१. बरषहिं जलद
कवि — गोस्वामी तुलसीदास | संपूर्ण स्वाध्याय, पद्य विश्लेषण, भावार्थ और उपयोजित लेखन — महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (लोकभारती)।
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कवि परिचय : गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के किष्किंधा कांड से लिया गया यह पद्यांश वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौंदर्य और समाज की स्थिति का सुंदर वर्णन करता है।
स्वाध्याय (प्रश्न-उत्तर)
कृति पूर्ण कीजिए : पद्यांश में आए प्राकृतिक जल स्रोत
१. संतों की सहनशीलता
पंक्ति : "बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसे ।।"
२. कपूत के कारण कुल की हानि
पंक्ति : "जिमि कपूत के उपजे, कुल सद्धर्म नसाहिं ।।"
| इन्हें | यह कहा है |
|---|---|
| (१) दादुर धुनि (मेंढकों की ध्वनि) | बटु समुदाय (वेद पढ़ते हुए बालक) |
| (२) सज्जनों के सद्गुण | तालाब में समिटि-समिटि (एकत्रित) भरता हुआ जल |
| 'अ' समूह | उत्तर (सही जोड़ी) |
|---|---|
| १. दमकती बिजली | अ — दुष्ट की मित्रता (खल कै प्रीति) |
| २. नव पल्लव से भरा वृक्ष | ब — साधक के मन का विवेक |
| ३. उपकारी कै संपति जैसी | क — ससि संपन्न पृथ्वी |
| ४. भूमि की | ड — माया से लिपटा जीव |
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- १. बादल — घन / जलद / मेघ
- २. ग्रह (पृथ्वी) — भूमि / महि
- ३. उपग्रह (चंद्रमा) — ससि
ध्यान दें : पद्यांश में 'ससि' (चंद्रमा) उपग्रह के रूप में तथा 'महि' या 'भूमि' (पृथ्वी) ग्रह के रूप में प्रयुक्त हुए हैं ।
पसंदीदा पंक्तियाँ :
"बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध विद्या पाएँ ।।
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसे ।।"
सरल अर्थ :
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि आकाश से बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे झुककर) वर्षा कर रहे हैं। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो कोई विद्वान व्यक्ति विद्या प्राप्त करने के बाद विनम्र होकर झुक गया हो। जिस प्रकार पर्वत वर्षा की बूँदों के कठोर प्रहार को बिना विचलित हुए शांति से सह लेते हैं, ठीक उसी प्रकार संत और सज्जन पुरुष भी दुष्टों (खल) के कटु वचनों को शांतिपूर्वक सह लेते हैं ।
उपयोजित लेखन
कहानी : परोपकार ही सच्चा धर्म है
एक घने जंगल में एक नदी बहती थी। नदी के किनारे एक विशाल पेड़ था, जिस पर एक कबूतर रहता था। एक दिन नदी में पानी पीने आई एक छोटी-सी चींटी फिसलकर तेज़ बहाव में गिर गई। वह बचने के लिए संघर्ष कर रही थी। पेड़ पर बैठे कबूतर ने चींटी को डूबते हुए देखा। उसने तुरंत पेड़ से एक पत्ता तोड़ा और चींटी के ठीक पास नदी में गिरा दिया। चींटी झटपट पत्ते पर चढ़ गई और उसकी जान बच गई। उसने मन-ही-मन कबूतर को धन्यवाद दिया।
कुछ दिनों बाद, उसी जंगल में एक शिकारी आया। उसने पेड़ पर बैठे उस कबूतर को देखा और अपनी बंदूक से उस पर निशाना साधने लगा। कबूतर इस खतरे से बिल्कुल अनजान था। तभी वह चींटी वहाँ आ गई। उसने देखा कि जिसने उसकी जान बचाई थी, आज उसी की जान खतरे में है। चींटी तेज़ी से दौड़कर शिकारी के पास गई और उसके पैर में ज़ोर से काट लिया ।
दर्द के कारण शिकारी का निशाना चूक गया और बंदूक की आवाज़ सुनकर कबूतर उड़ गया। इस तरह चींटी ने परोपकार का बदला परोपकार से चुकाया। यह कहानी हमें सिखाती है कि दूसरों की भलाई (परहित) करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है ।
सीख : कर भला तो हो भला। 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई' (परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है)।