२. जंगल
चित्रा मुद्गल — कहानी के पात्र व रिश्ते, पत्र लेखन, कहानी लेखन, मौलिक सृजन और पाठ के आँगन में (स्वाध्याय) के सभी प्रश्नों के उत्तर।
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पाठ का परिचय : प्रस्तुत संवादात्मक कहानी 'जंगल' (पूरक पठन) की लेखिका चित्रा मुद्गल जी हैं। इस कहानी में एक पालतू खरगोश (सोनू) की मृत्यु के माध्यम से छोटे बच्चों की बाल-सुलभ भावनाओं, मूक प्राणियों के प्रति उनकी संवेदनाओं और संरक्षण व दयाभाव को अत्यंत मार्मिक ढंग से दर्शाया गया है।
पाठ के आँगन में (स्वाध्याय)
(क) प्रवाह तालिका : कहानी के पात्र तथा उनके स्वभाव की विशेषताएँ
| पात्र | स्वभाव की विशेषताएँ |
|---|---|
| मांडवी दीदी (दादी) | बच्चों और मूक प्राणियों की भावनाओं को भली-भांति समझने वाली, अत्यंत संवेदनशील और स्नेही महिला। |
| पीयूष (पोता) | मासूम, अबोध, और पशु-पक्षियों (सोनू-मोनू खरगोश) से गहरा लगाव एवं प्रेम रखने वाला बच्चा। |
| तविषा (बहू) | खरगोश की मौत पर चिंतित, परेशान और अनजाने में हुई गलती (पारे की गोलियां) के लिए अपराध-बोध से ग्रस्त। |
| शैलेश (बेटा) | व्यावहारिक सोच वाला व्यक्ति, जो मृत खरगोश को नाले में फिंकवाने की सलाह देता है। |
(ख) पहचानिए रिश्ते :
| (१) दादी - तविषा | सास और बहू |
| (२) पीयूष - शैलेश | बेटा और पिता |
| (३) तविषा - शैलेश | पत्नी और पति |
| (४) शैलेश - दादी | बेटा और माँ |
रचनात्मक लेखन (पत्र व कहानी)
दिनांक: १५ मई, २०२६
प्रति,
माननीय आयुक्त महोदय,
महानगरपालिका,
नागपुर - ४४०००१
विषय : गरमी के मौसम में पक्षियों के लिए दाना-पानी और घोंसलों की व्यवस्था करने हेतु प्रशंसा पत्र।
महोदय,
मैं अमन शर्मा, शंकर नगर परिसर का एक जागरूक नागरिक हूँ। मैं इस पत्र के माध्यम से नागपुर महानगरपालिका के उद्यान व पर्यावरण विभाग द्वारा किए गए एक अत्यंत सराहनीय और परोपकारी कार्य की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ।
इस भीषण गरमी में जहाँ इंसानों का बुरा हाल है, वहाँ बेजुबान पक्षियों की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। पानी की कमी के कारण हर साल कई पक्षी अपनी जान गँवा देते हैं। परंतु इस वर्ष महानगरपालिका ने विभिन्न सार्वजनिक उद्यानों और पेड़ों पर पक्षियों के लिए कृत्रिम घोंसले लगाए हैं तथा उनके लिए नियमित रूप से 'चुग्गा-दाना और पानी' (बर्ड फीडर) की व्यवस्था की है। आपके इस कदम से शहर के पर्यावरण में सकारात्मक बदलाव आया है और पक्षियों को नया जीवन मिला है।
मैं और मेरा पूरा मोहल्ला महानगरपालिका के इस पशु-पक्षी प्रेम और संवेदनशीलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। आशा है भविष्य में भी विभाग मूक प्राणियों के संरक्षण के लिए ऐसे ही पुनीत कार्य करता रहेगा।
सधन्यवाद।
भवदीय,
अमन शर्मा
२५, शंकर नगर, नागपुर
ईमेल: aman.s@email.com
एकता में बल / जनसहायता का कमाल
रामनगर नामक एक सुंदर गाँव था। गाँव के लोग खेती पर निर्भर थे। एक वर्ष बारिश बिल्कुल नहीं हुई और गाँव में भीषण अकाल पड़ गया। खेत सूख गए और मवेशियों के लिए पीने का पानी भी नहीं बचा। गाँव के किनारे एक बहुत पुराना तालाब था, जो पूरी तरह से सूख चुका था और उसमें मिट्टी भर गई थी ।
गाँव के सरपंच ने सभी ग्रामीणों की एक बैठक बुलाई। उन्होंने समझाया कि यदि हम सरकार के भरोसे बैठे रहे तो शायद देर हो जाए। सरपंच ने सुझाव दिया कि क्यों न हम सब मिलकर जनसहायता से इस तालाब की खुदाई करें। गाँव के युवा, बुजुर्ग और महिलाएँ सभी ने फावड़े और कुदाल उठाए और श्रमदान करने लगे। कुछ लोगों ने मजदूरों के लिए भोजन की व्यवस्था की। देखते-ही-देखते बीस दिनों में तालाब गहरा और चौड़ा हो गया।
