6. एक टोकरी भर मिट्टी
माधवराव सप्रे की कहानी — सार, मेरी समझ से, मिलान, सोच-विचार, कि-की, मुहावरे, काल, वचन, शब्दकोश, भावों की पहचान, पत्र, डायरी और पहेली के उत्तर।
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पाठ का परिचय : ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ माधवराव सप्रे की कहानी है। इसे हिंदी की आरंभिक कहानियों में गिना जाता है। एक ज़मींदार गरीब वृद्धा की झोंपड़ी छीन लेता है। वृद्धा एक टोकरी मिट्टी के सहारे उसे उसके अन्याय का अनुभव कराती है।
कहानी का सार
एक ज़मींदार के महल के पास एक गरीब, अनाथ वृद्धा की झोंपड़ी थी। उसी झोंपड़ी में उसका पति और बेटा मर गए थे। अब उसकी पाँच साल की पोती ही उसका सहारा थी। ज़मींदार अपने महल का अहाता बढ़ाना चाहता था। वृद्धा ने झोंपड़ी नहीं छोड़ी। तब ज़मींदार ने वकीलों को पैसे देकर अदालत से झोंपड़ी पर कब्जा कर लिया।
एक दिन वृद्धा टोकरी लेकर आई। उसने कहा कि पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। वह झोंपड़ी की मिट्टी से चूल्हा बनाकर रोटी पकाएगी। ज़मींदार ने अनुमति दे दी। वृद्धा ने टोकरी भरकर ज़मींदार से उसे सिर पर रखवाने के लिए हाथ लगाने को कहा। ज़मींदार पूरी ताकत लगाकर भी टोकरी नहीं उठा सका।
तब वृद्धा ने कहा — आपसे एक टोकरी मिट्टी नहीं उठती, तो झोंपड़ी की हजारों टोकरियों का भार जन्म-भर कैसे उठाएँगे? यह सुनकर ज़मींदार की आँखें खुल गईं। उसने वृद्धा से क्षमा माँगी और झोंपड़ी वापस दे दी।
मेरी समझ से
उत्तर : वह अहाते का विस्तार करना चाहता था
उत्तर : विनती और नम्रता से
उत्तर : लगाव
उत्तर : सुखदप्रेरणादायकसकारात्मक
(ख) अपने उत्तर मित्रों के उत्तरों से मिलाइए और कारणों पर चर्चा कीजिए। (कक्षा-गतिविधि)
मिलकर करें मिलान
| वाक्य | सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष |
|---|---|
| 1. अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। | वृद्धावस्था में वृद्धा का सहारा उसकी पोती ही थी। |
| 2. बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर... कब्जा कर लिया। | ज़मींदार ने वकीलों को पैसे देकर कानूनी दावपेंच से झोंपड़ी पर कब्जा किया। |
| 3. आपसे एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठाई जाती... | वृद्धा ने टोकरी को प्रतीक बनाकर ज़मींदार को उसके अन्याय का अनुभव कराया। |
| 4. ज़मींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे। | धन और अहंकार ने ज़मींदार को मानवीयता और करुणा से दूर कर दिया था। |
| 5. कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने वृद्धा से क्षमा माँगी। | अपने द्वारा किए अन्याय पर पछताकर ज़मींदार ने क्षमा माँगी। |
| 6. उसका भार आप जन्म-भर कैसे उठा सकेंगे? | वृद्धा ने प्रतीकात्मक रूप से कहा कि अन्याय का नैतिक भार उठाना आसान नहीं है। |
| 7. कृपा करके इस टोकरी को ज़रा हाथ लगाइए... | वृद्धा ने टोकरी उठाने में सहायता के लिए ज़मींदार से विनम्र निवेदन किया। |
| 8. उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। | झोंपड़ी में प्रवेश करते ही वृद्धा पुराने दिनों के कारण भावुक हो गई। |
पंक्तियों पर चर्चा
