२. वारिस कौन?
लेखिका — विभा रानी | संपूर्ण स्वाध्याय, कहानी का सारांश, और भाषा बिंदु। महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडळ (सुलभभारती)।
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स्वाध्याय (सूचना के अनुसार कृतियाँ करो)
- पहली बहन: उन दानों को खिड़की के बाहर फेंक दिया।
- दूसरी बहन: चाँदी की एक डिब्बी में डालकर उसे मखमल के थैले में बंद करके सुरक्षा से अपनी संदूकची में डाल दिया।
- तीसरी बहन: अपने कमरे की खिड़की के पीछेवाली जमीन में वे दाने बो दिए।
- चौथी बहन: दानों को भुनवाकर खा डाला।
- जरूर इसके पीछे कोई मकसद होगा। (उद्देश्य/हेतु/मकसद)
- सो मैं उन्हें भुनवाकर खा गई। (भिगोकर / भुनवाकर/पकाकर)
- तुम ही मेरे राज्य की सच्ची उत्तराधिकारी हो। (रानी/युवराज्ञी/उत्तराधिकारी)
- इसे तुम अपने पास रखो, पाँच साल बाद मैं जब इन्हें माँगूँगा... (चार/सात/पाँच)
| कार्य/घटना | परिणाम |
|---|---|
| १. गेहूँ के दानों को बोने का परिणाम | पाँच वर्षों में उसके पास ढेर सारा गेहूँ तैयार हो गया। |
| २. सभी के उत्तर सुनकर राजा पर हुआ परिणाम | राजा को बड़ी निराशा हुई। |
| ३. दूसरी राजकुमारी का संदूकची में दाने रखने का परिणाम | दाने सड़ गए थे। |
| ४. पहली राजकुमारी को कड़ककर पूछने का परिणाम | उसने सच्ची बात बता दी। |
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भाषा बिंदु
- सरल वाक्य :
- राजा रथ पर सवार हो गया।
- राजा ने हैरानी से राजकुमारी की ओर देखा।
- गेहूँ के दाने लेकर चारों बहनें अपने-अपने कमरे में लौट आईं।
- संयुक्त वाक्य :
- राजकुमारी ने तैयार फसल में से दाने निकाले और फिर से बो दिए।
- बड़ी राजकुमारी भंडार घर जाकर गेहूँ के दाने ले आई और राजा को दे दिए।
- पहले तो उसने भी अपनी दूसरी बहनों की तरह ही उन्हें सहेजकर रख देने की सोची, लेकिन वह ऐसा न कर सकी।
- मिश्र वाक्य :
- राजा ने सोचा कि इन चारों में से जो सबसे बुद्धिमती होगी, उसे ही अपना राजपाट सौंपेगा।
- तीसरी राजकुमारी को इस बात का यकीन था कि पिता जी ने उन्हें यूँ ही ये दाने नहीं दिए होंगे।
- राजा ने पूछा, "क्या ये वही दाने हैं जो मैंने तुम्हें दिए थे?"
उपयोजित लेखन व मैंने समझा
४५, शांति नगर,
अँधेरी (पूर्व), मुंबई - ४०००६९
दिनांक: २५ अक्टूबर, २०२६
प्रिय मित्र रोहन,
सप्रेम नमस्ते।
मैं यहाँ कुशल मंगल हूँ और आशा करता हूँ कि तुम भी सपरिवार स्वस्थ व प्रसन्न होगे। हमारी विद्यालयीन परीक्षाएँ अब समाप्त हो चुकी हैं और जल्द ही दीपावली की छुट्टियाँ शुरू होने वाली हैं।
इस बार मैंने सोचा है कि हम सब मिलकर दीपावली का त्योहार मनाएँ। इसलिए मैं तुम्हें दीपावली की छुट्टियों में अपने घर आमंत्रित कर रहा हूँ। मेरे माता-पिता भी तुम्हें यहाँ देखकर बहुत खुश होंगे। हम दोनों मिलकर खूब मजे करेंगे, घर सजाएँगे और मिठाइयाँ खाएँगे। साथ ही हम मुंबई के कुछ प्रसिद्ध स्थानों पर भी घूमने जाएँगे।
मुझे पूरा विश्वास है कि तुम मेरा यह निमंत्रण स्वीकार करोगे और जल्द ही अपने आने की सूचना दोगे। अंकल और आंटी को मेरा प्रणाम कहना।
तुम्हारा मित्र,
सुमित
इस कहानी से मैंने यह समझा कि जीवन में सफल होने के लिए समय और उपलब्ध साधनों का सही उपयोग करना बहुत आवश्यक है। केवल साधन मिलने से कोई ज्ञानी या बड़ा नहीं बन जाता, बल्कि अपनी बुद्धि और मेहनत से उन साधनों को विकसित करने वाला ही सच्चा उत्तराधिकारी या वारिस कहलाने के योग्य होता है।