7. आत्मत्राण
रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रार्थना-कविता — सार, प्रश्न-उत्तर और भाव स्पष्टीकरण. NCERT हिंदी स्पर्श (भाग 2).
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पाठ का परिचय : ‘आत्मत्राण’ रवींद्रनाथ ठाकुर की बांग्ला कविता है, जिसका हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है। कवि ईश्वर से यह नहीं माँगते कि वे उन्हें दुखों से बचाएँ। वे केवल इतनी शक्ति माँगते हैं कि हर संकट का सामना वे स्वयं निर्भय होकर कर सकें।
कविता का सार
कवि कहते हैं कि हे करुणामय प्रभु, मुझे विपत्तियों से बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं है। मैं चाहता हूँ कि विपत्ति में मुझे डर न लगे। दुख में तुम सांत्वना न दो तो भी कोई बात नहीं, पर मुझे दुख पर विजय पाने की शक्ति दो।
यदि कोई सहायक न मिले तो भी मेरा बल और पौरुष न डगमगाए। संसार में हानि उठानी पड़े या धोखा मिले, तब भी मैं मन से हार न मानूँ। तुम मेरा बोझ हल्का न करो, बस मुझे उसे निर्भय होकर उठाने की शक्ति दो।
सुख के दिनों में मैं विनम्र होकर हर पल तुम्हें याद करूँ। दुख की रात में जब सारा संसार मुझे धोखा दे, तब भी मैं तुम पर संदेह न करूँ।
कविता का पूरा पाठ NCERT पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श’ (भाग 2) में पढ़ें।
प्रश्न-अभ्यास (क) — निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
कवि करुणामय ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं। वे माँगते हैं कि विपत्ति में उन्हें भय न हो, वे दुखों पर विजय पा सकें और कोई सहायक न मिलने पर भी उनका आत्मबल बना रहे। दुख के समय भी उन्हें ईश्वर पर संदेह न हो।
कवि कहना चाहते हैं कि वे ईश्वर से विपत्तियों से बचाने की प्रार्थना नहीं करते। वे संकटों का सामना स्वयं करना चाहते हैं। वे केवल इतना चाहते हैं कि संकट में उनके मन में डर न आए और उनका साहस बना रहे।
कवि प्रार्थना करते हैं कि यदि संकट के समय कोई सहायक न मिले, तो भी उनका बल और पौरुष न डगमगाए। वे अपने आत्मबल से संकट का सामना कर सकें।
अंत में कवि अनुनय करते हैं कि सुख के दिनों में वे विनम्र होकर हर पल ईश्वर को याद करें। दुख की रात में जब सारा संसार उन्हें धोखा दे, तब भी उनके मन में ईश्वर के प्रति कोई संदेह न उठे।
‘आत्मत्राण’ का अर्थ है — अपनी रक्षा स्वयं करना या आत्मा का बचाव। कवि ईश्वर से अपनी रक्षा नहीं माँगते, बल्कि स्वयं संकटों से लड़ने की शक्ति माँगते हैं। वे भय से अपने मन की रक्षा चाहते हैं। इसलिए यह शीर्षक पूरी तरह सार्थक है।
- लक्ष्य तय करके उसके लिए योजना बनाते हैं।
- लगन और परिश्रम से काम करते हैं।
- असफल होने पर निराश न होकर फिर प्रयास करते हैं।
- बड़ों और शिक्षकों से मार्गदर्शन लेते हैं।
- समय का सही उपयोग करते हैं।
हाँ, यह प्रार्थना अन्य प्रार्थनाओं से अलग है। सामान्य प्रार्थनाओं में लोग ईश्वर से सुख, धन और दुखों से छुटकारा माँगते हैं। इस प्रार्थना में कवि कुछ भी नहीं माँगते, केवल संकटों से लड़ने का साहस और आत्मबल माँगते हैं। वे ईश्वर पर निर्भर होने के बजाय आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं।
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प्रश्न-अभ्यास (ख) — भाव स्पष्ट कीजिए
कवि कहते हैं कि सुख के दिनों में भी वे घमंड न करें। वे विनम्रता से सिर झुकाकर हर पल ईश्वर को याद करते रहें और हर सुख में उनकी कृपा का अनुभव करें।
कवि कहते हैं कि यदि संसार में उन्हें हानि उठानी पड़े और लाभ के बदले केवल धोखा मिले, तब भी वे मन से हार न मानें। उनका मनोबल कभी कम न हो।
कवि ईश्वर से माँगते हैं कि उन्हें संकटों से पार पाने की स्वस्थ और पूर्ण शक्ति मिले। यदि ईश्वर उनका दुख का भार हल्का न करें और सांत्वना भी न दें, तो भी कोई बात नहीं। वे अपने बल से उस भार को उठा सकें।
योग्यता विस्तार और परियोजना कार्य
समानता : दोनों प्रार्थनाओं में ईश्वर से आत्मबल और मन का विश्वास माँगा गया है।
अंतर : ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ में नेक रास्ते पर चलने और भूल न करने की शक्ति माँगी गई है। ‘आत्मत्राण’ में संकटों का सामना स्वयं करने और दुख में भी ईश्वर पर संदेह न करने की शक्ति माँगी गई है।
- 1913 में ‘गीतांजलि’ के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय।
- भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ उनकी रचनाएँ हैं।
- उन्होंने शांतिनिकेतन में ‘विश्वभारती’ शिक्षण संस्थान की स्थापना की।
- उनके गीतों को ‘रवींद्र संगीत’ कहा जाता है।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विपदा | विपत्ति, मुसीबत |
| करुणामय | दूसरों पर दया करने वाला |
| दुःख-ताप | कष्ट की पीड़ा |
| व्यथित | दुखी |
| सहायक | मददगार |
| पौरुष | पराक्रम |
| क्षय | नाश |
| त्राण | भय निवारण, बचाव, आश्रय |
| अनुदिन | प्रतिदिन |
| अनामय | रोग रहित, स्वस्थ |
| सांत्वना | तसल्ली देना |
| अनुनय | विनय |
| नत शिर | सिर झुकाकर |
| वंचना | धोखा देना |
| निखिल | संपूर्ण |
| संशय | संदेह |