७. शिष्टाचार
भीष्म साहनी — कहानी का संजाल, कारण लिखिए, कहानी लेखन (मुद्दों के आधार पर), अव्यय और स्वाध्याय के सभी प्रश्नों के उत्तर।
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पाठ का परिचय : प्रस्तुत चरित्रात्मक कहानी 'शिष्टाचार' के लेखक भीष्म साहनी जी हैं। इस कहानी में उन्होंने पति-पत्नी और नौकर-मालिक के बीच के संबंधों, नौकरों के प्रति समाज के दृष्टिकोण और अनजाने में की गई गलतियों के पश्चात्ताप को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है ।
पाठ के आँगन में (स्वाध्याय)
(१) गद्यांश में 'हेतू' की बताई गई विशेषताएँ :
अन्य विशेषताएँ : वह उजड्ड, गँवार और अरूप (कुरूप) भी था।
(क) संजाल : श्रीमती की विशेषताएँ
(२) ऐसे प्रश्न तैयार कीजिए जिनके उत्तर निम्न शब्द हों :
- १. बरखास्त : श्रीमती दिन में दस-दस बार हेतू को नौकरी से क्या करती थीं?
- २. हेतू : शिमला के नजदीक एक गाँव से आए नए नौकर का क्या नाम था?
(३) कारण लिखिए :
- १. रामगोपाल जी की नौकरों की खोज शिथिल हुई : क्योंकि हेतू उजड्ड और अरूप होने पर भी दिन में केवल दो बार खाता था, उसका वेतन केवल बारह रुपए था, और कोई नुकसान करने पर उसकी तनख्वाह काटी जाती थी।
- २. हेतू की तनख्वाह से कटौती होती : क्योंकि उसके मोटे-मोटे स्थूल हाथों से घर के काँच के गिलास टूट जाते थे या परदों पर धब्बे पड़ जाते थे।
(ख) विधानों के सामने दी हुई चौखट में सत्य / असत्य लिखिए :
- १. अगले दिन श्रीमती ने अपना ट्रंक खोलकर अपनी चीजों की पड़ताल शुरू की। — सत्य
- २. सहसा हेतू की आँखों में आँसू आ गए। — सत्य
(ग) श्रीमती के नौकरों के बारे में विचार :
- नौकर झूठे, गलीज और लंपट होते हैं।
- किसी नौकर पर विश्वास नहीं किया जा सकता, वे हमेशा पैसे चुराते (काटते) हैं।
- वे हर वक्त नई नौकरी की तलाश में रहते हैं और जो मिल जाए तो घर से बीमारी की झूठी चिट्ठी मँगवा लेते हैं।
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स्वमत / अभिव्यक्ति
नौकर और मालिक दोनों ही मनुष्य हैं, इसलिए उनके बीच का संबंध केवल पैसों का न होकर मानवीय भावनाओं पर आधारित होना चाहिए। नौकर हमारे घर का वह अहम सदस्य होता है जो दिन-रात हमारी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखता है। यदि मालिक नौकर के प्रति सम्मान, प्रेम और सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखेगा, तो नौकर भी अपना काम पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ करेगा।
अक्सर देखा गया है कि नौकरों को छोटी-छोटी गलतियों पर प्रताड़ित किया जाता है या उन पर बिना वजह शक किया जाता है, जो सर्वथा अनुचित है। जब एक मालिक अपने नौकर के सुख-दुख में साथ खड़ा होता है, तो नौकर भी परिवार के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहता है। अतः दोनों के बीच आपसी विश्वास और सद्व्यवहार का होना अत्यंत आवश्यक है।
संसार में अनेक धर्म, पंथ और मान्यताएँ हैं, लेकिन इन सबसे ऊपर 'मानवता' (इंसानियत) का धर्म है। मानवता का अर्थ है हर प्राणी के प्रति दया, करुणा, प्रेम और सहानुभूति रखना। किसी व्यक्ति को केवल इसलिए श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता क्योंकि वह एक ऊँचे कुल या धर्म में पैदा हुआ है; उसकी महानता उसके मानवीय आचरण से तय होती है।
