६. मेरा अहोभाग्य
चंद्रगुप्त विद्यालंकार — संस्मरण का सारांश, सर्वनाम कृति व भेद, लिंग-वचन परिवर्तन, एक वाक्य में उत्तर तथा सभी कृतियों के उत्तर. महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (सुलभभारती).
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पाठ के बारे में
‘मेरा अहोभाग्य’ एक संस्मरण है। इसके लेखक चंद्रगुप्त विद्यालंकार हैं। इसमें लेखक ने गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर से हुई अपनी भेंट का वर्णन किया है। गुरुदेव के कमरे में ठहरना लेखक को अपना अहोभाग्य लगा। सूचना है — ‘सुनो और समझो’।
मुख्य बिंदु
- फरवरी १९३६ में शांति निकेतन में एक साहित्यिक कार्यक्रम था।
- अस्वस्थ होने पर भी गुरुदेव ने पंद्रह मिनट के बजाय चालीस मिनट बातचीत की।
- गुरुदेव की कहानियों में ग्रामीण जनता की मनोवृत्ति के दर्शन होते हैं।
- ‘काबुलीवाला’ कहानी कल्पना से रची गई थी।
- लेखक जिस कमरे में ठहरे, उसी के बरामदे में ‘गीतांजलि’ का अधिकांश भाग लिखा गया था।
- व्याकरण : सर्वनाम और उसके छह भेद।
शब्दार्थ
- संस्मरण – स्मरणीय घटना
- उल्लसित – आनंदित
- मध्याह्न – दोपहर
- वार्तालाप – बातचीत
- अनुभूति – स्व-अनुभव
ध्यान दें : पाठ का मूल गद्यांश यहाँ नहीं दिया गया है — वह प्रकाशित पाठ्यपुस्तक से ही पढ़ें। यहाँ पाठ का सारांश अपने शब्दों में, शब्दार्थ तथा पाठ्यपुस्तक की सभी कृतियों के उत्तर दिए गए हैं।
लेखक परिचय
चंद्रगुप्त विद्यालंकार — जन्म : १९०६.
प्रमुख रचनाएँ : ‘संदेह’, ‘मेरा बचपन’, ‘न्याय की रात’, ‘मेरा मास्टर साहेब’, ‘चंद्रकला’, ‘पगली’, ‘तीन दिन’, ‘भय का राज्य’, ‘देव और मानव’ आदि।
परिचय : आपने साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।
पाठ का सारांश
फरवरी १९३६ में लेखक को शांति निकेतन जाना था। वहाँ एक साहित्यिक कार्यक्रम होने वाला था। उसकी अध्यक्षता गुरुदेव रवींद्रनाथ करने वाले थे। इसलिए लेखक बहुत उल्लसित थे।
निश्चित दिन कोलकाता से लगभग एक दर्जन हिंदीवालों का दल शांति निकेतन पहुँचा। उन्हें अतिथि-भवन की ऊपरी मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया। यह भवन अशोक वृक्षों के घने उपवन के बीच था। कमरे के बाहर बड़ा बरामदा था। वहाँ से बकुल के घने वृक्ष दिखाई देते थे।
दूसरे दिन सुबह बताया गया कि गुरुदेव अस्वस्थ हैं। वे बैठक में नहीं आ पाएँगे। लेखक बहुत निराश हुए। फिर पता चला कि डॉक्टर ने पंद्रह मिनट का समय दिया है। इसमें गुरुदेव के दर्शन और थोड़ी बातचीत हो सकती थी। यह सुनकर सब बहुत खुश हुए।
दोपहर बाद लगभग चार बजे भेंट हुई। गुरुदेव ने सोचा था कि दो-तीन लोग ही आएँगे। चौदह लोगों को देखकर उन्होंने मजाक किया। उन्होंने कहा कि अब उनमें दरबार लगाने की क्षमता नहीं रही। मकान में जगह की भी कमी है। परिचय के बाद बातचीत शुरू हुई।
गुरुदेव ने बताया कि उन्होंने पचास बरस पहले कहानियाँ लिखना शुरू किया था। तब इस क्षेत्र में एक-आध ही व्यक्ति था। उनकी शुरू की कहानियों में ग्रामीण जीवन का वर्णन है। उनमें ग्रामीण जनता की मनोवृत्ति के दर्शन होते हैं। मनुष्य का स्वभाव हर जगह एक-सा होता है। इसलिए ये कहानियाँ किसी भी देश के व्यक्ति को अच्छी लग सकती हैं।
