६. निसर्ग वैभव
सुमित्रानंदन पंत — कविता का भावार्थ, संजाल, प्रवाह तख्ता, भाषा बिंदु (मुहावरे), और स्वाध्याय के सभी प्रश्नों के उत्तर।
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कविता का परिचय : 'निसर्ग वैभव' छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत जी द्वारा रचित एक अत्यंत सुंदर कविता है। इस कविता में कवि ने प्राकृतिक सौंदर्य, शांति और वैभव का सजीव चित्रण किया है और इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया है कि प्रकृति के इतने सुंदर होने के बावजूद मनुष्य का जीवन संघर्ष और दुखों से क्यों भरा हुआ है ।
पाठ के आँगन में (स्वाध्याय)
(क) संजाल : कविता में आए प्राकृतिक सौंदर्य के घटक
(ख) कविता की पंक्तियों को उचित क्रमानुसार लिखकर प्रवाह तख्ता पूर्ण कीजिए :
दिए गए विकल्प :
(१) परिचित मरकत आँगन में !
(२) अभिशापित हो उसका जीवन ?
(३) अनिल स्पर्श से पुलकित तृणदल,
(४) निश्चल तरंग-सी स्तंभित !
प्रवाह तख्ता (सही क्रम) :
प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने यह संदेश दिया है कि ईश्वर द्वारा रचित यह प्राकृतिक जगत अत्यंत सुंदर, शांत और वैभवशाली है। यहाँ के पशु-पक्षी, नदियाँ और वनस्पतियाँ सभी मिल-जुलकर खुशी से रहते हैं। प्रकृति में कहीं कोई स्वार्थ या दुख नहीं है ।
दूसरी ओर, मनुष्य जो ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि (चेतन जग) है, वह अपने छोटे से अहंकार (क्षुद्र अहंता) और स्वार्थ के कारण दुखी और हमेशा संघर्षरत है। मनुष्य को चाहिए कि वह प्रकृति से सीख ले, अपने तुच्छ अहंकार को त्यागकर विश्व-चेतना से जुड़े और अपने जीवन को भी प्रकृति की तरह ही सुंदर व शांतिमय बनाए ।
तृतीय चरण की पंक्तियाँ :
सद्यः स्फुट सौंदर्य राशि / सम्मोहन भरती मन में, / कितना विस्मयकर वैचित्र्य / भरा पर्वत जीवन में ! / खग चखते फल, / कुतर रहीं गिलहरियाँ कोंपल, / वन-पशु सब लगते प्रसन्न / परिचित मरकत आँगन में ! / स्वाभाविक, / यदि मुझे याद आता / ईश्वर इस क्षण में !
भावार्थ : कवि कहते हैं कि प्रकृति के प्रांगण में ताजे खिले हुए सौंदर्य को देखकर मन पूरी तरह मोहित हो जाता है। पर्वत के जीवन में कितना आश्चर्यजनक वैचित्र्य (अनोखापन) भरा हुआ है! पक्षी मीठे फल चख रहे हैं, गिलहरियाँ कोमल पत्ते कुतर रही हैं। पन्ने (मरकत) के समान इस हरे-भरे वन रूपी आँगन में सभी जंगली पशु-पक्षी बहुत प्रसन्न लग रहे हैं। इस अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, जीवों की प्रसन्नता और शांति को देखकर मन में अनायास ही ईश्वर की याद आ जाना बहुत स्वाभाविक है।
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भाषा बिंदु (मुहावरे-कहावतें)
| अशुद्ध / अनुपयुक्त मुहावरा | शुद्ध / उपयुक्त मुहावरा |
|---|---|
| १. टोपी | टोपी पहनाना (अर्थ: मूर्ख बनाना) |
| २. कमर | कमर कसना (अर्थ: तैयार होना) |
| ३. | आटा गीला होना (अर्थ: विपत्ति में और विपत्ति आना) |
| ४. | आँख की किरकिरी होना (अर्थ: खटकना या बुरा लगना) |
| ५. | आसमान सिर पर उठाना (अर्थ: बहुत शोर मचाना) |
| ६. | आग पानी का बैर (अर्थ: स्वाभाविक शत्रुता) |
अभिव्यक्ति (कल्पना पल्लवन / पठनीय)
(साक्षात्कारकर्ता/प्रबंधक और उम्मीदवार अमित के बीच संवाद)
अमित : (दरवाजे पर खटखटाते हुए) क्या मैं अंदर आ सकता हूँ, सर?
प्रबंधक : हाँ, आइए अमित। कृपया बैठिए।
अमित : धन्यवाद सर।
प्रबंधक : अमित, आपने हमारे कार्यालय में 'लिपिक' (Clerk) के पद के लिए आवेदन किया है। सबसे पहले अपने बारे में कुछ बताइए।
अमित : सर, मैंने पिछले वर्ष बी.कॉम. पूरा किया है। मुझे कंप्यूटर टाइपिंग, एमएस ऑफिस और अकाउंटिंग का अच्छा ज्ञान है।
प्रबंधक : क्या आपको इस कार्य का कोई पूर्व अनुभव है?
अमित : सर, मैंने कॉलेज के दौरान छह महीने तक एक स्थानीय फर्म में इंटर्नशिप की थी, जहाँ मैंने डेटा एंट्री और फाइलिंग का काम संभाला था।
प्रबंधक : बहुत अच्छे। क्या आप टीम के साथ मिलकर काम कर सकते हैं?
अमित : जी सर, मुझे टीम के साथ काम करना पसंद है और मैं नई चीजें बहुत जल्दी सीख लेता हूँ।
प्रबंधक : ठीक है अमित, आपसे मिलकर अच्छा लगा। हम आपको जल्द ही सूचित करेंगे।
अमित : आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर।
- नदी : नदी शब्द सुनते ही मन में निरंतर आगे बढ़ते रहने, जीवन में कभी न रुकने और बिना किसी भेदभाव के सबकी प्यास बुझाने (परोपकार) का भाव आता है।
- पर्वत : पर्वत शब्द से मन में अचल रहने, दृढ़ निश्चय, और जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अडिग खड़े रहने का भाव जागृत होता है।
- वृक्ष : वृक्ष शब्द से निस्वार्थ सेवा, तपती धूप में दूसरों को छाँव देने और दूसरों की भलाई के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने का भाव उत्पन्न होता है।
- चाँद : चाँद शब्द पढ़ते ही मन में शीतलता, अपार शांति, और घने अँधेरे में भी प्रकाश एवं उम्मीद की किरण फैलाने का सुंदर भाव आता है।