9. राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
तुलसीदास के रामचरितमानस (बालकांड) से — मूल चौपाई-दोहे, भावार्थ, बहुविकल्पी प्रश्न, प्रश्न-उत्तर, भाव विश्लेषण, अलंकार, अवधी शब्द व शब्द-संपदा. NCERT हिंदी (गंगा).
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पाठ का परिचय : यह अंश गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ के बालकांड से लिया गया है। सीता-स्वयंवर में राम द्वारा शिव-धनुष टूटने का समाचार पाकर मुनि परशुराम क्रोधित होकर जनक की सभा में आते हैं। यहाँ परशुराम के रोषपूर्ण रूप, राम की विनम्रता और लक्ष्मण के व्यंग्य भरे उत्तर का वर्णन है। भाषा अवधी है और छंद चौपाई-दोहा।
काव्यांश (1) और भावार्थ
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥
परशुराम का भयानक वेश देखकर सभा के सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए। सब अपने पिता के नाम के साथ अपना नाम बताकर उन्हें दंडवत प्रणाम करने लगे। परशुराम जिसकी ओर सहज भाव से भी देखते, वह समझता कि अब उसकी आयु पूरी हो गई।
फिर राजा जनक ने आकर सिर झुकाया और सीता को बुलाकर प्रणाम करवाया। परशुराम ने आशीर्वाद दिया। सखियाँ प्रसन्न होकर सीता को अपने समूह में ले गईं। फिर विश्वामित्र आकर मिले और राम-लक्ष्मण को उनके चरण-कमलों में प्रणाम करवाया। विश्वामित्र ने बताया कि ये दशरथ के पुत्र हैं। सुंदर जोड़ी देखकर परशुराम ने आशीर्वाद दिया। कामदेव का भी घमंड तोड़ने वाले राम के अपार रूप को देखकर उनकी आँखें थम गईं।
फिर उन्होंने जनक से पूछा — यह इतनी भीड़ क्यों है? वे जानते हुए भी अनजान की तरह पूछ रहे थे। उनके शरीर में क्रोध भर गया था।
काव्यांश (2) और भावार्थ
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥
जनक ने सारा समाचार सुनाया कि सब राजा किस कारण आए हैं। यह सुनकर परशुराम ने दूसरी ओर देखा, तो धरती पर धनुष के टुकड़े पड़े दिखे। वे बहुत क्रोध में कठोर वचन बोले — रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? उसे जल्दी दिखा, नहीं तो आज जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक की धरती उलट दूँगा।
बहुत डर के कारण राजा जनक उत्तर नहीं दे रहे। यह देखकर कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुष चिंतित हो गए, सबके हृदय में भारी भय था। सीता की माता मन में पछता रही थीं कि विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। परशुराम का स्वभाव सुनकर सीता को आधा पल भी कल्प के समान लंबा लग रहा था।
सब लोगों को भयभीत और सीता को डरी हुई जानकर श्रीराम बोले। उनके हृदय में न कोई हर्ष था, न विषाद।
काव्यांश (3) और भावार्थ
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥
राम ने विनम्रता से कहा — हे नाथ! शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि गुस्से से बोले — सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। शत्रु जैसा काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिए।
हे राम! जिसने शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह इस समाज को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो सारे राजा मारे जाएँगे।
मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकराए और परशुराम का अपमान करते हुए बोले — हे गोसाईं! बचपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ीं, तब तो आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों? यह सुनकर भृगुकुल के ध्वज परशुराम क्रोधित होकर बोले — रे राजकुमार! तू काल के वश होकर बोल रहा है, तुझे होश नहीं है। सारा संसार जानता है कि शिवजी का धनुष क्या कोई साधारण धनुही के समान है?
