२. दो लघुकथाएँ (पूरक पठन)
लेखिका — नरेंद्रकौर छाबड़ा | संपूर्ण स्वाध्याय, अभिव्यक्ति, भाषा बिंदु और उपयोजित लेखन — महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (लोकभारती)।
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लेखिका परिचय : नरेंद्रकौर छाबड़ा जी ने इन लघुकथाओं के माध्यम से हमारे समाज में व्याप्त विसंगतियों पर करारा व्यंग्य किया है। पहली लघुकथा 'कंगाल' में उन लोगों की मानसिकता को दर्शाया गया है जो बड़े होटलों में अंधाधुंध खर्च करते हैं, लेकिन गरीब मेहनत-कश लोगों से मोल-भाव करते हैं। दूसरी लघुकथा 'सही उत्तर' में भ्रष्टाचार और सत्य की शक्ति पर प्रकाश डाला गया है।
स्वाध्याय (प्रश्न-उत्तर)
संजाल पूर्ण कीजिए : गरमी की विशेषताएँ
- मौसम लिजलिजा और घुटनभरा था।
१. युवक को पहले नौकरी न मिल सकी
कारण : क्योंकि हर जगह भ्रष्टाचार और रिश्वत का बोलबाला था, जिसके कारण योग्यता होने के बावजूद उसका चयन नहीं हो पाता था।
२. आखिरकार अधिकारियों द्वारा युवक का चयन कर लिया गया
कारण : क्योंकि भीतर बैठे अधिकारियों ने गंभीरता से विचार-विमर्श करने के बाद युवक के सत्य और तर्कपूर्ण उत्तरों की दाद दी और उसका चयन कर लिया।
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अभिव्यक्ति
भ्रष्टाचार हमारे देश और समाज के माथे पर एक बहुत बड़ा कलंक है। यह एक ऐसी दीमक है जो देश की अर्थव्यवस्था और नैतिक मूल्यों को अंदर-ही-अंदर खोखला कर रही है। भ्रष्टाचार के कारण योग्य और ईमानदार लोगों को उनके अधिकार नहीं मिल पाते, जबकि अयोग्य और बेईमान लोग रिश्वत के बल पर सफलता हासिल कर लेते हैं।
भ्रष्टाचार केवल सरकारी विभागों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन के कई क्षेत्रों में फैल चुका है। जब तक समाज का हर नागरिक रिश्वत लेने और देने का कड़ा विरोध नहीं करेगा, तब तक देश प्रगति नहीं कर सकता। हमें ईमानदारी, नैतिकता और सत्य के मार्ग पर चलकर इस कलंक को हमेशा के लिए मिटाने का प्रयास करना चाहिए।
भाषा बिंदु (व्याकरण)
- क्या पैसा कमाने के लिए गलत रास्ता चुनना उचित है ? — प्रश्नार्थक वाक्य
- इस वर्ष भीषण गरमी पड़ रही थी। — विधानार्थक वाक्य
- आप उन गहनों की चिंता न करें। — निषेधार्थक वाक्य
- सुनील, जरा ड्राइवर को बुलाओ । — आज्ञार्थक वाक्य
- अपने समय के लेखकों में आप किन्हें पसंद करते हैं ? — प्रश्नार्थक वाक्य
- सैकड़ों मनुष्यों ने भोजन किया । — विधानार्थक वाक्य
- हाय ! कितनी निर्दयी हूँ मैं। — विस्मयादिबोधक वाक्य
- काकी उठो, भोजन कर लो । — आज्ञार्थक वाक्य
- वाह ! कैसी सुगंध है। — विस्मयादिबोधक वाक्य
- तुम्हारी बात मुझे अच्छी नहीं लगी । — निषेधार्थक वाक्य
- थोड़ी बातें हुईं । (निषेधार्थक वाक्य)
उत्तर : ज्यादा बातें नहीं हुईं। - मानू इतना ही बोल सकी । (प्रश्नार्थक वाक्य)
उत्तर : क्या मानू इतना ही बोल सकी? - मैं आज रात का खाना नहीं खाऊँगा। (विधानार्थक वाक्य)
उत्तर : मैं आज रात का खाना खाऊँगा। - गाय ने दूध देना बंद कर दिया । (विस्मयार्थक वाक्य)
उत्तर : अरे ! गाय ने दूध देना बंद कर दिया ! - तुम्हें अपना ख्याल रखना चाहिए। (आज्ञार्थक वाक्य)
उत्तर : अपना ख्याल रखो।
यह छात्र-स्वयं कृति है। प्रथम इकाई के पाठों (जैसे 'भारत महिमा', 'लक्ष्मी', 'वाह रे! हमदर्द') में से आप विभिन्न प्रकार के वाक्य (विधानार्थक, आज्ञार्थक, प्रश्नार्थक आदि) ढूँढ़कर अपनी कॉपी में लिख सकते हैं।
- अधिकारियों के चेहरे पर हलकी-सी मुस्कान और उत्सुकता छा गई। — [ सरल वाक्य ]
- हर ओर से अब वह निराश हो गया था। — [ सरल वाक्य ]
- उसे देख-देख बड़ा जी करता कि मौका मिलते ही उसे चलाऊँ। — [ मिश्र वाक्य ]
- वह बूढ़ी काकी पर झपटी और उन्हें दोनों हाथों से झटककर बोली। — [ संयुक्त वाक्य ]
- मोटे तौर पर दो वर्ग किए जा सकते हैं। — [ सरल वाक्य ]
- अभी समाज में यह चल रहा है क्योंकि लोग अपनी आजीविका शरीर श्रम से चलाते हैं। — [ मिश्र वाक्य ]
यह छात्र-स्वयं कृति है। पाठ्यपुस्तक से सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्यों के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखें।
उपयोजित लेखन
जल है तो कल है
जल ही जीवन का आधार है। पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक प्राणी, मनुष्य और वनस्पतियों के लिए जल अत्यंत आवश्यक है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन आज के समय में मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण जल का अंधाधुंध दुरुपयोग कर रहा है, जिससे कई स्थानों पर पीने के पानी का भारी संकट उत्पन्न हो गया है।
नदियों और झीलों का पानी प्रदूषित होता जा रहा है। यदि हमने अभी भी जल संरक्षण के उपाय नहीं किए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की बूँद-बूँद तरसना पड़ेगा। हमें चाहिए कि हम वर्षा के जल का संचयन करें, पेड़ों को लगाएँ और दैनिक कार्यों में पानी की बचत करें। याद रखें, 'जल है तो कल है', अर्थात् जल के सुरक्षित होने पर ही हमारा भविष्य सुरक्षित है।