२. बूँदें (कविता)
कवि रोहिताश्व अस्थाना द्वारा रचित कविता 'बूँदें' का भावार्थ, लयात्मक शब्द और प्रश्न-उत्तर। महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (सुलभभारती)।
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कविता का परिचय : यह कविता कवि रोहिताश्व अस्थाना जी द्वारा रचित है। इसमें बारिश की बूँदों के सौंदर्य, प्रकृति पर उनके प्रभाव और प्राणियों को मिलने वाले सुख का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है।
अभ्यास (स्वाध्याय)
कविता में आए हुए लयात्मक (तुकांत / Rhyming) शब्द निम्नलिखित हैं —
- गातीं – आतीं
- फैलातीं – जातीं
- पहुँचातीं – हरषातीं – मुसकातीं
कविता के आधार पर बूँदें निम्नलिखित कार्य करती हैं —
- बूँदें रिमझिम-रिमझिम गाते हुए धरती पर आती हैं।
- वे खेतों, बागों और मैदानों में हरियाली फैलाती हैं।
- वे धरती पर गिरकर नालों और नदियों में बहती हैं और अंत में सागर में मिल जाती हैं।
- वे गरमी से परेशान (तपते) लोगों को शीतलता (ठंडक) पहुँचाती हैं।
- वे मेंढक, मोर, पपीहे और कोयल — इन सभी का मन प्रसन्न (हरषाती) करती हैं।
- वे पुरवाई (पूरब दिशा से आने वाली हवा) के रथ पर चढ़कर इठलाती और मुसकाती हैं।
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कविता का भावार्थ (सरल अर्थ)
इस कविता में कवि रोहिताश्व अस्थाना जी ने वर्षा ऋतु का सुंदर चित्रण किया है। बारिश की बूँदें रिमझिम-रिमझिम की मीठी आवाज़ करते हुए, मानो गीत गाते हुए आसमान से धरती पर गिरती हैं। जब वे खेतों, बाग-बगीचों और खुले मैदानों में गिरती हैं, तो सूखे पेड़-पौधों में जान आ जाती है और चारों ओर हरियाली छा जाती है।
ये बूँदें धरती पर गिरकर छोटे-छोटे नालों में बदल जाती हैं, नाले नदियों में मिलते हैं और नदियाँ बहकर अंततः विशाल सागर में समा जाती हैं। भयंकर गरमी से जो लोग बेहाल होते हैं, उन्हें बारिश की ये बूँदें बहुत आराम और ठंडक (शीतलता) पहुँचाती हैं।
बारिश होते ही प्रकृति के सभी जीव-जंतु जैसे मेंढक, मोर, पपीहा और कोयल खुशी से झूम उठते हैं; बूँदें इन सबका मन प्रसन्न कर देती हैं। अंत में कवि कल्पना करते हैं कि ये छोटी-छोटी बूँदें पूरब की ओर से चलने वाली हवा (पुरवाई) रूपी रथ पर बैठकर बड़े नखरे के साथ (इठलाती हुई) मुसकुरा रही हैं।