वृद्धा ज़मींदार को समझाती है कि उसने गरीब की झोंपड़ी छीनकर बहुत बड़ा अन्याय किया है। जब एक टोकरी मिट्टी इतनी भारी है, तो पूरी झोंपड़ी छीनने के पाप का बोझ वह जीवन-भर कैसे उठाएगा? यहाँ मिट्टी अन्याय के बोझ का प्रतीक है।
वृद्धा के बार-बार हाथ जोड़ने और पैरों पर गिरने से ज़मींदार के मन में दया जागी। वह स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़ा। यहीं से उसके मन में बदलाव शुरू हुआ। पर टोकरी उठाना उसके बस की बात नहीं थी। इससे पता चलता है कि अन्याय का बोझ बहुत भारी होता है।
सोच-विचार के लिए
कहानी की सबसे प्रभावशाली पात्र वृद्धा है। वह गरीब और अकेली है, फिर भी हिम्मत नहीं हारती। वह न लड़ती है, न झगड़ती है। केवल एक टोकरी मिट्टी से वह ज़मींदार को उसकी गलती का अनुभव करा देती है और अपनी झोंपड़ी वापस पा लेती है।
पोती को अपनी झोंपड़ी से बहुत लगाव था। झोंपड़ी छूट जाने से वह दुखी थी। वह कहती थी — अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊँगी। इसलिए उसने खाना-पीना छोड़ दिया था।
ज़मींदार ने चालाक वकीलों को पैसे दिए। वकीलों ने कानूनी दावपेंच लगाए। इस तरह अदालत से उसने झोंपड़ी पर कब्जा कर लिया और वृद्धा को वहाँ से निकाल दिया।
सिर हिलाने का अर्थ है कि ज़मींदार ने वृद्धा को अपनी बात कहने की अनुमति दे दी।
पहले ज़मींदार घमंडी, लालची और कठोर था। उसने वृद्धा को देखते ही नौकरों से उसे हटाने को कहा।
वृद्धा की विनती पर उसके मन में दया आई। वह स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़ा। टोकरी न उठा पाने पर वह लज्जित हुआ। अंत में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और वह विनम्र बन गया।
वृद्धा की बात सुनकर ज़मींदार की आँखें खुल गईं। उसे समझ आया कि उसने धन के घमंड में एक गरीब के साथ अन्याय किया है। उसे पश्चाताप हुआ। इसलिए उसने क्षमा माँगी और झोंपड़ी लौटा दी।
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अनुमान और कल्पना से
वह कहती — “महाराज, आपके पास तो इतना बड़ा महल है। हमारा तो बस यही छोटा-सा घर है। इसी में मेरे दादा, पिता और माँ की यादें हैं। कृपा करके हमारा घर हमें लौटा दीजिए।”
मैं गरीब वृद्धा की झोंपड़ी कभी नहीं छीनता। मैं अपने अहाते को दूसरी दिशा में बढ़ा लेता। मैं वृद्धा और उसकी पोती की सहायता करता।
टोकरी मिट्टी से ठसाठस भरी थी, इसलिए बहुत भारी थी। ज़मींदार को भारी काम करने की आदत भी नहीं थी। साथ ही उसके मन पर अपने अन्याय का बोझ भी था।
यहाँ केवल मिट्टी की बात नहीं है। मिट्टी वृद्धा की यादों, उसके परिवार और उसके जीवन की प्रतीक है। साथ ही यह ज़मींदार के अन्याय और पाप के बोझ की भी प्रतीक है। वृद्धा कहना चाहती है कि गरीब का घर छीनने का बोझ कोई जीवन-भर नहीं उठा सकता।
- अकेली और विधवा स्त्रियों को कोई सहारा नहीं मिलता होगा।
- उन्हें संपत्ति पर अधिकार पाने में कठिनाई होती होगी।
- धनी और ताकतवर लोग उनके साथ अन्याय करते होंगे।
- वे शिक्षित न होने के कारण कानूनी लड़ाई नहीं लड़ पाती होंगी।
बदली कहानी
