४. गाँव-शहर
कवि — प्रदीप शुक्ल | संपूर्ण स्वाध्याय, कविता का भावार्थ, तुलना करो, और भाषा बिंदु। महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (सुलभभारती)।
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स्वाध्याय (सूचना के अनुसार कृतियाँ करो)
| गाँव | शहर |
|---|---|
| १. गाँव में पीपल के सारे पत्ते झरे हुए हैं। | १. शहर ठसाठस भरे हुए हैं, जहाँ तिल रखने की जगह नहीं है। |
| २. गिल्लियाँ (गिलहरी) खेतों में धूप खा रही हैं। | २. सारा आलम आँखें खोले बस दौड़ रहा है। |
| ३. गैया लँगड़ाकर चल रही है क्योंकि सड़कों ने उसके खुर खा डाले हैं। | ३. मेट्रो के खंभे के नीचे परमेसुर रात गुजार रहा है। |
- १. मेट्रो — शहर
- २. पीपल — गाँव
- लँगड़ाकर चलने वाली — गैया (गाय)
- पत्ते झरा हुआ वृक्ष — पीपल
- बदले-से लगते हैं — सुर
- जहाँ तिल रखने की जगह नहीं है — शहर
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भाषा बिंदु
समानार्थी शब्द और वाक्य प्रयोग:
- आँख (नेत्र, नयन): प्रदूषण के कारण मोहन की आँख में जलन हो रही थी।
- सुर (स्वर, आवाज): लता मंगेशकर जी के सुर बहुत ही मीठे हैं।
- शहर (नगर): मुंबई भारत का एक बहुत बड़ा और व्यस्त शहर है।
विलोम (विरुद्धार्थी) शब्द और वाक्य प्रयोग:
- गाँव × शहर: शहर का जीवन गाँव की तुलना में बहुत तेज और व्यस्त होता है।
- रात × दिन: रात के बाद हमेशा एक नया दिन आता है।
- धूप × छाँव: गर्मी के मौसम में पेड़ों की छाँव बहुत राहत देती है।
उपयोजित लेखन व कल्पना पल्लवन
पंछी:मित्र वृक्ष, तुम आज इतने उदास क्यों लग रहे हो?
वृक्ष:क्या बताऊँ मित्र! आज सुबह मैंने सुना कि इस जंगल के पास से एक नई चौड़ी सड़क निकलने वाली है। मुझे डर है कि विकास के नाम पर कहीं मुझे और मेरे साथियों को काट न दिया जाए।
पंछी:यह तो बहुत ही बुरी खबर है। मनुष्य अपने थोड़े से स्वार्थ और सुविधा के लिए प्रकृति का विनाश क्यों कर रहा है?
वृक्ष:हाँ मित्र, उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि हमारे बिना उनका अपना जीवन भी संकट में पड़ जाएगा। हम शुद्ध हवा देते हैं, फल देते हैं, वर्षा लाते हैं, फिर भी हमें ही सजा मिल रही है।
पंछी:और मेरा क्या होगा? तुम ही मेरा आसरा हो। अगर तुम नहीं रहे, तो मैं अपना घोंसला कहाँ बनाऊँगा? मेरे छोटे बच्चे कहाँ सुरक्षित रहेंगे?
वृक्ष:यही चिंता मुझे अंदर से खाए जा रही है। अब हमें बस यही उम्मीद है कि शायद कुछ पर्यावरण प्रेमी लोग आगे आएँ और पेड़ों को कटने से बचा लें।
पंछी:हाँ मित्र, हम ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। शायद मनुष्यों को समय रहते अपनी गलती का अहसास हो जाए।
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि भारत की असली आत्मा उसके गाँवों और देहातों में बसती है। देहातों में आज भी अतिथि सत्कार, भाईचारा और मिलजुलकर त्योहार मनाने की सदियों पुरानी परंपरा जीवित है। वहाँ के लोग प्रकृति के करीब रहते हैं, सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं और बड़ों का सम्मान करते हैं।
शहरों की भागदौड़ और आधुनिकता की अंधी दौड़ में जहाँ लोग अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं, वहीं गाँवों में आज भी लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और मिट्टी से जुड़ाव देखने को मिलता है। यही वे मूल्य हैं जो हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति की पहचान हैं और जिन्हें देहातों ने आज भी सुरक्षित रखा है।
इस नवगीत के माध्यम से मैंने यह समझा कि वर्तमान समय में गाँव और शहर दोनों ही तेजी से बदल रहे हैं। लोग रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में गाँव छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं, जिसके कारण शहर ठसाठस भर गए हैं और वहाँ का जीवन तनावग्रस्त हो गया है। दूसरी ओर, गाँव सूने पड़ गए हैं और खेतों में सन्नाटा छा गया है। हमें इस बढ़ते शहरीकरण और गाँव-शहर के असंतुलन की समस्या पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।