जब हम किसी भूखे को खाना खिलाते हैं, किसी असहाय की मदद करते हैं या किसी के दुख में उसके आँसू पोंछते हैं, तो वह किसी भी धार्मिक पूजा या अनुष्ठान से बड़ा कार्य होता है। ईश्वर ने हमें मनुष्य बनाया है ताकि हम एक-दूसरे के काम आ सकें। यदि मनुष्य में मानवता न हो, तो वह पशु के समान है। अतः बिना किसी भेदभाव के इंसान की मदद करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है।
मौलिक सृजन (कहानी लेखन)
(छुट्टियों में गाँव आना, कुआँ खोदने का प्रारंभ, लोगों का जुड़ना, शहर के महाविद्यालय में पढ़ना, लोगों का हँसना, एक लड़का, कुआँ तैयार होना, लोगों का खुश होना, कुआँ पानी से भरना, सीख, शीर्षक, प्रतिवर्ष सूखे की समस्या का सामना, एक मित्र का साथ देना)
मुद्दों का उचित क्रम :
एक लड़का → शहर के महाविद्यालय में पढ़ना → छुट्टियों में गाँव आना → प्रतिवर्ष सूखे की समस्या का सामना → मन में निश्चय → कुआँ खोदने का प्रारंभ → लोगों का हँसना → एक मित्र का साथ देना → लोगों का जुड़ना → कुआँ तैयार होना → कुआँ पानी से भरना → लोगों का खुश होना → सीख, शीर्षक।
कहानी लेखन :
मेहनत का फल (भागीरथ प्रयास)
रामपुर नामक एक गाँव में मोहन नाम का एक होनहार लड़का रहता था। वह अपनी आगे की पढ़ाई के लिए शहर के महाविद्यालय में गया हुआ था। जब वह गर्मियों की छुट्टियों में अपने गाँव आया, तो उसने देखा कि उसका गाँव प्रतिवर्ष सूखे की समस्या का सामना कर रहा है। गाँव की महिलाएँ मीलों दूर से पानी भरकर ला रही थीं। यह देखकर मोहन बहुत दुखी हुआ और उसने मन में निश्चय किया कि वह इस समस्या का हल निकालेगा।
अगले ही दिन मोहन ने गाँव के खाली मैदान में अकेले ही फावड़ा उठाया और कुआँ खोदने का प्रारंभ कर दिया। उसे अकेले मिट्टी खोदता देख गाँव के लोग उस पर हँसने लगे और कहने लगे कि "यह लड़का पागल हो गया है, यहाँ पानी कहाँ से निकलेगा?" लेकिन मोहन ने किसी की परवाह नहीं की। उसका दृढ़ निश्चय देखकर उसका एक मित्र उसके साथ आकर कुआँ खोदने लगा।
उन दोनों की लगन देखकर गाँव के कुछ बुजुर्गों को अपनी गलती का अहसास हुआ और धीरे-धीरे अन्य लोग भी इस मुहिम से जुड़ने लगे। सभी ने मिलकर श्रमदान किया और कुछ ही दिनों में एक गहरा कुआँ तैयार हो गया। कुछ समय बाद जब बारिश हुई, तो वह कुआँ साफ पानी से भर गया। अब गाँव में पानी की कोई कमी नहीं रही, जिसे देखकर सारे गाँव वाले बहुत खुश हुए और उन्होंने मोहन का धन्यवाद किया।
सीख : दृढ़ निश्चय और निरंतर परिश्रम से बड़े-से-बड़ा और असंभव कार्य भी संभव हो जाता है। एकता और लगन में बहुत शक्ति होती है।
भाषा बिंदु (व्याकरण - अव्यय)
| अव्यय का भेद | पाठ्यपुस्तक (शिष्टाचार) से खोजे गए वाक्य |
|---|---|
| १. क्रियाविशेषण अव्यय (Adverb) | गाँव का भोला धीरे-धीरे एक शहरी नौकर में तब्दील होने लगा। (यहाँ 'धीरे-धीरे' रीतिवाचक क्रियाविशेषण है।) |
| २. संबंधबोधक अव्यय (Preposition) | हेतू शिमला के नजदीक एक गाँव से आया था। (यहाँ 'के नजदीक' संबंधबोधक है।) |
| ३. समुच्चयबोधक अव्यय (Conjunction) | श्रीमती दिन में दस-दस बार उसे बरखास्त करतीं पर तब भी हेतू की पीठ मजबूत थी। (यहाँ 'पर' दो वाक्यों को जोड़ रहा है।) |
| ४. विस्मयादिबोधक अव्यय (Interjection) | "अरे तू कहाँ था इतने दिन ?" (यहाँ 'अरे' आश्चर्य का भाव प्रकट कर रहा है।) |