2. क्या लिखूँ?
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का निबंध — सार, बहुविकल्पी प्रश्न, प्रश्न-उत्तर, भाव-विस्तार, समास, उपसर्ग-प्रत्यय व शब्द-संपदा. NCERT हिंदी (गंगा).
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पाठ का परिचय : ‘क्या लिखूँ?’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का निबंध है। लेखक को नमिता और अमिता के लिए दो आदर्श निबंध लिखने हैं — ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’। इसी बहाने वे निबंध लिखने की प्रक्रिया को रोचक और आत्मपरक शैली में समझाते हैं।
पाठ का सार
ए.जी. गार्डिनर के अनुसार लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। तब विषय की चिंता नहीं रहती, जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे देती है। पर लेखक को लिखने के लिए सोचना और परिश्रम करना पड़ता है।
लेखक ने निबंधशास्त्र के आचार्यों के नियम देखे — निबंध छोटा हो, सामग्री और शैली उसके दो अंग हों, पहले रूपरेखा बने और भाषा में प्रवाह हो। लेखक को ये नियम निभाना कठिन लगा। फिर उन्हें मानटेन की पद्धति अच्छी लगी, जिसमें लेखक अपने देखे, सुने और अनुभव किए को स्वच्छंद रूप से लिखता है।
अमीर खुसरो की तरह लेखक ने दोनों विषयों को एक ही निबंध में जोड़ दिया। दूर के ढोल इसलिए सुहावने लगते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। उसी तरह तरुणों को भविष्य और वृद्धों को अतीत सुखद लगता है। दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। इसी कारण हर युग में सुधारों की आवश्यकता बनी रहती है।
मेरे उत्तर मेरे तर्क
उत्तर : (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
कारण : लेखक कहते हैं — असली वस्तु हैट है, खूँटी नहीं। यानी मन के भाव ही असली हैं, विषय नहीं।
उत्तर : (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
कारण : लेखक कहते हैं — इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ।
उत्तर : (घ) अभिलाषा और अनुभव
कारण : तरुणों के मन में भविष्य की अभिलाषाएँ होती हैं, जबकि वृद्धों के पास बीते जीवन के अनुभव होते हैं।
उत्तर : (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
कारण : खुसरो ने एक ही पद्य में खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल — चारों विषय जोड़ दिए थे।
उत्तर : (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
कारण : लेखक कहते हैं कि इतिहास में ऐसा कोई काल नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।
मेरी समझ मेरे विचार
गार्डिनर के अनुसार लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में उमंग उठती है और लेख अपने-आप लिखा जाता है। तब विषय का महत्त्व नहीं रहता।
लेखक ने ऐसी स्थिति का अनुभव नहीं किया। उन्हें लिखने के लिए सोचना, चिंता करना और परिश्रम करना पड़ता है।
तरुण : वे भविष्य के सुंदर सपने देखते हैं। उन्हें वर्तमान की व्यवस्था पुरानी लगती है। वे जल्दी बदलाव और क्रांति चाहते हैं।
वृद्ध : उन्हें अपना अतीत सुखद लगता है। नए बदलाव उन्हें परंपरा के विरुद्ध लगते हैं। वे अतीत के गौरव को वर्तमान में देखना चाहते हैं।
नमिता ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और अमिता ‘समाज-सुधार’ पर निबंध लिखवाना चाहती थी।
- उन्हें दो घंटों में दो आदर्श निबंध लिखने थे।