मेरे उत्तर मेरे तर्क
उत्तर : (ग) भय और शिष्टाचार
कारण : राजा भय से व्याकुल होकर उठे और शिष्टाचार निभाते हुए नाम बताकर प्रणाम करने लगे।
उत्तर : (ख) शिष्टता
कारण : जनक ने आदर से सिर झुकाया और सीता से भी प्रणाम करवाया।
उत्तर : (ग) शिव-धनुष का खंडित होना
कारण : धरती पर पड़े धनुष के टुकड़े देखते ही वे क्रोधित हो उठे।
उत्तर : (ख) विनम्रता और मर्यादा
कारण : क्रोधित परशुराम के सामने भी राम स्वयं को उनका दास कहकर आदर और शांति से बोलते हैं।
उत्तर : (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
कारण : परशुराम ने राम को शत्रु कहा और सब राजाओं को मारने की धमकी दी। इसलिए लक्ष्मण ने व्यंग्य से उनके अहंकार को चुनौती दी।
मेरी समझ मेरे विचार
इसका अर्थ है — आधा पल भी कल्प (बहुत लंबे समय) के समान बीता। यह सीता के संदर्भ में कहा गया है। परशुराम के क्रोधी स्वभाव के बारे में सुनकर सीता को अपने विवाह पर संकट दिखने लगा। चिंता और भय के कारण उन्हें एक-एक क्षण बहुत लंबा लगने लगा।
सभा के राजा पहले से ही भयभीत थे। इस चेतावनी से उनका डर और बढ़ गया होगा। वे अपनी जान बचाने की चिंता करने लगे होंगे। कुछ राजा मन में यह भी चाहते होंगे कि धनुष तोड़ने वाला पकड़ा जाए, ताकि उन पर संकट न आए। कोई भी साहस करके आगे बोलने को तैयार नहीं हुआ।
मेरे विचार से राम का विनय का मार्ग अधिक उचित है। क्रोधित व्यक्ति से तर्क करने पर उसका क्रोध और बढ़ता है, जैसा लक्ष्मण के वचनों से हुआ। विनम्रता से क्रोधी व्यक्ति का अहंकार शांत होता है। अंत में राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने से ही परशुराम शांत हुए। फिर भी लक्ष्मण के तर्क सही थे; बस उन्हें कहने का समय और ढंग उचित नहीं था।
यह राम के धैर्य, संयम, गंभीरता, विवेक और समभाव को दर्शाता है। जब सब राजा डरे थे, जनक मौन थे, सीता व्याकुल थीं, परशुराम क्रोध में थे और लक्ष्मण व्यंग्य कर रहे थे — तब केवल राम शांत और संतुलित रहे। उन्होंने सब लोगों के भय को समझा और विनम्रता से स्थिति सँभाली। यही संतुलन उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनाता है।
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
मैं भी सीता-स्वयंवर में आया था। राम ने शिव-धनुष तोड़ दिया था और हम सब हारे हुए बैठे थे। तभी फरसा लिए, जटा बाँधे, लाल आँखों वाले परशुराम सभा में आए। हम सब डरकर खड़े हो गए और अपने पिता का नाम बताकर उन्हें प्रणाम करने लगे।
टूटा धनुष देखकर वे गरज उठे और जनक को धमकाने लगे। जनक डर के मारे चुप रहे। राम ने विनम्रता से कहा कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। पर लक्ष्मण ने व्यंग्य किया कि बचपन में हमने कितनी धनुहियाँ तोड़ीं, तब आप क्यों नहीं बोले? परशुराम और क्रोधित हुए। बहुत देर तक दोनों में तीखी बातें हुईं।
अंत में राम की विनम्रता और विश्वामित्र के समझाने से परशुराम का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने राम की शक्ति की परीक्षा ली और समझ गए कि राम साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे राम की जय कहते हुए वन को चले गए। हम सबने चैन की साँस ली।
वे राजा स्वयं धनुष नहीं तोड़ सके थे और सीता से विवाह न होने पर जलन से भरे थे। जनक और राम पर संकट आता देखकर उन्हें मन में संतोष हुआ। यह मनुष्य के ईर्ष्यालु स्वभाव को दिखाता है — दूसरों की परेशानी में कुछ लोग खुशी ढूँढ़ते हैं।
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कविता का सौंदर्य — संवादों की विशेषता
| विशेषता | कविता से पंक्ति |
|---|---|
| राम की विनम्रता | “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥” |
| परशुराम का रौद्र रूप | “बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” |
| लक्ष्मण का प्रत्युत्तर | “बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥” |
| पौराणिक संदर्भ | “सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥” |
| नाटकीयता | “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” |
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
| भाव | संबंधित पंक्ति | पात्र | कारण |
|---|---|---|---|
| चिंता | बिधि अब सँवरी बात बिगारी | सीता की माता सुनयना | पुत्री के विवाह पर संकट की आशंका |
| क्रोध | अति रिस बोले बचन कठोरा | परशुराम | शिव-धनुष का टूटना |
| व्यग्रता | अरध निमेष कलप सम बीता | सीता | परशुराम का स्वभाव सुनकर विवाह पर संकट का डर |
| भय | उठे सकल भय बिकल भुआला | सभा के राजा | परशुराम का भयानक वेश |
| संयम/विनम्रता | हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु | राम | सबको भयभीत देखकर स्थिति शांत करना |
| ईर्ष्या/कुटिलता | कुटिल भूप हरषे मन माहीं | अन्य राजा | स्वयं धनुष न तोड़ पाने की जलन |
संदर्भ : धनुष के टुकड़े देखकर परशुराम ने जनक को ‘जड़’ और ‘मूढ़’ कहकर पूछा कि धनुष किसने तोड़ा।
कारण और भाव : पंक्ति में स्पष्ट लिखा है — ‘अति डरु’। परशुराम का क्रोध और उनकी धमकी इतनी भयानक थी कि जनक भय से उत्तर नहीं दे सके। साथ ही वे राम का नाम लेकर उन्हें संकट में भी नहीं डालना चाहते थे।
परिणाम : जनक के चुप रहने से राम को स्वयं आगे आकर विनम्रता से बात सँभालनी पड़ी।
निष्कर्ष : इससे स्पष्ट होता है कि जनक का मौन मुख्यतः भयजनित था, पर उसमें राम की रक्षा का विवेक भी छिपा था।
काव्य-पंक्ति और भाव
चेहरे पर तीव्र क्रोध, आँखों में लाली, भौंहें तनी हुईं और स्वर में गर्जना होगी। लक्ष्मण को तुच्छ समझने वाला तिरस्कार भी झलकेगा।
| पात्र | भाव |
|---|---|
| परशुराम | क्रोध, अहंकार, रौद्रता |
| राजा जनक | भय, विनम्रता, चिंता |
| लक्ष्मण | व्यंग्य, निर्भीकता, उत्साह |
| राम | शांति, विनय, धैर्य |
| सभा के अन्य राजा | भय, कुटिल प्रसन्नता |
पाठ से आगे
- जब कोई बड़ा व्यक्ति गुस्से में हो और मुझे अपनी बात रखनी हो।
- कक्षा में मित्रों के बीच झगड़ा सुलझाते समय।
- खेल में हारने पर विजेता को बधाई देते समय।
- कतार में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते समय।
- कोई मेरी गलत आलोचना करे, तब शांत रहकर उत्तर देते समय।
द्रौपदी स्वयंवर : राजा द्रुपद ने शर्त रखी कि जो वीर ऊपर घूमती मछली की आँख को नीचे पानी में उसकी परछाई देखकर बाण से भेदेगा, उसी से द्रौपदी का विवाह होगा। अनेक राजा असफल रहे। ब्राह्मण वेश में आए अर्जुन ने यह कठिन लक्ष्य भेद दिया और द्रौपदी ने उन्हें वरमाला पहनाई।
कल्पना और लेखन
सुनयना (मन में) : हे विधाता! अभी तो सब ठीक हुआ था। यह क्रोधी मुनि कहाँ से आ गए? मेरी बेटी का क्या होगा?
सीता (मन में) : माँ, आप चिंता न करें। श्रीराम बहुत धीर और विनम्र हैं। वे सब सँभाल लेंगे।
सुनयना : पर लक्ष्मण तो मुनि से उलझ रहे हैं! कहीं बात और न बिगड़ जाए।
सीता : माँ, मेरे लिए तो एक-एक पल युग जैसा बीत रहा है। बस प्रार्थना कीजिए कि मुनि का क्रोध शांत हो जाए।
राम के धनुष तोड़ने पर सीता के मन में आनंद और गर्व था। परशुराम के आते ही वह आनंद भय में बदल गया। लक्ष्मण के निर्भीक उत्तर सुनकर उन्हें हल्की हँसी भी आई होगी और गर्व भी हुआ होगा, पर साथ ही यह शंका भी जागी होगी कि कहीं मुनि का क्रोध और न भड़क जाए। राम का शांत और विनम्र स्वर सुनकर उन्हें भरोसा मिला होगा। अंत में परशुराम के शांत होने पर उन्होंने चैन की साँस ली होगी।
मेरा नाम ...... है। मैं कक्षा 9 का विद्यार्थी हूँ। मुझे पुस्तकें पढ़ना और क्रिकेट खेलना पसंद है। मैं विद्यालय की विज्ञान प्रदर्शनी में दो बार पुरस्कार जीत चुका हूँ। मैं समय का पालन करता हूँ और मित्रों की पढ़ाई में मदद करता हूँ। मेरा सपना वैज्ञानिक बनकर देश की सेवा करना है।
व्याकरण की बात
| विशेषता | अर्थ | नया उदाहरण |
|---|---|---|
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | “सुर मुनि नाग नगर नर नारी।” |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | “उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।” |
