कक्षा ६ हिंदी · पहली इकाई

२. बसंती हवा

केदारनाथ अग्रवाल — कवि परिचय, कविता का भावार्थ, शब्द वाटिका, भाषा की ओर, रिक्त स्थानों की पूर्ति और सभी कृतियों के उत्तर. महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (सुलभभारती).

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कविता के बारे में

‘बसंती हवा’ कविता के कवि केदारनाथ अग्रवाल हैं। इस कविता में हवा स्वयं अपनी बात कहती है। कवि ने बसंत ऋतु की हवा को एक चंचल और निडर लड़की के रूप में दिखाया है। सूचना है — ‘सुनो और गाओ’।

मुख्य बिंदु

  • कविता में हवा का मानवीकरण किया गया है।
  • बसंती हवा मस्तमौला, निडर और अनोखी है।
  • वह महुए और आम के पेड़ों को हिलाती है। वह गेहूँ के खेतों में लहरें उठाती है।
  • अलसी के सिर की कलसी हवा गिरा नहीं पाई।
  • ‘थपाथप’ और ‘धम्म’ जैसे ध्वनि-सूचक शब्द कविता को सजीव बनाते हैं।

शब्दार्थ

  • बावली – अपनी धुन में रहनेवाली
  • मस्तमौला – मनमौजी
  • फिकर – चिंता
  • झकोरा – झोंका
  • कलसी – गगरी

कवि परिचय

केदारनाथ अग्रवाल — जन्म : १ अप्रैल १९११, मृत्यु : २२ जून २०००.

प्रमुख रचनाएँ : ‘देश-देश की कविताएँ’, ‘अपूर्वा’, ‘आग का आईना’, ‘पंख और पतवार’, ‘पुष्पदीप’ आदि।

परिचय : आप प्रगतिशील काव्यधारा के कवि हैं। आपकी कविताओं में गाँव, खेत, नदी और साधारण मनुष्य का जीवन दिखाई देता है।

कविता का भावार्थ

१पहला भाग — हवा अपना परिचय देती है

कविता में हवा स्वयं बोल रही है। वह कहती है — मैं बसंत ऋतु की हवा हूँ। मैं सबसे अनोखी हूँ। मैं अपनी धुन में मस्त रहती हूँ। मैं मनमौजी और निडर हूँ। मुझे किसी बात की चिंता नहीं है। जिधर मन करता है, उधर घूमने निकल पड़ती हूँ। मैं ऐसी यात्री हूँ, जिसका कोई ठिकाना नहीं।

विशेष : यहाँ हवा का मानवीकरण किया गया है। निर्जीव हवा को मनुष्य की तरह बोलते और शरारत करते दिखाया गया है।

२दूसरा भाग — हवा की अठखेलियाँ

हवा अपनी शरारतें बताती है। वह महुए के पेड़ पर चढ़ी और उसे खूब हिलाया। फिर वह धम्म से नीचे गिरी। इसके बाद वह आम के पेड़ पर चढ़ी। उसने आम को भी झकझोर दिया और उसके कान में ‘कू’ कहा। फिर वह भागकर हरे-भरे खेतों में पहुँची। वहाँ गेहूँ की बालियों में उसने खूब लहरें उठाईं।

विशेष : ‘थपाथप’ और ‘धम्म’ ध्वनि-सूचक शब्द हैं। इनसे कविता सजीव बन जाती है।

३तीसरा भाग — अलसी और सरसों से मिली हार

हवा कई पहरों तक इसी खेल में लगी रही। फिर उसने अलसी का पौधा देखा। वह सिर पर कलसी लिए सीधा खड़ा था। हवा को शरारत सूझी। उसने अलसी को खूब हिलाया-झुलाया। पर उसकी कलसी नहीं गिरी। इस हार के बाद हवा ने सरसों को न हिलाया, न झुलाया। अंत में वह फिर कहती है — मैं बसंती हवा हूँ।

विशेष : जो अपने स्थान पर दृढ़ रहता है, उसे कोई शक्ति डिगा नहीं सकती।

कविता का केंद्रीय भाव

इस कविता में बसंत ऋतु की हवा का सुंदर वर्णन है। हवा एक चंचल और निडर सखी की तरह है। वह पेड़ों, खेतों और पौधों के साथ खेलती है। वह पूरे वातावरण में आनंद भर देती है। यह कविता हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाती है।