लेखक ने पूछा कि ‘काबुलीवाला’ कहानी का विचार कैसे आया। गुरुदेव ने बताया कि यह कहानी कल्पना से बनी है। एक काबुलीवाला उनके यहाँ आता था। सब उससे परिचित हो गए थे। तब उन्होंने सोचा कि उसकी भी एक छोटी लड़की होगी, जिसे वह याद करता होगा।
बातचीत चलती रही। सबके लिए यह एक ‘मानसिक खाद्य’ था। पंद्रह मिनट के बजाय चालीस मिनट बीत गए। जाते समय गुरुदेव ने कहा कि वे जब कम समय देते हैं, तो उसे सच न मानें। उन्हें स्वयं लोगों से बातचीत करने में आनंद आता है।
सबने धन्यवाद देकर विदा ली। कमरे में लौटकर लेखक बहुत प्रसन्न थे। फिर उन्हें पता चला कि उसी कमरे में गुरुदेव काफी समय रहे थे। उसी कमरे के बरामदे में उन्होंने ‘गीतांजलि’ का अधिकांश भाग लिखा था। ‘गीतांजलि’ को नोबल पुरस्कार मिला था। यह जानकर लेखक भाव-विभोर हो गए। उसी कमरे में ठहरना उन्हें अपना अहोभाग्य लगा।
नाम तुम्हारे — चित्र देखकर उचित सर्वनाम लिखो
दिए गए सर्वनाम — तू, मैं, वह, यह, क्या, जैसा-वैसा, अपने-आप
- अकेला खड़ा लड़का (स्वयं की बात कहता हुआ) — मैं — पुरुषवाचक (उत्तम पुरुष)
- पास-पास खड़े दो बच्चे (एक-दूसरे से बात करते हुए) — तू — पुरुषवाचक (मध्यम पुरुष)
- फूलदान में लगा फूल (पास की वस्तु) — यह — निश्चयवाचक
- मिट्टी में अपने आप उगते बीज — अपने-आप — निजवाचक
- दूर के घर की ओर संकेत करता लड़का — वह — निश्चयवाचक
- एक जैसे चित्र लिए दो लड़कियाँ — जैसा-वैसा — संबंधवाचक
- आश्चर्य से देखते लड़का और लड़की — क्या — प्रश्नवाचक
टीप : यह चित्र-आधारित कृति है। इसलिए क्रम में थोड़ा अंतर हो सकता है। मुख्य बात यह समझना है कि कौन-सा सर्वनाम किस भेद का है।
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आओ, सर्वनाम समझें
संज्ञा के स्थान पर आनेवाले शब्द को सर्वनाम कहते हैं। पाठ में आए सर्वनाम शब्द हैं — मैं, वह, कुछ, जैसा-वैसा, अपने-आप। सर्वनाम के छह भेद हैं —
- पुरुषवाचक — बोलनेवाले, सुननेवाले या जिसके बारे में बात हो, उसके लिए। जैसे — मैं, तुम, आप, वह।
- निश्चयवाचक — किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करता है। जैसे — यह, वह, ये, वे।
- अनिश्चयवाचक — जिससे कोई निश्चित बात पता न चले। जैसे — कुछ, कोई।
- प्रश्नवाचक — प्रश्न पूछने के लिए। जैसे — कौन, क्या।
- संबंधवाचक — दो बातों का संबंध जोड़ता है। जैसे — जो-सो, जैसा-वैसा।
- निजवाचक — स्वयं के लिए। जैसे — अपने-आप, खुद, स्वयं।
वाक्यों में प्रयोग :
शब्द वाटिका — नए शब्द
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संस्मरण | स्मरणीय घटना |
| उल्लसित | आनंदित |
| दल | समूह |
| सृष्टि | संसार |
| अनुभूति | स्व-अनुभव |
| बकुल | मौलसिरी (वृक्ष का नाम) |
| मानसिक खाद्य | वैचारिक चर्चा |
| मध्याह्न | दोपहर |
| वार्तालाप | बातचीत |
| संसर्ग | संगति |
| सघन | घना |
| उपवन | उद्यान |
भाषा की ओर
| स्त्रीलिंग एकवचन | स्त्रीलिंग बहुवचन | पुल्लिंग एकवचन | पुल्लिंग बहुवचन |
