२. लक्ष्मी
कथाकार — गुरुबचन सिंह | संपूर्ण स्वाध्याय, अभिव्यक्ति, भाषा बिंदु और उपयोजित लेखन — महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (लोकभारती)।
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स्वाध्याय (प्रश्न-उत्तर)
संजाल पूर्ण कीजिए : मार के कारण लक्ष्मी के व्यवहार में आया परिवर्तन
पाठ में दिए गए वाक्य :
१. उसके गले में रस्सी थी ।
२. रहमान बड़ा मूर्ख है।
३. वह लक्ष्मी को सड़क पर ले आया ।
४. उसने तुम्हें बड़ी बेदर्दी से पीटा है।
सही घटनाक्रम :
१. उसने तुम्हें बड़ी बेदर्दी से पीटा है। (वाक्य ४)
२. रहमान बड़ा मूर्ख है। (वाक्य २)
३. उसके गले में रस्सी थी । (वाक्य १)
४. वह लक्ष्मी को सड़क पर ले आया । (वाक्य ३)
- १. ज्ञान सिंह को मवेशी पालने का बहुत शौक था और प्रायः उसके दरवाजे पर भैंस या गाय बँधी रहती थी।
- २. दूध बेचना उसका धंधा नहीं था, वह केवल गाय को चारा और दर्रा देने के लिए कुछ पैसे जुटा लेता था।
१. करामत अली पिछले चार सालों से गाय की सेवा करता चला आ रहा था।
सही वाक्य : करामत अली पिछले एक वर्ष से उस गाय की सेवा करता चला आ रहा था।
२. करामत अली को लक्ष्मी की पीठ पर रोगन लगाने के बाद इत्मीनान हुआ ।
सही वाक्य : करामत अली को लक्ष्मी की पीठ पर रोगन लगाने के बाद भी इत्मीनान नहीं हुआ ।
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| १. नाम | लक्ष्मी |
| २. उम्र | अधेड़ उम्र (बूढ़ी) |
| ३. नस्ल | जर्सी गाय |
| ४. स्थिति | बुढ़ापे के कारण उसने दूध देना बंद कर दिया था। डंडे की मार से उसकी पीठ पर चोट लगी थी। |
१. करामत अली लक्ष्मी के लिए सानी तैयार करने लगा ।
कारण : क्योंकि रमजानी और रहमान ने लक्ष्मी को चारा नहीं दिया था, जिसके कारण वह भूखी थी।
२. रमजानी ने करामत अली को रोगन दिया ।
कारण : क्योंकि रहमान ने लक्ष्मी की पीठ पर डंडे बरसाए थे, जिससे उसे चोट लगी थी; रोगन लगाने से उसे आराम मिलता।
३. रहमान ने लक्ष्मी को इलाके से बाहर छोड़ दिया ।
कारण : क्योंकि उनके पास चारे के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उसने लक्ष्मी को बाहर छोड़ दिया ताकि वह नाले के पास या झाड़-झंखाड़ खाकर अपना पेट भर ले।
४. करामत अली ने लक्ष्मी को गऊशाला में भरती किया ।
कारण : क्योंकि लक्ष्मी ने दूध देना बंद कर दिया था, महँगाई में चारा खिलाना मुश्किल था, और करामत अली उसे कसाई के हाथ बेचना नहीं चाहता था। गऊशाला में वह सुरक्षित और मजे से रह सकती थी।
| शब्द | हिंदी में अर्थ | मराठी में अर्थ |
|---|---|---|
| पीठ | शरीर का एक अंग (Back) | आटा (गव्हाचे पीठ) |
| खाना | भोजन, खाने की क्रिया | कप्पा, दराज (Drawer/compartment) |
| शिक्षा | पढ़ाई, विद्या (Education) | दंड, सजा (Punishment) |
| कल | आने वाला या बीता हुआ दिन, मशीन | झुकाव, ओढा (Inclination) |
यदि मैं करामत अली की जगह होता, तो मैं भी किसी भी कीमत पर लक्ष्मी को कसाई (गाय खरीदने वाले) के हाथ नहीं बेचता। लक्ष्मी केवल एक मवेशी नहीं थी, बल्कि मेरे मित्र ज्ञान सिंह की सौंपी हुई एक अमानत थी। जब तक उसने दूध दिया, तब तक सबने उसका फायदा उठाया। जब वह बूढ़ी हो गई, तो उसे बेसहारा छोड़ देना या बेच देना अमानवीय कृत्य होता।
मैं भी परिवार की आर्थिक स्थिति और गाय की देखभाल के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता। यदि घर में उसे खिलाना पूरी तरह से असंभव हो जाता, तो मैं भी उसे गऊशाला में ही छोड़ता, जहाँ उसकी उचित देखभाल हो सके। जानवर मूक होते हैं, उन्हें हमारे प्यार और सहारे की आवश्यकता होती है, विशेषकर उनके बुढ़ापे में।
