कक्षा 9 हिंदी · गंगा · कविता (निराला)

10. भारति, जय, विजयकरे!

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की देशभक्ति कविता — मूल कविता, भावार्थ, बहुविकल्पी प्रश्न, अर्थ और भाव, प्रश्न-उत्तर, समास, अलंकार व शब्द-संपदा. NCERT हिंदी (गंगा).

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पाठ का परिचय : ‘भारति, जय, विजयकरे!’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की देशप्रेम से भरी प्रेरणादायक कविता है। कवि भारतभूमि को एक देवी के रूप में चित्रित करते हैं — समुद्र जिसके चरण धोता है, वन-लताएँ जिसके वस्त्र हैं, गंगा जिसके गले का हार है और हिमालय जिसका मुकुट है। भाषा संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त है।

कविता

भारति, जय, विजयकरे!
कनक-शस्य-कमलधरे!

लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!

तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन;
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।

मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!

★भावार्थ

हे भारतमाता! तुम्हारी जय हो, तुम सदा विजय प्राप्त करो। तुम सोने जैसी फसलों और कमल को धारण करने वाली हो।

लंका तुम्हारे चरणों के नीचे खिले कमल के समान है। गरजती लहरों वाला सागर तुम्हारे पवित्र चरणों को धोता है और अनेक अर्थों से भरी स्तुति करता है।

पेड़, घास, वन और लताएँ तुम्हारे वस्त्र हैं। तुम्हारे आँचल में फूल जड़े हुए हैं। प्रकाश से चमकते जल-कणों वाली गंगा की उजली धारा तुम्हारे गले का हार है।

बर्फ से ढका उजला हिमालय तुम्हारा मुकुट है। ओंकार (प्रणव) तुम्हारे प्राण हैं। तुम्हारी विशाल दिशाएँ सैकड़ों मुखों और सैकड़ों स्वरों से तुम्हारा गुणगान करती हुई गूँज रही हैं।

मेरे उत्तर मेरे तर्क

1“भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से—

उत्तर : (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।

कारण : कविता में सोने जैसी फसलें (संपन्नता), सागर-वन-गंगा-हिमालय (प्रकृति) और ओंकार (ज्ञान-परंपरा) — तीनों की प्रशंसा है।

2“कनक-शस्य-कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है—

उत्तर : (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता

कारण : सोने जैसी फसलें और कमल भारत की समृद्धि और उपजाऊ धरती को दिखाते हैं।

3समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—

उत्तर : (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!

कारण : सभी दिशाएँ सैकड़ों मुखों और स्वरों से भारत का गुणगान कर रही हैं।

4कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?

उत्तर : (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त

कारण : कनक-शस्य, गर्जितोर्मि, ज्योतिर्जल, शतमुख जैसे संस्कृत के सामासिक शब्दों का प्रयोग है।

5भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?

उत्तर : (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक

कारण : वन-लताएँ और गंगा भारत का श्रृंगार हैं; इनकी रक्षा करना हमारी पर्यावरणीय और सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

अर्थ और भाव

क“लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!”

अर्थ : भारतमाता के चरणों के नीचे लंका कमल के समान शोभित है। गरजती लहरों वाला सागर उसके दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है।

भाव : कवि ने भारत को देवी के रूप में देखा है। जैसे भक्त देवी के चरण धोते हैं, वैसे ही विशाल सागर भारतमाता के चरण धोकर उसकी पूजा कर रहा है। इसमें भारत की भौगोलिक सुंदरता और महानता का चित्रण है।

ख“प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”

अर्थ : ओंकार (ॐ) भारतमाता के प्राण हैं। उसकी विशाल दिशाएँ सैकड़ों मुखों और सैकड़ों स्वरों से गूँज रही हैं।

भाव : भारत की आत्मा आध्यात्मिकता और ज्ञान में बसती है। यहाँ अनेक भाषाएँ, बोलियाँ और विचार हैं, जो मिलकर भारत का गुणगान करते हैं। इसमें ‘अनेकता में एकता’ का भाव है।

मेरी समझ मेरे विचार

1कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?

कविता में कवि की गहरी देशभक्ति, भारतभूमि के प्रति श्रद्धा और गौरव की भावना व्यक्त हुई है। कवि भारत को देवी मानकर उसकी विजय की कामना करते हैं।

2भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कैसे किया गया है? क्या प्रकृति का संरक्षण भी देशप्रेम है?

कवि ने भारत को एक देवी के रूप में सजाया है। सागर उसके चरण धोता है, लंका चरणों का कमल है, वन-लताएँ उसके वस्त्र हैं, फूल आँचल में जड़े हैं, गंगा गले का हार है और हिमालय उसका मुकुट है।

हाँ, प्रकृति का संरक्षण भी देशप्रेम है। नदियाँ, वन और पर्वत ही भारतमाता का श्रृंगार हैं। इन्हें प्रदूषित करना या नष्ट करना भारतमाता का अपमान है। पेड़ लगाना, पानी बचाना और नदियों को साफ रखना सच्ची देशसेवा है।

3“कनक-शस्य-कमलधरे!” भारतभूमि की किन विशेषताओं की ओर संकेत करती है?
  • भारत की उपजाऊ धरती, जहाँ सोने जैसी फसलें लहलहाती हैं।
  • भारत की कृषि-परंपरा और किसानों का श्रम।
  • धन-धान्य से भरपूर समृद्धि।
  • कमल — पवित्रता, सुंदरता और भारतीय संस्कृति का प्रतीक (भारत का राष्ट्रीय पुष्प भी)।
4हिमालय को भारत का मुकुट क्यों बताया गया है?