|---|---|---|---|
| भैंस | भैंसें | भैंसा | भैंसे |
| बिल्ली | बिल्लियाँ | बिलाव | बिलाव |
| घोड़ी | घोड़ियाँ | घोड़ा | घोड़े |
| नागिन | नागिनें | नाग | नाग |
| चुहिया | चुहियाँ | चूहा | चूहे |
ध्यान दो : ‘बिलाव’ और ‘नाग’ का रूप बहुवचन में नहीं बदलता। ‘आ’ पर समाप्त होनेवाले पुल्लिंग शब्दों का बहुवचन ‘ए’ में बदलता है। जैसे — भैंसा → भैंसे, घोड़ा → घोड़े।
एक वाक्य में उत्तर लिखो
साहित्यिक कार्यक्रम शांति निकेतन में होने वाला था।
गुरुदेव की कहानियों में ग्रामीण जनता की मनोवृत्ति के दर्शन होते थे।
संस्मरण में ‘काबुलीवाला’ कहानी का उल्लेख किया गया है।
लेखक जिस कमरे में ठहरे थे, उसी के बरामदे में गुरुदेव ने ‘गीतांजलि’ का अधिकांश भाग लिखा था, इसलिए लेखक आनंद विभोर हुए।
खोजबीन — नोबल पुरस्कार प्राप्त विभूतियाँ
विभूतियों के चित्र इकट्ठे करके चिपकाओ। उन्हें पुरस्कार किसलिए मिला, यह नीचे दिया है —
- गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर (साहित्य, १९१३) — काव्य-संग्रह ‘गीतांजलि’ के लिए। ये नोबल पानेवाले पहले भारतीय थे।
- सर चंद्रशेखर वेंकट रामन (भौतिकी, १९३०) — प्रकाश के प्रकीर्णन की खोज ‘रामन प्रभाव’ के लिए।
- डॉ. हरगोबिंद खुराना (चिकित्सा, १९६८) — आनुवंशिक संकेत (जेनेटिक कोड) की खोज के लिए।
- मदर टेरेसा (शांति, १९७९) — गरीबों और रोगियों की निःस्वार्थ सेवा के लिए।
- सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (भौतिकी, १९८३) — तारों की संरचना और विकास के अध्ययन के लिए।
- अमर्त्य सेन (अर्थशास्त्र, १९९८) — कल्याणकारी अर्थशास्त्र संबंधी कार्य के लिए।
- वेंकटरमन रामकृष्णन (रसायन, २००९) — कोशिका के राइबोसोम की संरचना के अध्ययन के लिए।
- कैलाश सत्यार्थी (शांति, २०१४) — बाल-मजदूरी के विरुद्ध संघर्ष के लिए।
अन्य कृतियाँ
शब्दकोश में शब्द वर्णमाला के क्रम में होते हैं। पहले स्वर से शुरू होनेवाले शब्द आते हैं। फिर व्यंजन से शुरू होनेवाले शब्द आते हैं। पहले अक्षर के बाद दूसरे अक्षर का भी क्रम देखो। पाठ के शब्द वर्णक्रम में इस प्रकार आएँगे —
ध्यान दो : शब्दकोश में अनुस्वार (ं) वाले शब्द उसी अक्षर के बाकी शब्दों से पहले आते हैं। इसलिए ‘संसर्ग’ और ‘संस्मरण’ पहले हैं, फिर ‘सघन’ और ‘सृष्टि’।
यदि मैं पुस्तक होता, तो मुझसे भाग्यशाली कोई न होता। बच्चे मुझे रोज खोलते। मेरी कहानियाँ उनके मन में उतर जातीं।
मैं हर पाठक को कुछ-न-कुछ देता — किसी को ज्ञान, किसी को हिम्मत, तो किसी को हँसी। मैं चाहता कि कोई मेरे पन्ने न मोड़े और न फाड़े। मैं अलमारी में बंद पड़ा धूल न खाता। मैं हाथ-से-हाथ घूमता और हर उस बच्चे तक पहुँचता, जो पढ़ना चाहता है।
टीप : यह कल्पनात्मक प्रश्न है। अपनी कल्पना से अलग उत्तर भी लिखा जा सकता है।
यह श्रवण-कृति है, इसे स्वयं करो। रेडियो, दूरदर्शन या समाचारपत्र से प्रतिदिन मुख्य समाचार चुनो। समाचार लिखते समय ध्यान रखो — क्या हुआ, कहाँ हुआ, कब हुआ, किसके साथ हुआ। फिर उसे परिपाठ में साफ आवाज में सुनाओ।
- आपके बचपन का कौन-सा अनुभव आज भी आपको याद है?
- इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा आपको किससे मिली?
- आपके जीवन की सबसे बड़ी कठिनाई क्या थी?
- अपनी सफलता का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?
- हम विद्यार्थियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
टीप : ये प्रश्न केवल नमूना हैं। जिस व्यक्ति का साक्षात्कार लेना हो, उसके काम के अनुसार प्रश्न बदलो।
यह वाचन-कृति है, इसे स्वयं करो। संत तुकाराम महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत-कवि थे। उनके अभंग सरल भाषा में गहरी बात कहते हैं। कोई अभंग चुनो। उसका अर्थ शिक्षक या घर के बड़ों से समझो। फिर लय-ताल के साथ गाओ।
दादाजी की छड़ी
पिछले वर्ष की बात है। दादाजी की तबीयत ठीक नहीं थी। वे कई दिनों से बिस्तर पर ही थे। उनकी पुरानी छड़ी कोने में पड़ी रहती थी।
एक दिन मैंने वह छड़ी उठाई। मैंने उसे रेगमाल से घिसकर साफ किया। फिर मूठ के पास लाल धागा लपेट दिया। शाम को दादाजी उठे, तो मैंने छड़ी उनके हाथ में दे दी।
दादाजी कुछ देर उसे देखते रहे। फिर उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनकी आँखें भर आई थीं। उस दिन मैंने समझा कि बड़ों को महँगे उपहार नहीं, थोड़ा-सा ध्यान चाहिए। वह क्षण मुझे आज भी याद है।
टीप : यह संस्मरण केवल नमूना है। अपने परिवार की किसी सच्ची घटना को अपने शब्दों में लिखो।
- महात्मा गांधी — अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग से देश को स्वतंत्रता दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई।
- डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर — भारतीय संविधान के निर्माता। समता और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया।
- सावित्रीबाई फुले — स्त्री-शिक्षा की नींव रखी। भारत की पहली शिक्षिका मानी जाती हैं।
- डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम — अंतरिक्ष और प्रक्षेपास्त्र क्षेत्र में योगदान दिया। ‘जनता के राष्ट्रपति’ कहलाए।
- छत्रपति शिवाजी महाराज — स्वराज्य की स्थापना की। कुशल प्रशासन किया।
- मदर टेरेसा — असहाय, रोगी और गरीब लोगों की आजीवन सेवा की।
निबंध के मुद्दे : प्रस्तावना → विभूति का परिचय और बचपन → प्रमुख कार्य और संघर्ष → समाज पर प्रभाव → हमें मिलनेवाली प्रेरणा → उपसंहार।
विचार मंथन व सदैव ध्यान में रखो
‘हे विश्वचि माझे घर’ संत ज्ञानेश्वर का वचन है। इसका अर्थ है — ‘यह पूरा विश्व ही मेरा घर है’। जो सारे संसार को अपना परिवार मानता है, वह किसी से भेदभाव नहीं करता। गुरुदेव ने भी कहा कि मनुष्य का स्वभाव हर जगह एक-सा है।
दूसरा संदेश है कि व्यक्ति अपने उल्लेखनीय कार्यों से महान बनता है। गुरुदेव, मदर टेरेसा और डॉ. कलाम को हम उनके कार्यों के कारण ही याद करते हैं।
मैंने समझा
इस संस्मरण से मैंने समझा कि महान व्यक्ति सरल और विनम्र होते हैं। गुरुदेव अस्वस्थ थे। फिर भी उन्होंने चालीस मिनट तक सबसे प्रेम से बातचीत की।
किसी महान व्यक्ति से मिलना जीवन भर की पूँजी बन जाता है। लेखक के लिए वह कमरा केवल एक कमरा नहीं था। वह ‘गीतांजलि’ की जन्मभूमि थी। सचमुच वह उनका अहोभाग्य था।
टीप : ‘मैंने समझा’ में विद्यार्थी को स्वयं के शब्दों में लिखना अपेक्षित है। ऊपर दिया गया उत्तर केवल नमूना है।