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शब्द वाटिका — नए शब्द

शब्दअर्थ
बावलीसीधी-सी, अपनी धुन में
मस्तमौलामनमौजी
फिकरचिंता
महुआएक प्रकार का वृक्ष
झकोराझोंका
पहरप्रहर (दिन-रात का आठवाँ भाग, लगभग तीन घंटे)
अलसी, सरसोंतिलहन के प्रकार
कलसीगगरी
अनोखीनिराली, अलग ही ढंग की
मुसाफिरयात्री

भाषा की ओर

१दिए गए शब्दों के लययुक्त शब्द लिखो।
हवा — दवा महुआ — हुआ बावली — साँवली अलसी — कलसी सरसों — बरसों

टीप : ‘सरसों — बरसों’ पाठ्यपुस्तक में दिया हुआ है। लययुक्त शब्दों के और उत्तर भी हो सकते हैं। जैसे — हवा : तवा; महुआ : बबुआ; बावली : उतावली। जिस शब्द की अंतिम ध्वनि मिलती हो, वह उत्तर मान्य है।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करो

१. नहीं कुछ फिकर है ।
२. गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर ।
३. वहाँ, गेहुँओं में, लहर खूब मारी ।
४. हिलाया-झुलाया गिरी पर न कलसी ।

स्वयं अध्ययन

१दिए गए चित्रों की सहायता से प्राकृतिक सुंदरता दर्शाने वाला एक चित्र बनाकर उसमें रंग भरो।
२अपने चित्र के बारे में बोलो।

मैंने अपने चित्र में एक शांत गाँव का दृश्य बनाया है। सबसे पीछे ऊँचे पर्वत हैं। उनके बीच से सफेद झरना नीचे गिर रहा है। झरने का पानी बहकर एक छोटी नदी बन जाता है।

बीच में फलों से लदा बड़ा पेड़ है। उसकी डाल पर एक पीला पक्षी गा रहा है। नीचे हरी घास पर एक बैल चर रहा है। पास ही ग्वाला पेड़ की छाया में बाँसुरी बजा रहा है। यह चित्र देखते ही मन शांत हो जाता है।

टीप : यह वर्णन केवल नमूना है। तुम अपने बनाए हुए चित्र के बारे में अपने शब्दों में बोलो।

जरा सोचो .......... बताओ

?यदि प्रकृति में सुंदर-सुंदर रंग नहीं होते तो ..........

यदि प्रकृति में सुंदर रंग नहीं होते, तो सारी सृष्टि काली-सफेद तसवीर जैसी दिखती। फूलों को देखकर मन प्रसन्न न होता। तितलियाँ और भौंरे फूलों की ओर न आते। पके और कच्चे फल में अंतर करना कठिन हो जाता।

इंद्रधनुष देखने का आनंद कभी न मिलता। चित्रकार के पास भरने को रंग न होते। सचमुच, रंगों के बिना यह संसार नीरस और उदास होता।

टीप : यह कल्पनात्मक प्रश्न है। अपनी कल्पना से अलग उत्तर भी लिखा जा सकता है।

खोजबीन

१ऋतुओं के नाम बताते हुए उनके परिवर्तन की जानकारी प्राप्त करो और लिखो।
  • वसंत (मार्च – अप्रैल) — पेड़ों पर नई कोंपलें और फूल आते हैं। मौसम सुहावना होता है। इसे ‘ऋतुराज’ कहते हैं।
  • ग्रीष्म (मई – जून) — कड़ी धूप और लू चलती है। दिन बड़े होते हैं। नदी-तालाब सूखने लगते हैं।
  • वर्षा (जुलाई – अगस्त) — वर्षा होती है। चारों ओर हरियाली छा जाती है। खेती का काम शुरू होता है।
  • शरद (सितंबर – अक्तूबर) — आकाश साफ और नीला होता है। चाँदनी निखर आती है।
  • हेमंत (नवंबर – दिसंबर) — ठंड बढ़ती है। सुबह ओस और कोहरा दिखाई देता है।
  • शिशिर (जनवरी – फरवरी) — कड़ाके की ठंड पड़ती है। पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ते हैं।

ध्यान रखो : पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। उसका अक्ष झुका हुआ है। इसी कारण ऋतुएँ बदलती हैं।