- पास में न पुस्तकालय था, न विश्वकोश। सामग्री अपने ज्ञान से ही जुटानी थी।
- लिखने से पहले रूपरेखा बनाना उन्हें कठिन लगा।
- शैली तय करने में उलझन थी — छोटे वाक्य लिखें या विद्वता दिखाने वाले लंबे वाक्य।
- समाज-सुधार जैसे बड़े विषय को पाँच पेज में समेटना कठिन था।
- निबंध छोटा होना चाहिए।
- निबंध के दो प्रधान अंग हैं — सामग्री और शैली।
- मनन करके सामग्री एकत्र करनी चाहिए।
- लिखने से पहले रूपरेखा बना लेनी चाहिए।
- भाषा में प्रवाह हो; वाक्य छोटे पर एक-दूसरे से जुड़े हों।
- अलंकार, मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग हो।
मेरी तैयारी : मैं पहले विषय पर सोचता हूँ। पुस्तकों और बड़ों से जानकारी लेता हूँ। मुख्य बिंदुओं की रूपरेखा बनाता हूँ। फिर भूमिका, विस्तार और उपसंहार के क्रम में लिखता हूँ।
जो हम स्वयं देखते, सुनते और अनुभव करते हैं, उसे हम सच्चे भाव से लिख पाते हैं। इससे निबंध में सजीवता और मौलिकता आती है। पाठक को भी वह अपना-सा लगता है। अनुभव से लिखे निबंध में बनावटीपन नहीं रहता।
निबंध लिखने की कला
विषय : मेरे विद्यालय का पुस्तकालय
रूपरेखा : भूमिका — पुस्तकालय का स्वरूप — लाभ — नियम — उपसंहार
पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र होती हैं। मेरे विद्यालय का पुस्तकालय ऐसे ही मित्रों का घर है।
हमारे पुस्तकालय में कहानियों, कविताओं, विज्ञान, इतिहास और खेल की हजारों पुस्तकें हैं। यहाँ समाचार-पत्र और बाल-पत्रिकाएँ भी आती हैं। पढ़ने के लिए शांत कक्ष और साफ मेज-कुर्सियाँ हैं।
पुस्तकालय से हमारा ज्ञान बढ़ता है। पढ़ने की आदत बनती है। गृहकार्य और परियोजनाओं के लिए सामग्री मिल जाती है।
यहाँ शांति रखनी होती है। पुस्तकें समय पर लौटानी होती हैं और उन्हें फाड़ना या उन पर लिखना मना है।
सच में, पुस्तकालय विद्यालय का हृदय है। हमें इसका भरपूर उपयोग करना चाहिए।
मुझे बेहतर लगने वाला ढंग : विषय चयन → अनुभव और अवलोकन → बिंदु लिखना → लेखन → स्वयं पढ़कर सुधार। अपने अनुभव से शुरू करने पर निबंध सहज और सच्चा बनता है।
भाव-विस्तार
जिन युवाओं ने अभी जीवन की कठिनाइयों का सामना नहीं किया है, उन्हें संसार बहुत सुंदर लगता है। नौकरी, घर और जिम्मेदारियों का बोझ पड़ने पर ही जीवन की असली कठोरता समझ में आती है।
समाज में हर युग में कुछ नई बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं। उन्हें दूर करने के लिए सुधारक आते हैं। इसलिए सुधार का काम कभी समाप्त नहीं होता। यही समाज की प्रगति का लक्षण है।
समय बदलता रहता है। आज के युवा कल बूढ़े हो जाएँगे। तब वे भी अपने बीते दिनों को सुनहरा मानेंगे और नई पीढ़ी के बदलावों से असंतुष्ट रहेंगे। यह क्रम हर पीढ़ी में चलता है।
छोटे निबंध में बात कसी हुई और स्पष्ट रहती है। पाठक उसे रुचि से पढ़ता है। बहुत लंबे निबंध में बातें दोहराई जाती हैं और रचना की सुंदरता कम हो जाती है।
मेरा अनुभव
नमूना उत्तर : मुझे ‘मेरा प्रिय त्योहार’ और ‘मेरी यात्रा’ जैसे विषयों पर लिखना सरल लगा, क्योंकि इनका मुझे सीधा अनुभव था। ‘विज्ञान : वरदान या अभिशाप’ जैसे विषय कठिन लगे, क्योंकि उनके लिए जानकारी और तर्क जुटाने पड़ते हैं।
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खोजबीन और लेखन
| महापुरुष | मुख्य कार्य |
|---|---|
| बुद्धदेव | अहिंसा, करुणा और मध्यम मार्ग का उपदेश; बौद्ध धर्म की स्थापना |
