8. रैदास के पद
संत रैदास के दो पद — मूल पद, भावार्थ, बहुविकल्पी प्रश्न, अर्थ और भाव, प्रश्न-उत्तर, अलंकार, नामदेव से तुलना व शब्द-संपदा. NCERT हिंदी (गंगा).
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पाठ का परिचय : संत रैदास (रविदास) का जन्म काशी में हुआ। उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी माना जाता है। उन्होंने बाहरी आडंबरों का खंडन करके मन की शुद्धता और भीतरी भक्ति को सच्चा धर्म माना। यहाँ उनके दो पद हैं, जिनमें भक्त और आराध्य के अटूट संबंध और अडिग भक्ति का भाव है। उनकी रचनाएँ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं।
पद (1) और भावार्थ
अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।
रैदास कहते हैं — मुझे राम नाम की रट लग गई है, अब यह कैसे छूट सकती है? हे प्रभु! आप चंदन हैं और मैं पानी। जैसे चंदन की सुगंध पानी के अंग-अंग में समा जाती है, वैसे ही आपकी भक्ति मेरे रोम-रोम में बस गई है।
आप वन के बादल हैं और मैं मोर, जो बादल देखकर नाच उठता है। मैं आपको वैसे ही देखता रहता हूँ, जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को एकटक देखता है। आप दीपक हैं और मैं बाती, जिसकी ज्योति दिन-रात जलती है।
आप मोती हैं और मैं धागा। जैसे सुहागा मिलने से सोना और निखर जाता है, वैसे ही आपके मिलने से मेरा जीवन निखर गया है। आप स्वामी हैं और मैं आपका दास। रैदास ऐसी ही दास्य भक्ति करते हैं।
पद (2) और भावार्थ
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरौं।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
रैदास कहते हैं — हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी लें, तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा। आपसे नाता तोड़कर मैं और किससे जोड़ूँगा? मुझे तीर्थ और व्रत की कोई चिंता नहीं है। मुझे केवल आपके चरण-कमलों का भरोसा है।
मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, आपकी ही पूजा करता हूँ। आपके समान दूसरा कोई देव नहीं है। मैंने अपना मन हरि से जोड़ लिया है और बाकी सबसे नाता तोड़ लिया है। रैदास कहते हैं कि मन, कर्म और वचन से मुझे हर पहर आपकी ही आशा है।
मेरे उत्तर मेरे तर्क
उत्तर : (ग) आराध्य का नाम जपना
कारण : भक्त को राम नाम जपने की ऐसी लगन लग गई है कि अब वह छूट नहीं सकती।
उत्तर : (क) एकाकार और समरूप
कारण : चंदन की सुगंध पानी में घुलकर एक हो जाती है; वैसे ही भक्त आराध्य में एकाकार हो गया है।
उत्तर : (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
कारण : दीपक और बाती मिलकर ही ज्योति जलाते हैं; प्रभु से मेल भक्त के जीवन में प्रकाश भर देता है।
उत्तर : (ख) आराध्य से अटूट संबंध
कारण : प्रभु चाहे नाता तोड़ दें, पर भक्त अपना नाता कभी नहीं तोड़ेगा।
उत्तर : (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
कारण : अगली ही पंक्ति कहती है — तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा। भक्त के लिए प्रभु के चरण ही सब कुछ हैं।
उत्तर : (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
कारण : भक्त जहाँ भी जाता है, वहीं प्रभु की पूजा करता है — अर्थात् प्रभु हर जगह हैं।
अर्थ और भाव
अर्थ : हे प्रभु! आप वन के बादल हैं और मैं मोर हूँ। मैं आपको वैसे ही देखता हूँ, जैसे चकोर चंद्रमा को देखता है।
भाव : जैसे बादल देखकर मोर प्रसन्न होकर नाचता है और चकोर चाँद को एकटक निहारता है, वैसे ही भक्त प्रभु को देखकर आनंदित होता है। इसमें भक्त की अनन्य प्रेम-भावना है।
अर्थ : मुझे तीर्थ-यात्रा और व्रत की कोई चिंता नहीं है। मुझे केवल आपके चरण-कमलों का भरोसा है।
भाव : रैदास बाहरी कर्मकांडों को महत्त्व नहीं देते। उनके लिए सच्ची भक्ति और प्रभु पर अटूट विश्वास ही सबसे बड़ा धर्म है।
मेरी समझ मेरे विचार
