४. शब्द संपदा
डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे रचित निबंध 'शब्द संपदा' का संपूर्ण स्वाध्याय, प्रश्न-उत्तर और व्याकरण।
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मैंने समझा : 'शब्द संपदा' निबंध के माध्यम से लेखक डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे जी ने शब्दों की असीम शक्ति और भाषा के महत्त्व को स्पष्ट किया है। भाषा के कारण ही मनुष्य ने आदिम अवस्था से आधुनिक अवस्था तक प्रगति की है। शब्द मनुष्य को ज्ञान से जोड़ते हैं, हँसाते हैं और रुलाते भी हैं। हमें अपनी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों का स्वागत करना चाहिए, परंतु अपने सुंदर शब्दों (जैसे- माँ, पिता) को अपमानित नहीं करना चाहिए। हमें अधिक से अधिक पुस्तकें पढ़कर अपनी 'शब्द संपदा' (Vocabulary) बढ़ानी चाहिए और सोच-समझकर अर्थपूर्ण शब्दों का ही प्रयोग करना चाहिए।
स्वाध्याय (पाठ के आधार पर)
(क) 'भाषा' का क्या अर्थ है, इसके कारण क्या हुआ है ?
'भाषा' का अर्थ है — सार्थक शब्दों का व्यवस्थित-क्रमबद्ध संयोजन। भाषा के कारण ही दुनिया की सभी ज्ञानशाखाओं का विकास हुआ है और मनुष्य ने आदिम अवस्था से लेकर आधुनिक अवस्था तक की प्रगति की है।
(ख) भाषा समृद्ध कैसे होती है ?
जब कुछ भाषाओं के शब्द किसी अन्य भाषा के शब्दों से मित्रता कर लेते हैं और उसी में घुल-मिल जाते हैं, तब भाषा समृद्ध होती है। इसके अलावा, दो भिन्न भाषाओं के शब्दों के मेल से नए शब्द (जैसे- वर्षगाँठ, रेलयात्री) बनने से भी भाषा की समृद्धि होती है।
लेखक के अनुसार, शब्द ही मनुष्य को ज्ञान से जोड़ते हैं, और मनुष्य को मनुष्य से जोड़ते या तोड़ते हैं। शब्द जीवंत होते हैं और उनमें मनुष्य के विविध स्वभाव व गुण होते हैं; जैसे कुछ शब्द हँसाते हैं, कुछ रुलाते हैं, कुछ धोखा देते हैं और कुछ अत्यंत सज्जन, सात्त्विक व सभ्य होते हैं। कुछ शब्द हमें निष्क्रिय बना देते हैं, जिन्हें हमें अपने जीवन से निकाल देना चाहिए।
भाषा समृद्धि के प्रमुख कारण हैं — विभिन्न भाषाओं (जैसे अंग्रेजी, पुर्तगाली, अरबी, फारसी आदि) के शब्दों का हमारी भाषा में आना और आसानी से घुल-मिल जाना। जिन शब्दों के लिए हमारे पास प्रतिशब्द नहीं होते (जैसे- ब्रश, रेल, रेडियो), उनका हम उपयोग करते हैं। इसके अलावा, दो अलग-अलग भाषाओं के शब्दों के मेल से नए शब्दों (जैसे- थानेदार, किताबघर) का निर्माण होना भी भाषा को समृद्ध बनाता है।
वाचन-संस्कृति बढ़ाने और साहित्य पढ़ने से हमारी 'शब्द संपदा' (Vocabulary) में वृद्धि होती है। हमें यह समझ आता है कि किस समय, किसके सामने और कैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। वाचन के अभ्यास से हम कम-से-कम शब्दों में अर्थपूर्ण बोलना और लिखना सीख जाते हैं, जिससे परीक्षा में भी अच्छी श्रेणी प्राप्त होती है।
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भाषा की ओर (समश्रुत भिन्नार्थक शब्द)
| १. (मील / मिल) | लक्ष्मी मिल यहाँ से दस मील दूरी पर है। |
| २. (प्रण / प्राण) | प्राण छोड़ दूँगा पर प्रण नहीं छोडूंगा। |
| ३. (हँस / हंस) | हंस को देखकर रुचिका हँस पड़ी। |
| ४. (कोष / कोश) | शब्द-कोश में कोष शब्द मिलता है। |
| ५. (दीन / दिन) | दिन-रात दीन-दुखियों की सेवा करना सभी का कर्तव्य है। |
| ६. (कुल / कूल) | नदी के कूल का कुल जल समेटा नहीं जा सकता। |
| ७. (दिया / दीया) | दीया दीवाली में जलाकर देहरी पर रख दिया। |
| ८. (पीता / पिता) | बालक पिता से पानी पीता है। |
स्पष्टीकरण : जो शब्द सुनने में एक जैसे लगते हैं परंतु उनका अर्थ और वर्तनी (Spelling) अलग होती है, उन्हें समश्रुत भिन्नार्थक शब्द कहते हैं। जैसे: कूल = किनारा, कुल = संपूर्ण। कोश = डिक्शनरी, कोष = खजाना।
अन्य कृतियाँ
हमारी वाणी (बोली) निम्नलिखित गुणों से युक्त होनी चाहिए:
कबीरदास जी के पाँच प्रसिद्ध दोहे निम्नलिखित हैं:
- गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥ - बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥ - काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरी करेगा कब॥ - ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥ - पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
किसी भी विषय की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने के लिए हम निम्नलिखित संदर्भ स्रोतों (Reference Sources) का उपयोग करते हैं:
- १. शब्दकोश (Dictionary) : शब्दों के अर्थ, उच्चारण और व्याकरण जानने के लिए।
- २. विश्वकोश (Encyclopedia) : विभिन्न विषयों (विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि) की विस्तृत जानकारी के लिए।
- ३. अंतरजाल (Internet / Google) : दुनिया भर की त्वरित और नवीनतम जानकारी प्राप्त करने के लिए।
- ४. समाचार पत्र और पत्रिकाएँ : वर्तमान घटनाओं और समसामयिक विषयों की जानकारी के लिए।
- ५. ग्रंथालय (Library) : संदर्भ ग्रंथ, जीवन-चरित्र और ऐतिहासिक पुस्तकें पढ़ने के लिए।