कुछ दिनों बाद मानसून आया और झमाझम बारिश हुई। गहरा होने के कारण वह पूरा तालाब पानी से लबालब भर गया। इसका परिणाम यह हुआ कि गाँव के जलस्तर में वृद्धि हो गई, खेतों को सिंचाई के लिए पानी मिलने लगा और गाँव हमेशा के लिए अकाल से मुक्त हो गया ।
सीख : सामूहिक प्रयास (जनसहायता) और एकता से बड़ी-से-बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है।
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अभिव्यक्ति (मौलिक सृजन / पाठ से आगे / लेखनीय)
जंगलों को 'पृथ्वी के फेफड़े' (Lungs of the Earth) कहा जाता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य और अन्य प्राणियों को जीवित रहने के लिए प्राणवायु (ऑक्सीजन) की आवश्यकता होती है। जंगल ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाले सबसे बड़े और प्राकृतिक स्रोत हैं।
जंगलों में मौजूद करोड़ों पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया के दौरान वातावरण से हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं और जीवनदायिनी ऑक्सीजन को बाहर छोड़ते हैं। आज के समय में बढ़ते प्रदूषण, वाहनों के धुएँ और कारखानों से निकलने वाली विषैली गैसों ने पर्यावरण को दूषित कर दिया है। ऐसे में जंगल ही वह प्राकृतिक फिल्टर हैं जो हवा को शुद्ध करते हैं और तापमान को संतुलित रखते हैं। यदि जंगल नष्ट हो गए, तो पृथ्वी पर ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाएगी और जीवन असंभव हो जाएगा। इसलिए जंगलों का संरक्षण करना हमारे स्वयं के अस्तित्व को बचाने के समान है।
पालतू प्राणी हमारे परिवार के सदस्य की तरह होते हैं, इसलिए उनकी देखभाल करना हमारा कर्तव्य है। मैं अपने पालतू प्राणियों के लिए निम्नलिखित कार्य करता हूँ :
- नियमित आहार और स्वच्छता : मैं उन्हें समय पर पौष्टिक भोजन और पीने के लिए साफ पानी देता हूँ। उनके रहने के स्थान (पिंजरा या डॉग-हाउस) को हमेशा साफ-सुथरा रखता हूँ ताकि उन्हें कोई संक्रमण न हो।
- स्वास्थ्य की देखभाल : यदि वे सुस्त या बीमार दिखाई देते हैं, तो मैं तुरंत उन्हें पशु-चिकित्सक (Veterinary Doctor) के पास ले जाता हूँ और उनका नियमित टीकाकरण भी करवाता हूँ।
- स्नेह और समय : बेजुबान जानवरों को हमारे प्यार की बहुत आवश्यकता होती है। मैं शाम को उनके साथ खेलता हूँ, उन्हें घुमाने ले जाता हूँ और कभी भी उन पर क्रोध नहीं करता। उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखता हूँ।
| अभयारण्य / राष्ट्रीय उद्यान का नाम | स्थान (जिला) | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| १. ताड़ोबा अंधारी राष्ट्रीय उद्यान | चंद्रपुर | यह महाराष्ट्र का सबसे पुराना और बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है। यह मुख्य रूप से अपने 'बंगाल टाइगर' (बाघों) की बड़ी आबादी के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। |
| २. संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान | मुंबई (बोरीवली) | यह दुनिया के उन गिने-चुने उद्यानों में से है जो महानगर के बीच स्थित हैं। यहाँ तेंदुए पाए जाते हैं और प्रसिद्ध प्राचीन 'कान्हेरी गुफाएँ' भी इसी उद्यान के अंदर स्थित हैं। |
| ३. मेळघाट व्याघ्र प्रकल्प (Tiger Reserve) | अमरावती | यह सतपुड़ा पर्वत शृंखला में स्थित है। यह महाराष्ट्र के पहले ९ टाइगर रिज़र्व में से एक है। बाघों के अलावा यहाँ जंगली भालू, चीतल और दुर्लभ पक्षी पाए जाते हैं। |
| ४. राधानगरी वन्यजीव अभयारण्य | कोल्हापुर | यह पश्चिमी घाट में स्थित है और मुख्य रूप से 'भारतीय बाइसन' (गवा / Indian Bison) के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। इसे विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) का भी दर्जा प्राप्त है। |