भाषा बिंदु (व्याकरण)
- ओह कंबख्त ने कितनी बेदर्दी से पीटा है
उत्तर : "ओह ! कंबख्त ने कितनी बेदर्दी से पीटा है।" - मैंने कराहते हुए पूछा मैं कहाँ हूँ
उत्तर : मैंने कराहते हुए पूछा, "मैं कहाँ हूँ ?" - मँझली भाभी मुट्ठी भर बुंदियाँ सूप में फेंककर चली गई
उत्तर : मँझली भाभी मुट्ठी भर बुंदियाँ सूप में फेंककर चली गई। - बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है उसकी ननद रूठी हुई है मोथी की शीतलपाटी के लिए
उत्तर : बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है, 'उसकी ननद रूठी हुई है मोथी की शीतलपाटी के लिए।' - केवल टीका नथुनी और बिछिया रख लिए थे
उत्तर : केवल टीका, नथुनी और बिछिया रख लिए थे। - ठहरो मैं माँ से जाकर कहती हूँ इतनी बड़ी बात
उत्तर : "ठहरो ! मैं माँ से जाकर कहती हूँ इतनी बड़ी बात।" - टाँग का टूटना यानी सार्वजनिक अस्पताल में कुछ दिन रहना
उत्तर : टाँग का टूटना यानी सार्वजनिक अस्पताल में कुछ दिन रहना । - जल्दी-जल्दी पैर बढ़ा
उत्तर : जल्दी-जल्दी पैर बढ़ा। - लक्ष्मी चल अरे गऊशाला यहाँ से दो किलोमीटर दूर है
उत्तर : "लक्ष्मी चल, अरे! गऊशाला यहाँ से दो किलोमीटर दूर है ।" - मानो उनकी एक आँख पूछ रही हो कहो कविता कैसी रही
उत्तर : मानो उनकी एक आँख पूछ रही हो, 'कहो कविता कैसी रही ?'
विरामचिह्नों का परिच्छेद :
एक दिन शाम को जब मैं बगीचे में टहल रहा था, तभी मेरा मित्र राहुल दौड़ता हुआ आया। उसने हाँफते हुए कहा, "अरे ! तुम्हें पता है कल क्या हुआ?" मैंने आश्चर्य से पूछा, "क्या हुआ? तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?" राहुल ने बताया कि कल रात उनके मोहल्ले में एक बहुत बड़ा आयोजन था। वहाँ मिठाई, नमकीन, फल—सब कुछ था; लेकिन अचानक बिजली चली गई! फिर क्या था, चारों तरफ शोर मच गया। कुछ लोग चिल्लाने लगे—बचाओ! बचाओ! (शायद कोई बच्चा गिर गया था)। आयोजक ने माइक पर आकर कहा: "कृपया शांति बनाए रखें।" थोड़ी ही देर में सब सामान्य हो गया। मैंने हँसते हुए उससे कहा, 'वाह दोस्त! यह तो सच में रोमांचक था।' खैर, जो होता है अच्छे के लिए होता है।
उपयोजित लेखन
एक गाय की आत्मकथा
मैं एक गाय हूँ। मेरा जन्म एक छोटे से गाँव के किसान, रामू काका के घर हुआ था। जब मैं छोटी बछड़ी थी, तब सारा परिवार मुझे बहुत प्यार करता था। काका के बच्चे मेरे साथ खेलते थे, मेरे गले में घंटी बाँधते थे और मुझे हरी-हरी घास खिलाते थे। मेरा बचपन बहुत सुखद और आनंदमय था।
जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मैं एक दुधारू गाय बन गई। मैंने अपने मीठे दूध से उस परिवार का पालन-पोषण किया। मेरे दूध से घर में दही, मक्खन और घी बनता था। रामू काका मुझे अपनी आमदनी का सबसे बड़ा साधन मानते थे और मुझे प्यार से 'गौरी' कहकर बुलाते थे। सुबह-शाम मेरे थानों से दूध दुहते समय काका मेरे माथे पर प्यार से हाथ फेरते थे, जिससे मेरी सारी थकान दूर हो जाती थी।
लेकिन समय एक सा नहीं रहता। अब मैं बूढ़ी हो गई हूँ। मेरे शरीर में पहले जैसी ताकत नहीं रही और मैंने दूध देना भी लगभग बंद कर दिया है। अब परिवार के लोग मेरी उतनी परवाह नहीं करते। कभी-कभी मुझे सूखा चारा ही नसीब होता है। मेरे मन में यह डर बना रहता है कि कहीं काका मुझे किसी कसाई के हाथ न बेच दें। मैं केवल इतनी ही प्रार्थना करती हूँ कि जिन इंसानों की मैंने उम्र भर सेवा की, वे मेरे बुढ़ापे में मुझे बेसहारा न छोड़ें और मुझे गऊशाला या किसी सुरक्षित स्थान पर चैन से अपना अंतिम समय बिताने दें।