तर : दूसरों के काम आनासभी के प्रति उदार रहना
उत्तर : दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है
उत्तर : सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं हैसत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है
उत्तर : आलोचकों को पास रखना चाहिए
उत्तर : विवेक और सूझबूझ का
(ख) अपने उत्तर मित्रों के उत्तरों से मिलाइए और कारणों पर चर्चा कीजिए। (कक्षा-गतिविधि)
मिलकर करें मिलान
| स्तंभ 1 | स्तंभ 2 |
|---|---|
| 1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय। | गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं। |
| 2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। | जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है। |
| 3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। | हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके। |
| 4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। | आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं। |
| 5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। | विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है। |
| 6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। | मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है। |
| 7. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। | सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है। |
| 8. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। | बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए। |
| पहली पंक्ति | दूसरी पंक्ति |
|---|---|
| 1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय। | बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥ |
| 2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। | अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥ |
| 3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। | औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥ |
| 4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। | बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥ |
| 5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। | सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥ |
| 6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। | जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥ |
| 7. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। | पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥ |
| 8. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। | जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥ |
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पंक्तियों पर चर्चा
मन पक्षी की तरह चंचल है। वह जहाँ चाहे उड़ जाता है। इसलिए मन को अच्छी संगति में लगाना चाहिए। अच्छी संगति से अच्छा फल मिलता है और बुरी संगति से बुरा।
सच बोलना सबसे बड़ी तपस्या है और झूठ बोलना सबसे बड़ा पाप। जिसके मन में सच्चाई है, उसके मन में भगवान स्वयं निवास करते हैं।
सोच-विचार के लिए
हाँ, मैं सहमत हूँ। गुरु ही हमें अच्छे-बुरे का ज्ञान कराते हैं। गुरु के बिना हम सही रास्ता नहीं पहचान सकते। गुरु ने ही हमें ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है। इसलिए गुरु का स्थान सबसे ऊँचा है।
- उदारता और परोपकार की भावना
- विनम्रता — अहंकार न होना
- दूसरों की सहायता करने की इच्छा
- दया और करुणा
- ईमानदारी और सच्चाई