| महावीर स्वामी | अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह का संदेश; जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर |
| नागार्जुन | बौद्ध दार्शनिक; माध्यमिक (शून्यवाद) दर्शन दिया |
| शंकराचार्य | अद्वैत वेदांत का प्रचार; देश के चार कोनों में चार मठ स्थापित किए |
| कबीर | जाति-पाँति, पाखंड और आडंबर का विरोध; सरल भाषा में दोहे |
| गुरु नानक | एक ईश्वर, समानता और सेवा का संदेश; सिख धर्म के प्रथम गुरु |
| राजा राममोहन राय | सती प्रथा का विरोध; ब्रह्म समाज की स्थापना; आधुनिक शिक्षा का समर्थन |
| स्वामी दयानंद | आर्य समाज की स्थापना; अंधविश्वास का विरोध; ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा |
| महात्मा गांधी | सत्य और अहिंसा से स्वतंत्रता आंदोलन; छुआछूत का विरोध; स्वदेशी और स्वच्छता |
- स्त्री-शिक्षा : सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोला।
- पर्यावरण : सुंदरलाल बहुगुणा का चिपको आंदोलन; ‘वृक्षमाता’ सालूमरदा तिमक्का ने हजारों पेड़ लगाए।
- दिव्यांगजन : बाबा आमटे ने आनंदवन में कुष्ठ रोगियों और दिव्यांगों की सेवा की।
- असमानता : डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने समानता और अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
अपने आस-पास की ऐसी संस्थाओं की जानकारी भी जोड़ें।
- हर बच्चे, विशेषकर लड़कियों की पढ़ाई — घर-घर जाकर माता-पिता को समझाऊँगा।
- स्वच्छता — मोहल्ले में सफाई अभियान चलाऊँगा।
- नशामुक्ति — नुक्कड़ नाटकों से लोगों को जागरूक करूँगा।
- पर्यावरण — पेड़ लगाऊँगा और प्लास्टिक का उपयोग कम करवाऊँगा।
प्रश्न 4 : नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन — इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ कक्षा में चर्चा करें।
हमारे विद्यालय में एक ‘हरित दल’ बना है। हमने कैंटीन और घरों से सब्जियों के छिलके, सूखे पत्ते और बचा हुआ भोजन इकट्ठा किया। इन्हें एक गड्ढे में डालकर ऊपर से मिट्टी डाली।
दो महीने में यह कचरा अच्छी जैविक खाद बन गया। इस खाद से हमने विद्यालय के बगीचे में सब्जियाँ उगाईं। बची हुई खाद हमने गाँव के किसानों को बेच दी।
इस तरह विद्यालय का कचरा भी साफ हुआ, बगीचा भी हरा-भरा हुआ और कुछ पैसे भी मिले। सच में, यह ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ जैसा हुआ।
15 अक्तूबर
आज हम पहाड़ी पर बने पुराने किले को देखने गए। दूर से किला बहुत सुंदर और भव्य दिखाई देता था। मैंने सोचा था कि अंदर सब कुछ चमचमाता होगा।
पास जाकर देखा तो दीवारें टूटी हुई थीं। जगह-जगह कचरा पड़ा था और लोगों ने दीवारों पर नाम लिख दिए थे। मुझे बहुत दुख हुआ। आज समझ आया कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’। साथ ही मन में संकल्प लिया कि अपनी धरोहर को साफ रखने में मैं भी मदद करूँगा।
व्याकरण की बात — समास
| सामासिक पद | समास विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| निबंधशास्त्र | निबंध का शास्त्र | तत्पुरुष |
| निबंध-रचना | निबंध की रचना | तत्पुरुष |
| समाज-सुधार | समाज का सुधार | तत्पुरुष |
| पुस्तकालय | पुस्तकों का आलय | तत्पुरुष |
| विवाहोत्सव | विवाह का उत्सव | तत्पुरुष |
| विश्वकोश | विश्व (के ज्ञान) का कोश | तत्पुरुष |
| नव-वधू | नई है जो वधू | कर्मधारय |
| जीवन-संग्राम | जीवन रूपी संग्राम | कर्मधारय |