एक दिन पोती दादी का हाथ छुड़ाकर ज़मींदार के महल पहुँच गई। उसने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, मुझे अपना घर वापस चाहिए। वहीं मेरे माँ-बापू की यादें हैं।” ज़मींदार ने उसे डाँटना चाहा, पर बच्ची की आँखों में आँसू देखकर रुक गया। उसे अपनी बेटी की याद आ गई। उसने सोचा, यदि कोई मेरी बेटी का घर छीन ले तो? उसी शाम उसने वृद्धा को बुलाया, उससे क्षमा माँगी और झोंपड़ी लौटा दी। साथ ही उसने पोती की पढ़ाई का खर्च उठाने का वचन भी दिया।
‘कि’ और ‘की’ का उपयोग
- वृद्धा ने कहा कि वह झोंपड़ी को लेने नहीं आई है।
- वह अपनी पोती की चिंता में दुखी हो गई थी।
- वृद्धा ने प्रार्थना की कि टोकरी को ज़रा हाथ लगाइए।
- पोती हमेशा कहती थी कि वह अपने घर में ही खाना खाएगी।
- झोंपड़ी की मिट्टी से वृद्धा चूल्हा बनाना चाहती थी।
- उसे विश्वास था कि मिट्टी का चूल्हा देखकर पोती खाना खाने लगेगी।
- वृद्धा की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी।
- उसने यह सोचा कि झोंपड़ी से मिट्टी ले जाकर चूल्हा बनाऊँगी।
- वृद्धा के मन की पीड़ा उसकी बातों में झलक रही थी।
- ज़मींदार इतने लज्जित हुए कि टोकरी उठाने की बात मान ली।
- उस झोंपड़ी की हर दीवार वृद्धा की यादों से भरी थी।
मुहावरे
बाल की खाल निकालना — बहुत बारीकी से छोटी-छोटी बातों में दोष ढूँढ़ना।
थैली गरम करना — रिश्वत देना, पैसे देकर काम निकलवाना।
- बाल बाँका न होना — इतनी भयंकर दुर्घटना में भी उसका बाल बाँका न हुआ।
- बाल बराबर — मकड़ी का धागा बाल बराबर पतला होता है।
- बाल बराबर फर्क होना — दोनों जुड़वाँ भाइयों की शक्ल में बाल बराबर भी फर्क नहीं है।
- बाल-बाल बचना — सड़क पार करते समय तेज गाड़ी आई, पर मोहन बाल-बाल बच गया।
काल
| मूल वाक्य | वर्तमान काल | भविष्य काल |
|---|---|---|
| (क) वह गिड़गिड़ाकर बोली। | वह गिड़गिड़ाकर बोल रही है। | वह गिड़गिड़ाकर बोलेगी। |
| (ख) श्रीमान् ने आज्ञा दे दी। | श्रीमान् आज्ञा दे रहे हैं। | श्रीमान् आज्ञा दे देंगे। |
| (ग) उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। | उसकी आँखों से आँसू की धारा बह रही है। | उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगेगी। |
| (घ) ज़मींदार साहब को अहाता बढ़ाने की इच्छा हुई। | ज़मींदार साहब को अहाता बढ़ाने की इच्छा हो रही है। | ज़मींदार साहब को अहाता बढ़ाने की इच्छा होगी। |
| (ङ) उन्होंने वृद्धा से क्षमा माँगी और झोंपड़ी वापस दे दी। | वे वृद्धा से क्षमा माँग रहे हैं और झोंपड़ी वापस दे रहे हैं। | वे वृद्धा से क्षमा माँगेंगे और झोंपड़ी वापस दे देंगे। |
वचन की पहचान
- वृद्धा झोंपड़ी के भीतर गई।
- वृद्धा गिड़गिड़ाकर बोली।
- पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है।
- उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी थी।
- उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और बाहर ले आई।
- झोंपड़ी में बसी पुरानी यादें वृद्धा को रुला गईं।
- पाठक देख सकते हैं कि कैसे एक छोटी-सी टोकरी ने बड़े बदलाव ला दिए हैं।
कहानी की रचना
| विशेषता | कहानी से उदाहरण |
|---|---|
| 1. प्रश्नोत्तरी शैली | “उसका भार आप जन्म-भर कैसे उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए।” |