हाँ, शब्दों का प्रभाव स्वयं पर भी पड़ता है। एक बार मेरा मित्र परीक्षा में कम अंक आने से उदास था। मैंने उससे प्यार से कहा कि अगली बार तुम जरूर अच्छा करोगे। वह मुसकरा उठा। उसे खुश देखकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा। मीठे शब्द दोनों के मन को शांति देते हैं।
जैसी संगति होती है, वैसे ही हमारे विचार और काम बनते हैं। मेहनती दोस्तों के साथ रहने से हम भी पढ़ाई में मन लगाते हैं। बुरी आदतों वाले दोस्तों के साथ रहकर हम भी गलत रास्ते पर चले जाते हैं। इसीलिए कहा गया है — ‘जैसा संग वैसा रंग’।
दोहे की रचना
- एक ही अक्षर से प्रारंभ होने वाले शब्द — गुरु गोविंद दोऊ खड़े; निंदक नियरे राखिए; जो जैसी संगति करै।
- एक शब्द दो बार — सार सार को गहि रहै।
- केवल एक मात्रा का अंतर — अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप। (भला-भली, का-की)
- विपरीतार्थक शब्द — साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप; अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप; सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।
- तुलना — बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर; साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
- अन्य नाम देना — कबिरा मन पंछी भया।
- अलग वर्तनी — चूप (चुप), सीतल (शीतल), हिरदे (हृदय), साँच (सच), बानी (वाणी), सुभाय (स्वभाव), साधू (साधु)।
- उदाहरण द्वारा बात समझाना — बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥
(ख) अपने समूह की सूची कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
अनुमान और कल्पना से
- मैं भी पहले गुरु के पैर छूता, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर का ज्ञान कराया है।
- यदि गुरु या शिक्षक न होते तो हम अज्ञानी रह जाते। अच्छे-बुरे का भेद नहीं समझ पाते।
- बहुत बोलने वाले की बात का महत्व घट जाता है। बहुत चुप रहने वाला अपनी बात नहीं कह पाता।
- अधिक वर्षा से बाढ़ आती है। कम वर्षा से सूखा पड़ता है।
- अधिक मोबाइल चलाने से आँखें कमजोर होती हैं, नींद कम होती है और पढ़ाई में मन नहीं लगता।
- झूठ बोलने से लोगों का विश्वास टूट जाता है। एक झूठ छिपाने के लिए कई झूठ बोलने पड़ते हैं।
- मैं शिक्षक को बता दूँगा कि मेरा उत्तर गलत है, इसलिए मेरे अंक ठीक कर दें।
- सबकी वाणी मधुर हो जाए तो झगड़े कम होंगे। लोगों में प्रेम और भाईचारा बढ़ेगा।
- हाँ, जब कोई बड़ी गलती करने जा रहा हो या किसी को खतरे से बचाना हो, तब कठोर शब्द कहने पड़ सकते हैं।
- मैं उसे समझाऊँगा कि सच्चा बड़प्पन दूसरों के काम आने में है, घमंड करने में नहीं।
- खजूर और नारियल के फल खाने के काम आते हैं। इनके पत्तों से चटाई, झाड़ू और छप्पर बनते हैं।
- कक्षा नायक चुनते समय मैं ईमानदारी, अनुशासन, सबकी मदद करने का स्वभाव और नेतृत्व क्षमता देखूँगा।
- गलतियाँ बताने वाले से हमें अपनी कमियाँ सुधारने का अवसर मिलता है।
- यदि कोई गलतियाँ न बताए तो सब अपनी गलतियाँ दोहराते रहेंगे और समाज में सुधार नहीं होगा।
- मैं अच्छी बातें अपनाऊँगा और बुरी बातें छोड़ दूँगा। मेरा जीवन बेहतर बनेगा।
- बिना सोचे हर बात मान लेने से हम गलत सूचना और धोखे का शिकार हो सकते हैं।
- मैं मन को हिमालय की ऊँची चोटियों पर ले जाता, क्योंकि वहाँ शांति और सुंदरता है।
- अच्छी संगति से अच्छे संस्कार आते हैं। बुरी संगति से बुरी आदतें लग जाती हैं।
वाद-विवाद
पक्ष — वाणी पर संयम आवश्यक है। ज्यादा बोलने से झगड़े होते हैं। सोशल मीडिया पर अधिक बोलना और अधिक जानकारी देना भी खतरनाक है।
विपक्ष — अत्यधिक चुप रहना भी उचित नहीं है। अन्याय देखकर चुप रहना गलत है। अपनी बात सही समय पर कहनी चाहिए।
शब्द से जुड़े शब्द
बानी —
कबीर —
दोहे और कहावतें
- जैसा संग वैसा रंग — रमेश गलत दोस्तों के साथ रहकर बिगड़ गया; सच है, जैसा संग वैसा रंग।