| दस-पाँच | दस या पाँच | द्वंद्व |
| भली-भाँति | भली प्रकार से | अव्ययीभाव |
| नगर-नगर | प्रत्येक नगर | अव्ययीभाव |
उपसर्ग एवं प्रत्यय
उपसर्ग वाले शब्द : अनादि (अन्), दुर्बोध (दुर्), अस्पष्टता (अ), असंतोष (अ), अनुसंधान (अनु), प्रगतिशील (प्र), समावेश (सम्), अनुसरण (अनु)
प्रत्यय वाले शब्द : सुधारक (क), कठिनाई (आई), विद्वता (ता), मधुरता (ता), कर्कशता (ता), सामाजिक (इक), साहित्यिक (इक), मनमोहक (क)
- निबंध लिखना बड़ी कठिनाई की बात है।
- वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है।
- वाक्यों में कुछ अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है।
| मूल शब्द | नए शब्द |
|---|---|
| मधुर | मधुरता, मधुरिमा, सुमधुर |
| सुधार | सुधारक, सुधारवादी, सुधारना |
| सुंदर | सुंदरता, असुंदर, सुंदरतम |
| गति | प्रगति, दुर्गति, सद्गति, गतिशील |
| समाज | सामाजिक, असामाजिक, समाजवाद |
भाव एक शब्द अनेक
| मिलते-जुलते शब्द | वाक्य प्रयोग |
|---|---|
| उमंग, स्फूर्ति, आवेग | छुट्टियों की खबर सुनकर बच्चों में उमंग भर गई। |
| विज्ञ, विद्वान, आचार्य | सभा में अनेक विद्वान उपस्थित थे। |
| कोलाहल, शोर, हल्ला | बाजार के कोलाहल में कुछ सुनाई नहीं देता। |
| मधुर, सुहावने, मनमोहक | बाँसुरी की मधुर ध्वनि सबको अच्छी लगी। |
| कर्कश, कटु | उसकी कटु बातों से सबका मन दुखी हुआ। |
| सम्मति, राय, मत | मैंने पिताजी की सम्मति लेकर निर्णय लिया। |
समूह गतिविधियाँ
एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।। — आकाश
बीसों का सिर काट लिया, ना मारा ना खून किया।। — नाखून
वो आवे तब शादी होय, उस बिन दूजा और न कोय।
मीठे लागें वाके बोल, ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल।। — मुकरी
प्रश्न 2 : ‘युवा और वृद्ध — दो पीढ़ियों का अंतर’ विषय पर कक्षा में वाद-विवाद आयोजित करें।
भाषा संगम : ‘निबंध’ को मराठी, गुजराती और नेपाली में भी ‘निबंध’ तथा उर्दू में ‘मजमून’ कहते हैं। “निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए।” — इस वाक्य को अपनी मातृभाषा में लिखें।
पढ़ने के लिए : पाठ के अंत में अज्ञेय का लेख ‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ दिया गया है। अज्ञेय कहते हैं कि लेखक अपनी भीतरी विवशता को पहचानने और उससे मुक्त होने के लिए लिखता है। कभी-कभी संपादक, प्रकाशक या आर्थिक आवश्यकता जैसे बाहरी दबाव भी लिखवाते हैं, पर सच्चा कृतिकार भीतरी प्रेरणा और बाहरी दबाव का भेद ईमानदारी से बनाए रखता है।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| स्फूर्ति | फुरती, उत्तेजना |
| आवेग | मन की तेज झोंक, उतावली |
| यथार्थता | सच्चाई |
| उत्थित | उठा हुआ, उत्पन्न |
| रहस्य | गुप्त भेद, मर्म |
| विज्ञ | जानकार, विद्वान |
| सम्मति | राय, सहमति |
| अनुसंधान | खोज, जाँच-पड़ताल |
| विश्वकोश | सभी विषयों की जानकारी वाला ग्रंथ |
| दुर्बोध | जो जल्दी समझ में न आए |
| गांभीर्य | गंभीरता, गहराई |
| गुत्थी | उलझन, गाँठ |
| अज्ञ | नासमझ |
| पद्धति | प्रणाली, तरीका |
| पाश्चात्य | पश्चिम का |
| आख्यायिका | कहानी, कथा |
| उदात्त | ऊँचा, महान, श्रेष्ठ |
| अनुसरण | पीछे चलना, अनुकरण |
| समावेश | शामिल होना |
| अंकित | लिखा हुआ, चित्रित |
| कोलाहल | शोर, हल्ला |
| विषाद | उदासी |
| कलरव | मधुर ध्वनि |