| रूपक अलंकार | उपमेय में उपमान का आरोप | “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।” (भृगुकुल रूपी ध्वज) |
| अवधी शब्द | खड़ी बोली | मेरी भाषा (मराठी) |
|---|---|---|
| कोही | क्रोधी | रागीट |
| बेषु | वेष | वेश |
| भुआला | राजा | राजा |
| सिरु | सिर | डोके |
| बहोरि | फिर | पुन्हा |
| ढोटा | बेटा | मुलगा |
| बेगि | जल्दी | लवकर |
| आजू | आज | आज |
| महतारी | माता | आई |
| बिधि | विधाता | विधाता |
| मोही | मुझे | मला |
| लरिकाईं | बचपन में | लहानपणी |
| शब्द | लोकोक्ति | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|---|
| मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार | मनोबल से ही सफलता मिलती है | परीक्षा से मत डरो, मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। |
| राम | मुँह में राम, बगल में छुरी | ऊपर से मीठा, भीतर से कपटी | उससे सावधान रहना, वह मुँह में राम, बगल में छुरी वाला आदमी है। |
| राजा | यथा राजा तथा प्रजा | जैसा शासक, वैसी जनता | मुखिया ईमानदार है तो गाँव वाले भी ईमानदार हैं — यथा राजा तथा प्रजा। |
| बात | बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पाँव | मीठी बात से लाभ, कड़वी से हानि | सोच-समझकर बोलो, बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पाँव। |
| सिर | सिर सलामत तो पगड़ी हजार | जान बची रहे तो सब फिर मिल जाता है | बाढ़ में घर बह गया, पर सब सुरक्षित हैं — सिर सलामत तो पगड़ी हजार। |
बहुत डर के कारण राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं। यह देखकर कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे हैं। देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुष चिंता में पड़ गए हैं। सबके हृदय में भारी भय है।
| कथन | वक्ता |
|---|---|
| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | राम |
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | सीता की माता (सुनयना) |
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | परशुराम |
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | जनक |
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | लक्ष्मण |
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | राम |
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | परशुराम |
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | लक्ष्मण |
समूह गतिविधि : इस प्रसंग को रामलीला या नाटक के रूप में ध्वनि, संगीत और वेशभूषा के साथ प्रस्तुत करें। ‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस आवश्यक है’ — इस पर कक्षा में वाद-विवाद करें।
- कभी अखबार, कभी टीवी में आता, घर बैठे दुनिया की खबर सुनाता। — समाचार
- प्रत्यंचा चढ़ाओ, तीर चलाओ, राम ने तोड़ा, नाम बताओ। — धनुष
- बिना पैर के फन फैलाए, बीन बजे तो झूम-झूम जाए। — नाग
भाषा संगम : ‘धनुष’ को मराठी में ‘धनुष्य’, संस्कृत में ‘धनुः, चापम्’ और तमिल में ‘विल्’ कहते हैं। दी गई चौपाई का भाव अपनी मातृभाषा में लिखें।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भृगुपति | भृगुकुल के स्वामी, परशुराम |
| कराला | भयानक |
| भुआला | राजा |
| सुभायँ | स्वभाव से, सहज भाव से |
| चितवहिं | देखते हैं |
| खुटानी | समाप्त हो गई |
| बहोरि | फिर |
| असीस | आशीर्वाद |
| ढोटा | पुत्र |
| जोटा | जोड़ा |
| लोचन | आँख |
| मार | कामदेव |
| अनत | दूसरी ओर |
| चापखंड | धनुष के टुकड़े |
| रिस | क्रोध |
| बेगि | जल्दी |
| महि | पृथ्वी |
| लहि | तक |
| त्रास | भय |
| अरध निमेष | आधा पल |
| कलप | कल्प, बहुत लंबा समय |
| भीरु | डरा हुआ |
| भंजनिहारा | तोड़ने वाला |
| आयसु | आज्ञा |
| कोही | क्रोधी |
| बिलगाउ | अलग हो जाए |
| बिहाइ | छोड़कर |
| जैहहिं | जाएँगे |
| परसुधर | फरसा धारण करने वाले, परशुराम |
| लरिकाईं | बचपन में |
| भृगुकुलकेतू | भृगुकुल के ध्वज, परशुराम |
| तिपुरारि | त्रिपुरारि, शिव |