जैसे मुकुट सिर पर सबसे ऊपर शोभा देता है, वैसे ही हिमालय भारत के उत्तर में सबसे ऊँचा स्थित है। बर्फ से ढका होने के कारण वह उजले मुकुट जैसा चमकता है। वह भारत की रक्षा करता है और नदियों का स्रोत है। इसलिए वह भारत के गौरव और सम्मान का प्रतीक है।

कविता का सौंदर्य

विशेषताकविता की पंक्तियाँ
प्रकृति का मानवीकरण“गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल / स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!” (सागर चरण धोता और स्तुति करता है)
आलंकारिक प्रयोग“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” (रूपक); “तरु-तृण-वन-लता वसन” (अनुप्रास)
समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोगकनक-शस्य, कमलधरे, शतदल, गर्जितोर्मि, ज्योतिर्जल, शतमुख, शतरव
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग“प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार”

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पाठ से आगे

1आज भारत को नए रूप में प्रस्तुत करना हो, तो आप किन विशेषताओं को शामिल करेंगे?
  • विज्ञान और अंतरिक्ष में सफलता — चंद्रयान, आदित्य-एल1।
  • डिजिटल भारत — यूपीआई, ऑनलाइन सेवाएँ।
  • विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और युवा शक्ति।
  • योग, आयुर्वेद और भारतीय ज्ञान-परंपरा।
  • खेल, संगीत, नृत्य, भाषाओं और खान-पान की विविधता।
  • नवीकरणीय ऊर्जा — सौर ऊर्जा में अग्रणी।
2“शतमुख-शतरव-मुखरे!” — विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ को कैसे साकार करते हैं?

भारत में दीवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, पोंगल, बिहू, ओणम, गणेशोत्सव जैसे अनेक पर्व मनाए जाते हैं। सब लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं और शुभकामनाएँ देते हैं। भाषाएँ और रीतियाँ अलग हैं, पर खुशी और भाईचारा एक है। इसी से अनेकता में एकता बनती है और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना मजबूत होती है।

3भारत को सुदृढ़ करने में प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा का महत्त्व — संक्षिप्त लेख

भारत की शक्ति उसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में है। हिमालय हमारी रक्षा करता है और नदियाँ खेतों को सींचती हैं। उपजाऊ धरती करोड़ों लोगों का पेट भरती है।

हमारी संस्कृति हमें सहनशीलता, अतिथि-सत्कार और भाईचारा सिखाती है। अलग-अलग भाषाएँ और परंपराएँ होते हुए भी हम एक हैं।

वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, गणित में शून्य और दशमलव जैसी खोजें हमारी ज्ञान-परंपरा की देन हैं। इन तीनों की रक्षा और विकास से ही भारत सुदृढ़ और समृद्ध बनेगा।

4बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने नदियों और हिमालय को कैसे प्रभावित किया है?
  • कारखानों का गंदा पानी, सीवर और प्लास्टिक से गंगा-यमुना जैसी नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं।
  • बढ़ते तापमान से हिमालय के हिमनद (ग्लेशियर) तेजी से पिघल रहे हैं।
  • कहीं बाढ़ और कहीं सूखे की घटनाएँ बढ़ी हैं; बादल फटने और भूस्खलन भी बढ़े हैं।
  • जलीय जीवों और पहाड़ों की जैव-विविधता पर खतरा बढ़ा है।

कल्पना और सृजन

1भारत को मनुष्य रूप में सजाना हो, तो अपने राज्य (महाराष्ट्र) की किन चीजों का प्रयोग करेंगे?

मैं भारतमाता को पैठणी साड़ी पहनाऊँगा। सिर पर फेटा और नथ, गले में कोल्हापुरी साज, हाथों में हरी चूड़ियाँ और माथे पर चंद्रकोर टिकली लगाऊँगा। बालों में मोगरे का गजरा सजाऊँगा। हाथ में तुलसी-माला और पीछे वारकरी झंडा रहेगा। यह सब महाराष्ट्र की संस्कृति और भक्ति-परंपरा को दिखाएगा।

2भारत पर आधारित डाक टिकट/पोस्टर/आवरण पृष्ठ के प्रतीक
  • तिरंगा और अशोक चक्र — राष्ट्रीय एकता और प्रगति
  • हिमालय और गंगा — प्राकृतिक वैभव
  • कमल और मोर — राष्ट्रीय पुष्प और पक्षी
  • किसान और सैनिक — अन्नदाता और रक्षक
  • चंद्रयान — विज्ञान की प्रगति
  • विभिन्न वेशभूषा में बच्चे — अनेकता में एकता
3नदी की यात्रा — गंगा की यात्रा का वृत्तांत (संक्षेप में)