| 2. वर्णनात्मकता | वृद्धा झोंपड़ी के भीतर गई। वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। |
| 3. भावात्मकता | जब उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दुख के फूट-फूट कर रोने लगती थी। |
| 4. संवादात्मकता | “महाराज, अब तो यह झोंपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ।” |
| 5. नाटकीयता | ज़मींदार ने पूरी ताकत लगाई, पर टोकरी अपनी जगह से एक हाथ भी ऊँची न हुई। |
| 6. चरित्र-चित्रण | ज़मींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे। |
शब्दकोश का उपयोग
- श्रीमान् — धनी, संपत्तिशाली (संपन्न)
- कन्या — लड़की
- महल — राजा या रईस आदि के रहने का बहुत बड़ा और बढ़िया मकान (प्रासाद)
- ज़माने — बहुत अधिक समय
- आधार — सहारा, आश्रय देनेवाला
भावों की पहचान
| पंक्ति | भाव |
|---|---|
| 1. वह लज्जित होकर कहने लगे— ‘नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।’ | लज्जा / पछतावा |
| 2. वृद्धा के उपर्युक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गईं। | बोध / आत्मज्ञान |
| 3. उनके मन में कुछ दया आ गई। | करुणा / दया |
| 4. इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। | आस्था / विश्वास |
| 5. महाराज क्षमा करें तो एक विनती है। | विनम्रता / विनय |
| 6. अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। | ममता / स्नेह |
| 7. ज़मींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे। | अहंकार / घमंड |
| 8. उस झोंपड़ी में उसका मन ऐसा कुछ लग गया था... | जुड़ाव / मोह |
| 9. ...मारे दुख के फूट-फूट कर रोने लगती थी। | दुख / पीड़ा |
| 10. ...वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने... कब्जा कर लिया। | क्रूरता / अन्याय |
वाक्य विस्तार
- ज़मींदार के ऊँचे महल के पास एक गरीब, अनाथ वृद्धा की पुरानी मिट्टी की झोंपड़ी थी।
- श्रीमान् झोंपड़ी के आस-पास धीरे-धीरे टहलते हुए नौकरों को अहाता बढ़ाने का काम बता रहे थे।
- वृद्धा को भरोसा था कि अपने घर की मिट्टी के चूल्हे की रोटी देखकर पोती खुशी से खाने लगेगी।
- पुरानी यादों से भरा मन लेकर वृद्धा काँपते पैरों से अपनी प्यारी झोंपड़ी के भीतर गई।
- वृद्धा की बार-बार विनती सुनकर ज़मींदार साहब स्वयं मिट्टी की भारी टोकरी उठाने आगे बढ़े।
संवाद फोन पर
ज़मींदार — बिटिया, सुना है तुमने खाना छोड़ दिया है। ऐसे जिद नहीं करते।
पोती — मुझे अपने घर में ही खाना है। आपने हमारा घर क्यों ले लिया?
ज़मींदार — मैं तुम्हें नया और बड़ा घर दिलवा दूँगा।
पोती — मुझे बड़ा घर नहीं चाहिए। मुझे वही घर चाहिए जहाँ मेरी माँ की यादें हैं।
ज़मींदार — (कुछ देर चुप रहकर) ठीक है बिटिया, तुम्हारा घर तुम्हें वापस मिलेगा। अब खाना खा लो।
मित्र — इस विचार को छोड़ दो, तुम्हें आखिर किस बात की कमी है? 🤔
ज़मींदार — मुझे तुमसे उपदेश नहीं सुनना है। 😡
मित्र — सोचो, उस गरीब वृद्धा का और कोई सहारा नहीं है। 😢
ज़मींदार — पर मुझे अपना अहाता बड़ा करना है। 🏰
मित्र — किसी का घर उजाड़कर बना महल सुख नहीं देगा। 🙏
ज़मींदार — शायद तुम ठीक कहते हो... मैं सोचूँगा। 😔
पोती की भावनाएँ
सेवा में,
जिलाधिकारी महोदय,
