८. हम चलते सीना तान के
डॉ. हरिवंशराय बच्चन रचित कविता 'हम चलते सीना तान के' का संपूर्ण स्वाध्याय, भावार्थ और व्याकरण।
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मैंने समझा (कविता का भावार्थ) : इस कविता के माध्यम से कवि डॉ. हरिवंशराय बच्चन जी ने देशप्रेम, समानता, और बंधुता की भावना को व्यक्त किया है। हम सभी भले ही अलग-अलग धर्म, जाति, भाषा और अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों (पर्वत, सागर, मरुस्थल) से आए हों, लेकिन फौजी वर्दी पहनकर हम सबसे पहले हिंदुस्तानी हैं। जिस भारतमाता की मिट्टी में हम पले-बढ़े हैं, उसके ऋण (एहसान) को चुकाने के लिए हम अपना बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटेंगे। हम भारतमाता के वीर सपूत हैं और हमें अपने देश पर गर्व है, इसलिए हम सीना तानकर (गर्व से) चलते हैं।
स्वाध्याय (पाठ के आधार पर)
(क) 'हिंदुस्तान कि जिसकी मिट्टी में हम खेले, खाए हैं... भारतमाता के बेटे हम चलते सीना तान के।'
अर्थ : हम उस हिंदुस्तान के निवासी हैं, जिसकी पावन मिट्टी में हम खेले हैं, पले-बढ़े हैं और जिस धरती का अन्न खाकर हम बड़े हुए हैं। इस देश की धूल (रजकण) ने हमें ममता और समानता के साथ अपनाया है। हम पर अपनी मातृभूमि के अनगिनत एहसान (उपकार) हैं, जिनका कर्ज हमें अपने प्राणों की बाजी लगाकर चुकाना है। हम भारतमाता के बेटे हैं और हमें अपने भारतीय होने पर बहुत गर्व है, इसलिए हम सीना तानकर चलते हैं।
(ख) 'जो वीरत्व-विवेक समर में हम सैनिक दिखलाएँगे... भारतमाता के बेटे हम चलते सीना तान के।'
अर्थ : युद्ध (समर) के मैदान में हम सैनिक जो बहादुरी (वीरत्व) और समझदारी (विवेक) दिखाएँगे, हमारी उस बहादुरी की गाथाएँ (कहानियाँ) भारत के गाँव-गाँव, नगर-नगर और घर-घर में गाई जाएँगी। हमारे गौरवगान के बोल देशवासियों के अनगिनत कंठों (गलों) में गूँजेंगे। हम भारतमाता के वीर बेटे हैं और हम हमेशा सीना तानकर (गर्व से) चलते हैं।
देश हमारा सबसे प्यारा, सारे जग से न्यारा है,
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सबका यह दुलारा है।
प्राणों से भी बढ़कर हमको, अपनी भारतमाता है,
इसकी रक्षा के खातिर ही, हर सैनिक बलि जाता है।
इस कविता का केंद्रीय भाव 'राष्ट्रीय एकता और देशप्रेम' है। भारत में भले ही धर्म, जाति, भाषा और रहन-सहन की कितनी भी विविधता हो, लेकिन देश की रक्षा के लिए हम सब एक हैं। मातृभूमि ने हमें जो ममता और अन्न दिया है, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए हर भारतीय सैनिक अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तत्पर रहता है। हमें अपने भारतीय होने पर और अपने पुरखों के बलिदान पर गर्व है।
हमारे देश (भारत) के प्रमुख राष्ट्रीय प्रतीक निम्नलिखित हैं:
- राष्ट्रीय ध्वज : तिरंगा
- राष्ट्रगान : जन-गण-मन
- राष्ट्रीय गीत : वंदे मातरम्
- राष्ट्रीय चिह्न : अशोक स्तंभ (सारनाथ)
- राष्ट्रीय पशु : बाघ (Tiger)
- राष्ट्रीय पक्षी : मोर (Peacock)
- राष्ट्रीय पुष्प : कमल (Lotus)
- राष्ट्रीय वृक्ष : बरगद (Banyan Tree)
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भाषा की ओर (अर्थ के आधार पर वाक्य भेद)
| क्र. | वाक्य | वाक्य का प्रकार | पहचान का कारण |
|---|---|---|---|
| १. | बच्चे हँसते-हँसते खेल रहे थे। | विधानार्थक वाक्य | इसमें क्रिया के होने की सामान्य सूचना मिलती है। |
| २. | माला घर नहीं जाएगी। | निषेधार्थक वाक्य | इसमें कार्य के न होने ('नहीं') का बोध होता है। |
| ३. | इसे हिमालय क्यों कहते हैं? | प्रश्नार्थक वाक्य | इसमें प्रश्न ('क्यों') पूछा गया है। |
| ४. | सदैव सत्य के पथ पर चलो। | आज्ञार्थक वाक्य | इसमें आदेश या आज्ञा ('चलो') दी गई है। |
| ५. | वाह! क्या बनावट है ताजमहल की! | विस्मयार्थक वाक्य | इसमें विस्मय या आश्चर्य ('वाह!') का भाव है। |
| ६. | कश्मीर का सौंदर्य देखकर तुम्हें आश्चर्य होगा। | संभावनार्थक वाक्य | इसमें संभावना या संदेह ('होगा') व्यक्त की गई है। |
| ७. | खूब पढ़ो खूब बढ़ो। | इच्छार्थक वाक्य | इसमें इच्छा या आशीर्वाद व्यक्त किया गया है। |
| ८. | यदि बिजली आएगी तो रोशनी होगी। | संकेतार्थक वाक्य | इसमें एक क्रिया का दूसरी पर निर्भर होना ('यदि... तो') दर्शाया गया है। |
अन्य कृतियाँ
| राज्य का नाम | प्रमुख भाषा | राज्य का नाम | प्रमुख भाषा |
|---|---|---|---|
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यदि मैं सैनिक होता, तो मुझे अपने देश की सेवा करने का सीधा अवसर मिलता। मैं अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा सीमा पर मुस्तैद रहता। मैं देशवासियों की सुरक्षा के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं करता। मैं कड़ा अनुशासन अपनाता और देश के दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब देता। बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय मैं लोगों की सहायता करता और अपने देश का नाम हमेशा ऊँचा रखता। मुझे फौजी वर्दी पहनने पर गर्व होता और मैं हमेशा सीना तानकर चलता।