मेरी यात्रा उत्तराखंड के गंगोत्री हिमनद के गोमुख से शुरू होती है, जहाँ मैं ‘भागीरथी’ कहलाती हूँ। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर मैं ‘गंगा’ बनती हूँ। ऋषिकेश और हरिद्वार में मेरे घाटों पर आरती होती है।

मैदानों में उतरकर मैं उत्तर प्रदेश के कानपुर, प्रयागराज (जहाँ यमुना मिलती है) और वाराणसी से गुजरती हूँ। यहाँ अवधी और भोजपुरी बोली सुनाई देती है। बिहार में पटना और फिर पश्चिम बंगाल में मैं ‘हुगली’ और ‘पद्मा’ में बँट जाती हूँ। बांग्ला गीत, मछुआरों की नावें और सुंदरबन के मैंग्रोव वन मेरे साथी बनते हैं।

अंत में गंगासागर में मैं बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हूँ, जहाँ मकर संक्रांति पर मेला लगता है। इस यात्रा में मैं करोड़ों लोगों को जल, अन्न और आस्था देती हूँ।

व्याकरण की बात

1बहुभाषी देश — भारत से अपनी मातृभाषा (मराठी) में संवाद

मराठी : भारतमाते, तुझ्या नद्या स्वच्छ ठेवण्याचे आम्ही वचन देतो. आम्ही झाडे लावू आणि सर्वांशी प्रेमाने वागू.

हिंदी : हे भारतमाता, हम तुम्हारी नदियों को स्वच्छ रखने का वचन देते हैं। हम पेड़ लगाएँगे और सबसे प्रेम से व्यवहार करेंगे।

2समास-विग्रह
सामासिक पदविग्रहसमास
शतदलसौ हैं दल (पंखुड़ियाँ) जिसके — अर्थात् कमलबहुव्रीहि
ज्योतिर्जलज्योति (प्रकाश) रूपी जलकर्मधारय
शतमुखसौ हैं मुख जिसकेबहुव्रीहि
सागरजलसागर का जलतत्पुरुष
3अलंकार

(क) अनुप्रास वाली पंक्तियाँ : “कनक-शस्य-कमलधरे” (क), “तरु-तृण-वन-लता वसन” (त), “धवल धार हार गले” (ध, र), “प्राण प्रणव ओंकार” (प्र), “शतमुख-शतरव-मुखरे” (श, म)।

(ख) रूपक वाली पंक्तियाँ :

पंक्तिभारत का रूप माना गया
लंका पदतल शतदललंका — चरणों के नीचे का कमल
तरु-तृण-वन-लता वसनपेड़, घास, वन और लताएँ — वस्त्र
गंगा... धवल धार हार गलेगंगा की धारा — गले का हार
मुकुट शुभ्र हिम-तुषारबर्फीला हिमालय — मुकुट

मिलकर लें शपथ

★वन संरक्षण के लिए बनाए गए प्रमुख अधिनियम
  • भारतीय वन अधिनियम, 1927
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 — बिना अनुमति वन भूमि का अन्य कार्यों में उपयोग नहीं
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002
  • अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार) अधिनियम, 2006

शपथ : हम पेड़ नहीं काटेंगे, हर वर्ष कम से कम एक पेड़ लगाएँगे, वनों में आग नहीं लगाएँगे और वन्यजीवों की रक्षा करेंगे।

पढ़ने के लिए : पाठ के अंत में मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘जय जय भारतमाता’ का अंश दिया गया है। इसमें कवि कहते हैं कि भारत का ऊँचा हृदय हिमालय भीतर दर्द और आग दबाकर भी हमें हरा-भरा रखता है और उसके सौ स्रोतों से पानी फूट-फूटकर बहता है। निराला की ही एक और संस्कृतनिष्ठ कविता ‘वर दे, वीणावादिनि वर दे!’ भी पढ़ें।

शब्द-संपदा

शब्दअर्थ
भारतिभारती, भारतमाता
कनकसोना
शस्यफसल, अन्न
पदतलपैरों के नीचे, तलवा
शतदलकमल
गर्जितोर्मिगरजती हुई लहरें
शुचिपवित्र, निर्मल
युगलजोड़ा
स्तवस्तुति, प्रशंसा
तरुपेड़
तृणतिनका, घास
लताबेल
वसनवस्त्र
अंचलआँचल
खचितजड़ा हुआ
सुमनफूल
ज्योतिर्जलप्रकाश से चमकता जल
धवलसफेद, उजला
शुभ्रउज्ज्वल, सफेद
हिम-तुषारबर्फ, पाला
प्रणवओंकार, ॐ
उदारविशाल, दयालु
शतमुखसौ मुख
शतरवसौ स्वर
मुखरेबजता, गूँजता हुआ