इस पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य के प्रति अटूट निष्ठा दिखती है। भक्त कहता है कि प्रभु भले ही उससे मुँह मोड़ लें, वह कभी प्रभु से नाता नहीं तोड़ेगा। प्रभु से नाता तोड़कर वह किसी और से जुड़ना ही नहीं चाहता। इसका अर्थ है कि सच्चा प्रेम बदले में कुछ नहीं माँगता। भक्त का समर्पण किसी शर्त पर टिका नहीं है। यही अनन्य भक्ति है।
रैदास ने प्रभु के चरण-कमलों पर अटूट भरोसे, मन की शुद्धता और नाम-स्मरण को भक्ति का आधार माना है।
मेरे विचार से भक्ति के आधार : सच्चा मन, ईमानदारी, दूसरों की सेवा, सब प्राणियों से प्रेम, अच्छे कर्म और ईश्वर पर विश्वास।
| आराध्य (प्रभु) | भक्त (रैदास) |
|---|---|
| चंदन | पानी |
| घन (बादल) | मोर |
| चंद्रमा | चकोर |
| दीपक | बाती |
| मोती | धागा |
| सोना | सुहागा |
| स्वामी | दास |
| चरण-कमल | आश्रय पाने वाला भक्त |
कविता का सौंदर्य
| अलंकार | उदाहरण |
|---|---|
| अनुप्रास | “सुर मुनि नाग नगर नर नारी।” (राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद) — ‘न’ वर्ण की आवृत्ति |
| अनुप्रास | “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।” — ‘ज’ वर्ण की आवृत्ति |
| उपमा | “सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।” — धनुष तोड़ने वाले की तुलना सहस्रबाहु से |
| उपमा | “धनुही सम तिपुरारि धनु...” — शिव-धनुष की तुलना छोटी धनुही से |
| रूपक | “पद सरोज मेले दोउ भाई।” — चरणों पर कमल का आरोप |
| रूपक | “तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।” — चरण रूपी कमल |
कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ
| विशेषता | उदाहरण |
|---|---|
| अनन्य भक्ति भाव | “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” |
| सरल और लोकधर्मी भाषा | “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।” |
| उपमा और तुलना | “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।” |
| लयात्मकता और गेयता | “प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।” (बाती-राती की तुक) |
| दृढ़ निष्ठा और आस्था | “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।” |
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पाठ से आगे
- उस समय समाज में जाति-पाँति और ऊँच-नीच का भेदभाव था। कई लोगों को मंदिरों और धार्मिक कर्मकांडों से दूर रखा जाता था।
- तीर्थ-यात्रा और बड़े कर्मकांड गरीबों के लिए कठिन और महँगे थे।
- धर्म के नाम पर पाखंड और आडंबर बढ़ गए थे।
- इसलिए संतों ने बताया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए सच्चा मन और प्रेम ही काफी है। इससे सबको समान रूप से भक्ति का अधिकार मिला।
- रासायनिक नाम : सोडियम टेट्राबोरेट (बोरेक्स) — Na2B4O7·10H2O
- यह सफेद, क्रिस्टलीय, प्राकृतिक खनिज है और पानी में घुल जाता है।
- सोना-चाँदी पिघलाते समय यह अशुद्धियों को अलग करता है और धातु को चमकदार बनाता है।
- इसका उपयोग साबुन-डिटर्जेंट, काँच, चीनी-मिट्टी के बर्तनों और कीटाणुनाशक के रूप में होता है।
व्याकरण की बात — शब्दों की बात
संज्ञा : चंदन, पानी, दीपक, बाती, मोती, धागा, राम, रैदास
सर्वनाम : तुम, हम, मैं, जाकी
| पद का शब्द | हिंदी (खड़ी बोली) | मराठी |
|---|---|---|
| मोरा | मोर | मोर |
| चकोरा | चकोर | चकोर |
| बाती | बत्ती | वात |
| राती | रात | रात्र |
| सोने | सोना | सोने |
| तीरथ | तीर्थ | तीर्थ |
| बरत | व्रत | व्रत, उपवास |
गतिविधियाँ
1. समूह में दोनों पदों का गायन या सस्वर पाठ करें।
भक्त : प्रभु, आप चंदन हैं और मैं पानी। आपकी सुगंध मेरे अंग-अंग में बस गई है।
आराध्य : और तुम वह पानी हो, जिसके बिना चंदन घिसकर लेप भी नहीं बनता।
भक्त : आप दीपक हैं, मैं बाती। आपके बिना मेरी ज्योति कैसे जलेगी?