जिला कार्यालय, रामपुर।
विषय : अपनी झोंपड़ी वापस दिलाने हेतु प्रार्थना-पत्र।
महोदय,
मैं महल के पास रहने वाली वृद्धा की पोती हूँ। मेरे माता-पिता नहीं हैं। मेरी दादी ही मेरा सहारा हैं। हमारी झोंपड़ी पर ज़मींदार साहब ने वकीलों की मदद से कब्जा कर लिया है। उसी झोंपड़ी में मेरे परिवार की सारी यादें हैं। अब हमारे पास रहने की कोई जगह नहीं है।
आपसे विनती है कि मामले की जाँच करके हमारी झोंपड़ी हमें वापस दिलाने की कृपा करें।
आपकी आज्ञाकारी,
वृद्धा की पोती
दिनांक : 5 मई
2 मई — आज दादी घर आईं तो बहुत परेशान थीं। मैंने बहुत पूछा। उन्होंने बताया कि ज़मींदार ने हमारा घर ले लिया है। मुझे बहुत रोना आया। मैं अपने घर के बिना खाना नहीं खाऊँगी।
6 मई — आज दादी टोकरी लेकर पुराने घर गईं। लौटीं तो उनके चेहरे पर मुसकान थी। उन्होंने कहा, “चल बिटिया, अपने घर चलें।” आज मैंने अपने घर में दादी के हाथ की रोटी खाई। आज मैं बहुत खुश हूँ।
पाठ से आगे
मुझे अपने घर से बहुत लगाव है। यहाँ मेरा जन्म हुआ। घर की दीवारों पर मेरी बचपन की ड्राइंग आज भी लगी हैं। आँगन के पेड़ के नीचे मैं रोज खेलता हूँ। कहीं बाहर जाता हूँ तो घर की बहुत याद आती है।
हाँ, जब पिताजी की बदली हुई तो हमें पुराना शहर छोड़ना पड़ा। मुझे अपने पुराने विद्यालय और दोस्तों को छोड़ना बहुत कठिन लगा। विदाई के दिन मैं रो पड़ा था।
हमारी कक्षा के एक लड़के ने गुस्से में दूसरे की कॉपी फाड़ दी थी। बाद में उसे बहुत पछतावा हुआ। उसने माफी माँगी और अपनी नई कॉपी उसे दे दी। तब से दोनों पक्के दोस्त बन गए।
एक बार खेल में हारने पर मैंने गुस्से में बैट फेंक दिया, जिससे वह टूट गया। बाद में मुझे पछतावा हुआ। मैंने अपने गुल्लक के पैसों से नया बैट खरीदा। मैंने सीखा कि गुस्से में कोई काम नहीं करना चाहिए।
न्याय और समता
मैंने अखबार में पढ़ा था कि एक बुजुर्ग किसान की जमीन धोखे से किसी ने अपने नाम करवा ली थी। बाद में गाँव वालों और एक वकील की मदद से उसे न्याय मिला।
- पीड़ित व्यक्ति का साथ देना और उसका हौसला बढ़ाना।
- पुलिस, पंचायत या सरकारी शिकायत पोर्टल पर शिकायत करना।
- मुफ्त कानूनी सहायता केंद्र की जानकारी देना।
- समाज के लोग मिलकर अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएँ।
मैं इस कथन से सहमत हूँ। धन और ताकत से डराकर किसी को झुकाया जा सकता है, पर उसका मन नहीं जीता जा सकता। दया और न्याय से लोगों का सम्मान और प्रेम मिलता है। कहानी में भी ज़मींदार ने न्याय किया, तभी वह सच्चा बड़ा बना।
घर-घर की कहानी : घर के बड़ों से अपने घर के बनने की कहानी पूछिए और कक्षा में साझा कीजिए।
न्याय और करुणा से जुड़ी सहायता : सार्वजनिक शिकायत पोर्टल (pgportal.gov.in), राज्य की जनसुनवाई सुविधा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बारे में जानकारी लेकर लोगों को जागरूक कीजिए।
आज की पहेली
- ट् क र् ई ओ = टोकरी
- य् आ द = याद
- ई ल व क् = वकील
- झ् ओ ई प ड़् ं = झोंपड़ी
- ज द् आ म् ई र ं = ज़मींदार
- त् आ इ औ क ल् = इकलौता
खोजबीन के लिए : पुस्तकालय से ‘हितोपदेश’ की कहानियों की पुस्तक खोजकर पढ़िए और कोई एक कहानी कक्षा में सुनाइए।