कक्षा ६ हिंदी · पहली इकाई

७. नदी कंधे पर

प्रभुदयाल श्रीवास्तव — कवि परिचय, कविता का भावार्थ, केंद्रीय भाव, शब्दार्थ तथा संभावित प्रश्नोत्तर. महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (सुलभभारती).

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कविता के बारे में

‘नदी कंधे पर’ कविता के कवि प्रभुदयाल श्रीवास्तव हैं। इसमें बच्चों के मन की सुंदर कल्पना है। बच्चे नदी को कंधे पर उठाकर घर लाना चाहते हैं। शाम को वे उसे फिर उसी जगह रख आते हैं। सूचना है — ‘गाओ और समझो’।

मुख्य बिंदु

  • कविता में काल्पनिक प्रतीकों द्वारा नदी के प्रति बाल-मन के भाव बताए गए हैं।
  • बच्चे नदी में मित्रों के साथ नहाना और खेलना चाहते हैं।
  • वे सबको नदी में नहाने के लिए बुलाते हैं।
  • शाम ढलते ही वे नदी को उसकी जगह लौटा देते हैं।
  • सीख : नदी सबकी है। उसकी रक्षा करनी चाहिए।

शब्दार्थ

  • इतराना – गर्व से इठलाना
  • भद्र जन – सज्जन लोग
  • झटपट – तुरंत
  • शाम ढले – संध्या होने पर

कवि परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव — जन्म : ४ अगस्त १९४४, धरमपुरा, दमोह (मध्यप्रदेश)।

प्रमुख रचनाएँ : बुंदेली लघुकथाएँ, लोकगीत; ‘दैनिक भास्कर’ तथा ‘नवभारत’ में बालगीत आदि।

परिचय : आप विगत दो दशकों से कहानी, कविताएँ, व्यंग्य, लघुकथाएँ, गजल आदि लिखते हैं।

कविता का भावार्थ

१पहला भाग — नदी को घर ले आने की कल्पना

बच्चे कहते हैं — यदि हमारे बस में होता, तो हम नदी को उठाकर घर ले आते। उसे अपने घर के ठीक सामने रोज बहाते। फिर मित्रों के साथ कूद-कूदकर उसमें नहाते।

विशेष : नदी को उठाकर लाना असंभव है। पर बच्चों की कल्पना में कुछ भी असंभव नहीं होता।

२दूसरा भाग — नदी के साथ खेल और सबको निमंत्रण

बच्चे उस नदी में कभी तैरते, कभी डुबकी लगाते। वे इतराते, गाते और मस्ती करते। वे सबको बुलाकर कहते — नदी आ गई है, चलो नहाने! वे सभी भले लोगों का नदी से परिचय करवाते। मन होता, तो झटपट नदी पार भी कर जाते।

विशेष : बच्चे आनंद अकेले नहीं, सबके साथ बाँटकर लेना चाहते हैं।

३तीसरा भाग — नदी को वापस उसी जगह रख आना

नदी के उस पार से बच्चे ‘मम्मी-मम्मी’ पुकारते। शाम ढलते ही वे नदी को फिर अपने कंधे पर रखवा लेते। जहाँ से लाए थे, वहीं उसे रख आते।

विशेष : नदी को उसकी जगह लौटाना बच्चों की ईमानदारी और प्रकृति के प्रति आदर दिखाता है।

कविता का केंद्रीय भाव

इस कविता में बच्चों की मुक्त और निर्दोष कल्पना का सुंदर चित्रण है। बच्चों को नदी बहुत प्रिय है। वे चाहते हैं कि नदी उनके घर के सामने बहे। बाल-मन की कल्पना की कोई सीमा नहीं होती।

कविता यह भी बताती है कि नदी सबकी है। उसका आनंद सबके साथ लेना चाहिए। उसे सुरक्षित भी रखना चाहिए।

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
बस में होनावश में होना, अपने अधिकार में होना
इतरानागर्व से इठलाना
मस्तानामस्ती करना, आनंद में झूमना
आमंत्रित करनानिमंत्रण देना, बुलाना
भद्र जनसज्जन लोग, भले लोग
नदियानदी
झटपटबहुत जल्दी, तुरंत
शाम ढलेसंध्या होने पर
कंधे पर रखवानाकंधे पर उठवा लेना
प्रतीककिसी बात का सूचक चिह्न

संभावित प्रश्नोत्तर

१बच्चे नदी को घर क्यों ले आना चाहते हैं?

बच्चों को नदी बहुत प्रिय है। वे चाहते हैं कि नदी घर के ठीक सामने बहे। तब वे जब चाहें, मित्रों के साथ उसमें नहा सकेंगे और खेल सकेंगे।

२बच्चे नदी को अपने पास ही क्यों नहीं रख लेते?

बच्चे जानते हैं कि नदी केवल उनकी नहीं है। दूसरे लोगों, पशु-पक्षियों और खेतों को भी उसकी आवश्यकता है। इसलिए शाम होते ही वे नदी को उसकी जगह वापस रख आते हैं।

३कविता में बच्चों का कौन-सा गुण दिखाई देता है?
  • कल्पनाशीलता — नदी को कंधे पर उठाकर लाने की अनोखी कल्पना।
  • मिल-बाँटकर आनंद लेना — वे सबको नहाने के लिए बुलाते हैं।
  • प्रकृति से प्रेम — नदी उन्हें बहुत प्रिय है।
  • ईमानदारी — वे नदी को उसकी जगह लौटा देते हैं।
४नदी हमारे लिए क्यों आवश्यक है?
  • नदी से पीने और घरेलू उपयोग के लिए पानी मिलता है।
  • नदी के पानी से खेतों की सिंचाई होती है।
  • नदी पर बाँध बनाकर बिजली तैयार की जाती है।
  • मछलियाँ और अनेक जलचर नदी में रहते हैं।
  • नदी के कारण आस-पास का भूजल स्तर बना रहता है।

इसलिए ध्यान रखो : नदी में कचरा न डालें। उसमें कपड़े और वाहन न धोएँ। उसका पानी व्यर्थ न बहाएँ।

५बाल जगत से संबंधित तुम्हारी कोई कल्पना बताओ।

अगर मेरे बस में होता, तो मैं आसमान से इंद्रधनुष उतारकर आँगन में लगा देता। उसकी सात रंगों की सीढ़ी पर चढ़कर मैं बादलों तक जाता। वहाँ से नीचे झाँककर अपना गाँव देखता।

फिर मैं मुट्ठी भर बादल उन खेतों पर बिखेर देता, जहाँ बारिश नहीं हुई है। शाम को मैं इंद्रधनुष को वापस आसमान में टाँग आता। कल फिर सब उसे देख सकेंगे।

टीप : यह उत्तर केवल नमूना है। अपनी कल्पना से अपने शब्दों में कोई अनोखी बात बताओ।

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