आराध्य : बाती के बिना दीपक भी अधूरा है, भक्त! तुम्हारी भक्ति ही मेरी ज्योति है।
भक्त : तो प्रभु, मुझे कभी अपने से अलग मत करना।
आराध्य : जो मन से जुड़ा हो, उसे कोई अलग नहीं कर सकता।
सच्चा साथ
राजू और अमन बचपन के मित्र थे। एक बार किसी गलतफहमी के कारण अमन राजू से नाराज हो गया और उससे बोलना बंद कर दिया। राजू रोज उसे नमस्ते करता, पर अमन मुँह फेर लेता।
एक दिन खेलते समय अमन के पैर में चोट लग गई। सब बच्चे देखते रहे, पर राजू दौड़कर आया। उसने अमन को सहारा दिया और घर तक पहुँचाया। अमन की आँखें भर आईं। उसने पूछा, “मैं तो तुमसे नाराज था, फिर भी तुमने मेरी मदद क्यों की?” राजू मुस्कुराया, “तुमने दोस्ती तोड़ी थी, मैंने नहीं।” उस दिन के बाद दोनों की मित्रता और गहरी हो गई।
नामदेव के पद — तुलना
समानताएँ : दोनों निर्गुण संत कवि हैं। दोनों ने राम नाम और आराध्य के प्रति अनन्य प्रेम पर बल दिया है। दोनों ने बाहरी आडंबरों का विरोध किया और सरल लोकभाषा में दृष्टांतों का प्रयोग किया।
अंतर : रैदास के पदों में भक्त और आराध्य के मिलन व समर्पण का भाव है (चंदन-पानी, दीपक-बाती)। नामदेव के पदों में संसार की नश्वरता (पेड़ पर पक्षियों का बसेरा), गुरु की महिमा और प्रभु के विरह में व्याकुलता (बछड़े बिना गाय, पानी बिना मछली) अधिक है। नामदेव की भाषा में मराठी-पंजाबी का प्रभाव भी दिखता है।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| चंदन | एक सुगंधित वृक्ष, उसकी लकड़ी का लेप |
| बास | गंध, सुगंध |
| घन | बादल, मेघ |
| चितवत | देखता है, निहारता है |
| चकोर | चंद्रमा का प्रेमी माना जाने वाला एक पक्षी |
| जोति | ज्योति, प्रकाश |
| बरै | जलती है |
| सुहागा | सोने को साफ और चमकदार करने वाला खनिज |
| भगति | भक्ति |
| तोरौ | तोड़ो |
| कवन | किससे, कौन |
| तीरथ | तीर्थ, पवित्र स्थान |
| बरत | व्रत, उपवास |
| अंदेसा | चिंता, आशंका |
| पहर | दिन का आठवाँ भाग, समय |
| मन क्रम वचन | मन, कर्म और वाणी से |