अन्य कृतियाँ

१सुनो तो जरा — त्योहार संबंधी कोई एक गीत सुनो और दोहराओ।
२बताओ तो सही — ‘शालेय स्वच्छता अभियान’ में तुम्हारा सहयोग बताओ।
  • मैं कचरा कूड़ादान में ही डालता हूँ।
  • हर शनिवार हम गुट बनाकर कक्षा और मैदान साफ करते हैं।
  • भोजन से पहले हाथ धोता हूँ और बाद में नल बंद करता हूँ।
  • विद्यालय के पौधों को पानी देता हूँ।
  • स्वच्छता के घोषवाक्य बनाने में भाग लेता हूँ।
  • प्लास्टिक की थैली के बजाय कपड़े की थैली लाता हूँ।
३वाचन जगत से — कविवर सुमित्रानंदन पंत की कविता का मुखर वाचन करो।
४मेरी कलम से — सप्ताह में एक दिन किसी कविता का सुलेखन करो।
५अध्ययन कौशल — वायुमंडलीय स्तर दर्शाने वाली आकृति बनाओ।

आकृति में सबसे नीचे पृथ्वी की सतह बनाओ। उसके ऊपर एक-एक करके स्तर दिखाओ। नीचे से ऊपर का क्रम इस प्रकार है —

  1. क्षोभमंडल (० – १२ कि.मी.) — बादल, वर्षा और आँधी इसी स्तर में होते हैं।
  2. समतापमंडल (१२ – ५० कि.मी.) — इसमें ओजोन परत है। यह सूर्य की हानिकारक किरणों को रोकती है।
  3. मध्यमंडल (५० – ८० कि.मी.) — अंतरिक्ष से आनेवाली उल्काएँ यहाँ जलकर नष्ट हो जाती हैं।
  4. तापमंडल (आयनमंडल) (८० – ४०० कि.मी.) — यहाँ से रेडियो तरंगें परावर्तित होती हैं।
  5. बहिर्मंडल (४०० कि.मी. से ऊपर) — यह वायुमंडल का सबसे बाहरी स्तर है।

टीप : ऊपर दी गई ऊँचाइयाँ लगभग हैं।

६दर्पण में देखकर पढ़ो — ‘पहचानो हमें’

पाठ्यपुस्तक में उलटे अक्षरों में हिंदी वर्णमाला दी गई है। दर्पण में देखने पर वह इस प्रकार पढ़ी जाएगी —

  • स्वर : अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ
  • अन्य : अं अ: अँ ऑ
  • व्यंजन : क ख ग घ ङ   च छ ज झ ञ   ट ठ ड ढ ण   त थ द ध न   प फ ब भ म
  • अन्य व्यंजन : ड़ ढ़   य र ल व श ष स ह ळ
  • संयुक्त वर्ण : क्ष त्र ज्ञ श्र

कृति : एक छोटा दर्पण लो। पाठ्यपुस्तक का पन्ना उसके सामने रखकर अक्षर पढ़ो। अपना नाम उलटा लिखकर मित्र से दर्पण में पढ़वाओ।

विचार मंथन व सदैव ध्यान में रखो

।। हवा प्रकृति का उपहार, यही है जीवन का आधार ।।

हवा प्रकृति का अनमोल उपहार है। भोजन और पानी के बिना कुछ समय तक जिया जा सकता है। पर हवा के बिना कुछ मिनट भी जीना संभव नहीं। इसलिए हवा को जीवन का आधार कहा गया है। हमें अधिक पेड़ लगाने चाहिए और प्रदूषण घटाना चाहिए।

सदैव ध्यान में रखो : प्लास्टिक और थर्माकोल प्रदूषण बढ़ाते हैं। ये जल्दी नष्ट नहीं होते। इन्हें जलाने से निकलनेवाला धुआँ हवा को विषैला बना देता है।

मैंने समझा

इस कविता से मैंने समझा कि हवा भी हमारी तरह जीवित लगती है। वह पेड़ों, खेतों और पौधों के साथ खेलती है। वह सारे वातावरण में आनंद भर देती है। कविता पढ़ते समय बसंत का पूरा दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।

अलसी की तरह जो अपने निश्चय पर दृढ़ रहता है, उसे कोई डिगा नहीं सकता। हमें प्रकृति की सुंदरता से प्रेम करना चाहिए। उसे बनाए रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

टीप : ‘मैंने समझा’ में विद्यार्थी को स्वयं के शब्दों में लिखना अपेक्षित है। ऊपर दिया गया उत्तर केवल नमूना है।