- जैसी करनी वैसी भरनी — उसने परीक्षा में नकल की और पकड़ा गया; जैसी करनी वैसी भरनी।
- बूँद-बूँद से घड़ा भरता है — रोज थोड़ी बचत करो, बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।
- अधजल गगरी छलकत जाय — कम जानकार अधिक दिखावा करता है; अधजल गगरी छलकत जाय।
- नाच न जाने आँगन टेढ़ा — खेल न आने पर वह मैदान को दोष देने लगा; नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
सबकी प्रस्तुति : किसी एक दोहे को गायन, भाव-नृत्य, कविता पाठ या अभिनय द्वारा कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
पाठ से आगे
हाँ, मेरी कक्षा अध्यापिका ने मुझे सही दिशा दिखाई। मुझे मंच पर बोलने से डर लगता था। उन्होंने मुझे रोज अभ्यास कराया। आज मैं विद्यालय की सभा में आत्मविश्वास से बोलता हूँ।
मेरी लिखावट खराब थी। मेरे बड़े भाई ने यह बात बार-बार कही। पहले मुझे बुरा लगा। फिर मैंने रोज सुलेख का अभ्यास किया। अब मेरी लिखावट सुंदर हो गई है।
हाँ। मेरा एक मित्र रोज सुबह जल्दी उठकर दौड़ने जाता है। उसके साथ रहकर मैंने भी सुबह जल्दी उठना शुरू किया। अब मैं पहले से अधिक स्वस्थ और चुस्त हूँ।
सृजन
विद्यालय में कबड्डी का अंतिम मैच था। हमारी टीम एक अंक से पीछे थी। हमारे कप्तान ने कहा कि विरोधी खिलाड़ी को धक्का देकर अंक ले लो, रेफरी नहीं देखेगा। मैंने मना कर दिया और कहा कि जीत ईमानदारी से ही अच्छी लगती है। हम मैच हार गए। पर रेफरी ने हमारे खेल की प्रशंसा की और हमारी टीम को ‘खेल भावना पुरस्कार’ मिला। उस दिन मुझे समझ आया कि सच का साथ देने वाला कभी हारता नहीं।
(ख) अपने किसी प्रेरणादायक शिक्षक से साक्षात्कार करके उनके योगदान पर निबंध लिखिए। (स्वयं करें)
कबीर हमारे समय में
मोबाइल पर —
मोबाइल में खोय के, भूले सगरे काम।
नैनन को दुख देत है, मिलै न तनिक आराम॥
पानी पर —
पानी राखो सोच के, बिन पानी सब सून।
बूँद-बूँद जो जोड़ता, सो पावै सुख दून॥
साइबर सुरक्षा और दोहे
- हमारी निजी जानकारी गलत लोगों तक पहुँच सकती है।
- ऑनलाइन धोखाधड़ी और ठगी हो सकती है।
- फोटो और जानकारी का गलत उपयोग हो सकता है।
- झूठी खबर फैलाने से समाज में भ्रम फैलता है।
इंटरनेट पर सही और गलत दोनों तरह की जानकारी होती है। इसलिए सूप की तरह अच्छी जानकारी रखनी चाहिए और बेकार छोड़ देनी चाहिए। जानकारी को सरकारी या विश्वसनीय वेबसाइट से मिलाकर देखना चाहिए। अनजान लिंक पर क्लिक नहीं करना चाहिए।
आज के समय में
- अमित की गलत संगति — कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
- इंटरनेट पर सही जानकारी चुनना — साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
- मित्र द्वारा आलोचना — निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
- रीमा का गुस्सा — ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥
- मोहन और रमेश — अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
- सुरेश का सम्मान — गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
खोजबीन के लिए : कबीर के भजन, गीत और लोकगीत खोजकर सुनिए। किसी एक गीत को लेखन-पुस्तिका में लिखिए और कक्षा के लिए पुस्तिका बनाइए।
पढ़ने के लिए — कदम मिलाकर चलना होगा
यह कविता पूर्व प्रधानमंत्री और कवि अटल बिहारी वाजपेयी की है। कवि कहते हैं कि जीवन में बाधाएँ आएँ, संकट की घटाएँ घिरें, पाँवों के नीचे अंगारे हों, फिर भी हमें हँसते-हँसते आगे बढ़ना होगा।
सुख-दुख, मान-अपमान, जीत-हार, अँधेरे-उजाले — हर स्थिति में हमें सिर ऊँचा रखकर चलना है। अपने निजी सुखों का त्याग करके, बिना कुछ माँगे, दूसरों के हित के लिए जीवन अर्पित करना है।
संदेश — देश और समाज की उन्नति के लिए हम सबको एकजुट होकर, कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।